अवैध रेत खनन पर सुप्रीम कोर्ट की राजस्थान प्रशासन को फटकार, कहा– अधिकारियों की निष्क्रियता ने ग्रामीणों को हिंसा की ओर धकेला
सुप्रीम कोर्ट ने कल एक ऐसे व्यक्ति को जमानत दे दी, जिसे भीड़ द्वारा एक घर में तोड़फोड़ के मामले में 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई गई थी। अदालत ने टिप्पणी की कि क्षेत्र में अवैध खनन और स्टोन क्रशिंग यूनिट्स के खिलाफ ग्रामीणों द्वारा बार-बार की गई शिकायतों पर प्रशासन की निष्क्रियता ही इस घटना का मुख्य कारण बनी।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने अधिकारियों की निष्क्रियता पर “व्यथा” (anguish) व्यक्त करते हुए आगे की कार्रवाई का संकेत दिया। अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह उस समय तैनात सभी अधिकारियों के नाम और पदनाम प्रस्तुत करे, जिनकी निष्क्रियता के कारण यह घटना घटी।
अदालत ने कहा, “यह घटना संबंधित अधिकारियों की पूर्ण निष्क्रियता का प्रत्यक्ष परिणाम है। ग्रामीणों ने बार-बार अवैध खनन और स्टोन क्रशिंग यूनिट्स को रोकने की मांग की, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई।”
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि यह कोई एकमात्र मामला नहीं है, बल्कि ऐसे कई प्रकरण अदालत के संज्ञान में आए हैं। इसलिए राज्य के वकील को निर्देश दिया गया कि संबंधित अधिकारियों के नामों की सूची पेश की जाए।
साथ ही, याचिकाकर्ता को भी निर्देश दिया गया कि वह हलफनामा दाखिल कर यह विवरण दे कि क्षेत्र में अवैध खनन और स्टोन क्रशिंग गतिविधियां चल रही थीं।
हाईकोर्ट में अपील लंबित रहने के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की रिहाई का आदेश दिया। अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि प्रशासन ने ग्रामीणों की शिकायतों की सत्यता की जांच तक करने का प्रयास नहीं किया। ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकारी पूरी तरह मौन रहे और यह भी नहीं देखा कि शिकायत के अनुसार खनन क्षेत्र की सीमा का उल्लंघन हुआ था या आवश्यक अनुमति के बिना गतिविधियां चलाई जा रही थीं।
संक्षेप में, याचिकाकर्ता पर आरोप था कि वह भीड़ का हिस्सा बनकर शिकायतकर्ता के घर में तोड़फोड़ में शामिल था। उसका तर्क था कि गांव के लोग लंबे समय से अवैध खनन और स्टोन क्रशिंग यूनिट्स के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। जब प्रशासन ने कोई कार्रवाई नहीं की, तो यह घटना आवेश में घटित हो गई।
उसने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता और अन्य को केवल साधारण खरोंचें आई थीं। साथ ही उसने दावा किया कि वह सरपंच का भाई होने के कारण इस मामले में फंसाया गया। लगभग डेढ़ वर्ष जेल में बिताने के बाद उसने यह भी रेखांकित किया कि अन्य सह-आरोपियों को पहले ही जमानत मिल चुकी है, जबकि उसे 10 वर्ष की सजा सुनाई गई थी।