सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि किसी सिविल डिक्री में पक्षकार नहीं रहा व्यक्ति भी संपत्ति पर अपने स्वतंत्र अधिकार, स्वामित्व या हित का दावा करते हुए सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के Order XXI Rules 97–101 के तहत डिक्री के निष्पादन का विरोध कर सकता है। ऐसे व्यक्ति को अपना दावा साबित करने के लिए अलग से मुकदमा दायर करने की जरूरत नहीं है।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की खंडपीठ ने कर्नाटक हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें तीसरे पक्ष की आपत्ति खारिज करने के निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा गया था। निचली अदालत ने संबंधित व्यक्ति को डिक्री को चुनौती देने के लिए अलग सिविल मुकदमा दायर करने को कहा था।

क्या था मामला?

यह विवाद बेंगलुरु स्थित एक संपत्ति से जुड़ा था। वर्ष 1987 में वादी ने संपत्ति पर स्वामित्व की घोषणा और कब्जा दिलाने की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था। उसका दावा था कि तहसीलदार ने वर्ष 1972 में उसे हक्कुपत्र (Hakkupatra) के जरिए यह जमीन आवंटित की थी।

ट्रायल कोर्ट ने 1999 में वादी के पक्ष में आंशिक डिक्री पारित करते हुए प्रतिवादी को संपत्ति का कब्जा सौंपने का निर्देश दिया।

डिक्री के निष्पादन की कार्यवाही के दौरान एक तीसरे व्यक्ति ने CPC के Order XXI Rules 97–101 के तहत आपत्ति दाखिल की। उसने दावा किया कि वर्ष 1972 में उसे भी संबंधित संपत्ति स्वतंत्र रूप से आवंटित की गई थी। उसने यह भी कहा कि उसने और उसके बेटे ने वहां एक मकान और तीन दुकानें बनाई थीं, जिन्हें किराए पर दिया गया था।

अपने दावे के समर्थन में उसने मूल हक्कुपत्र पेश किया। इसके विपरीत, मूल मुकदमे में वादी ने इस दस्तावेज की फोटोकॉपी पर भरोसा किया था।

निष्पादन अदालत ने 2008 में तीसरे पक्ष की आपत्ति खारिज कर दी। कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा और उसे अलग मुकदमा दायर करने के लिए कहा। इसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत और हाईकोर्ट के फैसलों को रद्द करते हुए कहा कि CPC के Order XXI Rules 97–101 के तहत निष्पादन की कार्यवाही में तीसरे पक्ष के स्वतंत्र अधिकारों और दावों पर विचार किया जा सकता है।

पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसी आपत्ति पर सुनवाई सामान्य सिविल मुकदमे की तरह होती है और इस पर पारित आदेश के खिलाफ नियमित प्रथम अपील भी की जा सकती है।

कोर्ट ने कहा कि निष्पादन अदालत के अधिकार क्षेत्र को सीमित बताकर तीसरे पक्ष को अलग मुकदमा दायर करने के लिए कहना CPC के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है। Order XXI Rule 101 स्पष्ट रूप से ऐसे मामलों में अलग मुकदमा दायर करने पर रोक लगाता है, जब विवाद का समाधान निष्पादन की कार्यवाही में किया जा सकता है।

इस संबंध में कोर्ट ने टिप्पणी की:

“Order XXI, Rules 97 to 101 CPC के तहत दाखिल आवेदन एक नियमित मुकदमे के बराबर है।”

कोर्ट ने कहा कि अलग सिविल अदालत में जाकर डिक्री को रद्द कराने की आवश्यकता बताने वाला हाईकोर्ट का निष्कर्ष कानून के अनुरूप नहीं था।

मूल दस्तावेज को मिला महत्व

सुप्रीम कोर्ट ने तीसरे पक्ष के दावे पर विचार करते हुए मूल हक्कुपत्र और वादी द्वारा पेश की गई उसकी फोटोकॉपी के बीच अंतर को भी ध्यान में रखा। उपलब्ध विवरण के अनुसार, कोर्ट ने मूल दस्तावेज को अधिक साक्ष्यात्मक महत्व दिया और अपील स्वीकार कर ली।

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