जो लोग फैसले से नाराज़ नहीं हैं, वे रिव्यू की मांग कर सकते हैं या उसे चुनौती दे सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-03-06 06:14 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने फिर कहा कि जो लोग किसी केस में पक्षकार नहीं थे, लेकिन फैसले से उन पर बुरा असर पड़ा है, उनके पास भी उपाय है और वे सही फोरम के सामने फैसले का रिव्यू कर सकते हैं या उसे चुनौती दे सकते हैं।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस अरविंद कुमार की बेंच ने केरल टेक्निकल एजुकेशन सर्विस में प्रमोशन को लेकर हुए विवाद से जुड़ी अपील पर फैसला सुनाते हुए यह बात कही।

कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सर्विस मामलों में कभी-कभी अदालती फैसले उन कर्मचारियों पर भी असर डाल सकते हैं, जो कार्रवाई में पक्षकार नहीं थे। ऐसी स्थितियों में वे लोग जो प्रभावित हुए, फैसले का रिव्यू कर सकते हैं या उसे चुनौती देने के लिए सही फोरम में जा सकते हैं।

के. अजीत बाबू बनाम यूनियन ऑफ़ इंडिया (1997) 6 SCC 473 के फैसले का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि हालांकि रिव्यू आमतौर पर सिर्फ़ केस की पार्टियों के लिए ही उपलब्ध होता है, लेकिन जो लोग अपने अधिकारों पर असर डालने वाले फैसले से नाराज़ हैं, वे भी कुछ खास वजहों से रिव्यू की मांग कर सकते हैं।

कोर्ट ने कहा कि सर्विस ज्यूरिस्प्रूडेंस में कुछ फैसले सिर्फ पक्षकारों के बीच ही लागू नहीं हो सकते, बल्कि उसी कैडर या सर्विस में दूसरों पर असर डालने वाले बड़े असर भी हो सकते हैं।

बेंच ने आगे रामा राव बनाम एम.जी. महेश्वर राव (2007) 14 SCC 54 पर भरोसा किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना सुने दिए गए फैसले से प्रभावित लोग अपनी शिकायतें बताने के लिए एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल में नए सिरे से जा सकते हैं।

इसने यूनियन ऑफ इंडिया बनाम नरेशकुमार बद्रीकुमार जगद (2019) 18 SCC 586 का भी ज़िक्र किया, जिसमें माना गया कि कार्रवाई में शामिल न होने वाला व्यक्ति भी ऑर्डर के रिव्यू की मांग कर सकता है, अगर वह यह दिखा सके कि वह "पीड़ित व्यक्ति" है।

Case : Dr Jiji KS v Shibu K

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