गुजरात सिविल जज भर्ती प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती, हाइकोर्ट और राज्य सरकार से जवाब तलब

Update: 2026-03-05 07:03 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) भर्ती प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिका पर गुजरात हाइकोर्ट और राज्य सरकार को नोटिस जारी किया। अदालत ने दोनों से जवाब मांगा है और मामले की अगली सुनवाई 12 मार्च को तय की।

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की पीठ ने 26 फरवरी को इस याचिका पर सुनवाई करते हुए नोटिस जारी किया।

यह याचिका संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत 20 अभ्यर्थियों ने दायर की, जिन्होंने भर्ती परीक्षा में भाग लिया था। याचिका में कहा गया कि भर्ती प्रक्रिया के परिणाम ने एक असामान्य स्थिति पैदा की, क्योंकि इंटरव्यू के लिए चुने गए उम्मीदवारों की संख्या ही घोषित रिक्तियों से कम हो गई।

भर्ती प्रक्रिया 30 जनवरी 2025 को जारी विज्ञापन के माध्यम से शुरू हुई, जिसमें सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के 212 पदों की घोषणा की गई। इसके बाद 29 जून, 2025 को प्रारंभिक परीक्षा आयोजित की गई, जिसमें 829 अभ्यर्थी मुख्य लिखित परीक्षा के लिए सफल घोषित हुए।

मुख्य परीक्षा 12 अक्टूबर, 2025 को आयोजित हुई। 22 जनवरी, 2026 को घोषित परिणाम में केवल 211 उम्मीदवारों को ही इंटरव्यू के लिए योग्य घोषित किया गया जबकि कुल रिक्तियां 212 थीं। याचिकाकर्ता इस सूची में शामिल नहीं हो सके।

याचिका में कहा गया कि यह स्थिति मूल्यांकन प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है, क्योंकि न्यायिक सेवा जैसी भर्ती में सामान्यतः इंटरव्यू के लिए रिक्तियों से कहीं अधिक उम्मीदवारों को चयनित किया जाता है, ताकि योग्यता का तुलनात्मक आकलन किया जा सके।

याचिकाकर्ताओं ने मुख्य परीक्षा के प्रश्नपत्र में भी गड़बड़ियों का आरोप लगाया। उनके अनुसार सिविल कानून के प्रश्नपत्र में एक प्रश्न घोषित पाठ्यक्रम से बाहर था, जबकि एक अन्य प्रश्न की बनावट ही त्रुटिपूर्ण थी, जिससे अभ्यर्थियों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हुई।

याचिका में कहा गया कि एक प्रश्न में अनिवार्य रूप से पंजीकरण योग्य दस्तावेजों के पंजीकरण न होने के प्रभाव के बारे में पूछा गया था, जो परीक्षा के घोषित पाठ्यक्रम में शामिल नहीं था।

अभ्यर्थियों का कहना है कि प्रतिस्पर्धी परीक्षा में कुछ अंकों का अंतर भी चयन या असफलता तय कर सकता है। ऐसे में यदि प्रश्नपत्र में पाठ्यक्रम से बाहर या त्रुटिपूर्ण प्रश्न हों तो परिणाम पर उसका गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए सभी अभ्यर्थियों को उपयुक्त राहत, जैसे ग्रेस अंक, दिए जाने चाहिए थे।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि मूल्यांकन प्रक्रिया में पारदर्शिता और समुचित मॉडरेशन का अभाव रहा तथा अंक देने का पैटर्न अत्यधिक कठोर दिखाई देता है। इसके कारण कई ऐसे अभ्यर्थी भी बाहर हो गए, जो पहले की भर्ती प्रक्रियाओं में इंटरव्यू तक पहुंच चुके थे।

याचिका के अनुसार गुजरात हाइकोर्ट ने इंटरव्यू की प्रक्रिया 2 फरवरी से 25 फरवरी, 2026 के बीच तय की थी और यह प्रक्रिया शुरू भी हो चुकी है।

इन परिस्थितियों में याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट से उत्तर पुस्तिकाओं के पुनर्मूल्यांकन, पाठ्यक्रम से बाहर और त्रुटिपूर्ण प्रश्नों पर सुधारात्मक कदम उठाने और पूरी भर्ती प्रक्रिया की निष्पक्षता की जांच कराने का अनुरोध किया। याचिका में यह भी कहा गया कि अदालत यह परखे कि क्या इस भर्ती प्रक्रिया में अपनाई गई मूल्यांकन प्रणाली सार्वजनिक रोजगार में निष्पक्षता, पारदर्शिता और समान अवसर के संवैधानिक मानकों पर खरी उतरती है।

Tags:    

Similar News