सुप्रीम कोर्ट ने दोहराया है कि राजस्व रिकॉर्ड में किसी व्यक्ति का नाम दर्ज होने से न तो अचल संपत्ति का मालिकाना हक पैदा होता है और न ही समाप्त होता है। कोर्ट ने कहा कि केवल राजस्व रिकॉर्ड में किसी अन्य व्यक्ति का नाम दर्ज हो जाने के आधार पर यह नहीं माना जा सकता कि मूल सह-स्वामी ने अपनी संपत्ति में हिस्सेदारी स्वेच्छा से छोड़ दी है।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ एक संयुक्त पारिवारिक कृषि भूमि से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी। भूमि मूल रूप से भगवानसिंह के पास थी, जिनकी मृत्यु के बाद उनके दो बेटों रामप्रसाद और वासुदेव को संपत्ति विरासत में मिली और दोनों के नाम संयुक्त रूप से राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किए गए।

बाद में राजस्व रिकॉर्ड में संपत्ति केवल वासुदेव और उनके बेटे के नाम दर्ज हो गई। इसके बाद रामप्रसाद के कानूनी उत्तराधिकारियों ने सह-स्वामित्व की घोषणा, बंटवारे और अलग कब्जे की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया।

प्रतिवादियों ने दावा किया कि रामप्रसाद ने एक हलफनामे, नायब तहसीलदार के समक्ष दिए बयान और सहमति पत्र (Ex.D5) के जरिए अपना हिस्सा स्वेच्छा से छोड़ दिया था। हालांकि, ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए वादियों के पक्ष में फैसला दिया।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बाद में दोनों अदालतों के निष्कर्षों को पलट दिया। इसके खिलाफ रामप्रसाद के कानूनी उत्तराधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए कहा कि किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में राजस्व प्रविष्टि मात्र से संपत्ति में अधिकार का स्वैच्छिक परित्याग साबित नहीं होता। जिस मूल लेनदेन के आधार पर मालिकाना हक छोड़े जाने का दावा किया जा रहा है, उसे स्वतंत्र रूप से साबित करना आवश्यक है।

पीठ ने कहा कि प्रतिवादी किसी पंजीकृत त्यागपत्र या ऐसे स्वतंत्र गवाह को पेश नहीं कर सके, जो यह साबित कर सके कि रामप्रसाद ने अपना अधिकार छोड़ा था। कोर्ट ने यह भी कहा कि नायब तहसीलदार का आदेश राजस्व रिकॉर्ड को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन केवल किसी व्यक्ति का नाम दर्ज करने से वह मालिकाना हक का हस्तांतरण या अधिकारों का परित्याग नहीं कर सकता।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 117 के तहत राजस्व प्रविष्टि की शुद्धता की वैधानिक धारणा केवल खंडनीय साक्ष्यात्मक धारणा है, मालिकाना हक की धारणा नहीं।

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को बहाल कर दिया और रामप्रसाद के कानूनी उत्तराधिकारियों के सह-स्वामित्व के अधिकार को मान्यता दी। उनके हिस्से का निर्धारण कानून के अनुसार बंटवारे के माध्यम से करने का निर्देश दिया गया।

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