कारगिल में तैनात सैनिक को 'युद्ध चोट पेंशन' देने का फैसला बक़रार, सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की केंद्र सरकार की आपत्ति
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (28 अक्टूबर) को पूर्व सैनिक को 'युद्ध चोट पेंशन' (War Injury Pension) देने के फैसले को बरकरार रखा। यह पेंशन उन्हें उस बीमारी के लिए दी गई है, जो 'ऑपरेशन रक्षक' के तहत कारगिल में उनकी तैनाती के दौरान हुई थी।
जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने केंद्र सरकार की उस अपील को खारिज किया, जिसमें हाईकोर्ट और आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल (AFT) के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत पूर्व सैनिक को 'विकलांगता पेंशन' (Disability Pension) की जगह 'युद्ध चोट पेंशन' देने का फैसला लिया गया था।
साथ ही कोर्ट ने सरकार को सुझाव दिया कि वह 'युद्ध चोट पेंशन' के हकदार पूर्व सैनिकों की सेवाओं से जुड़े नियमों के लिए एक स्पष्ट और व्यापक कानून (Subordinate Legislation) बनाए। कोर्ट ने कहा कि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि रक्षा मंत्रालय (MoD) के कौन से नियम, कानून, निर्देश और नीतियां इन पर लागू होती हैं।
कोर्ट ने कहा,
"हमें हैरानी है कि लागू होने वाले नियमों को लेकर अभी भी इतनी अनिश्चितता क्यों है। अब समय आ गया है कि रक्षा मंत्रालय इन सेवाओं के लिए एक स्पष्ट और व्यापक कानून बनाए। यह निष्पक्ष कार्रवाई और सुशासन के लिए जरूरी है।"
मामले की पृष्ठभूमि
नरेंद्र कुमार दिसंबर 1996 में भारतीय सेना में शामिल हुए और जुलाई 2003 से जुलाई 2005 तक कारगिल में तैनात थे। इस तैनाती के दौरान, जनवरी 2005 में उन्हें 'सीरोपॉजिटिव रुमेटीइड अर्थराइटिस' (एक प्रकार का गठिया) होने का पता चला। बाद में पश्चिम बंगाल में तैनाती के दौरान उन्हें रीढ़ की हड्डी से जुड़ी दो और बीमारियां हो गईं।
जनवरी 2013 में जब वे सेवा से रिटायर हुए तो 'रिलीज मेडिकल बोर्ड' ने उनकी विकलांगता को सैन्य सेवा के कारण और भी गंभीर माना और इसे 70% आंका, जिसे जीवन भर के लिए 75% मान लिया गया। उन्हें 'विकलांगता पेंशन' दी गई, जिसमें सेवा और विकलांगता दोनों के हिस्से शामिल थे।
लगभग छह साल बाद कुमार ने 'आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल' (AFT) में 'युद्ध चोट पेंशन' के लिए आवेदन किया। उन्होंने तर्क दिया कि उन्हें हुआ गठिया (रुमेटीइड अर्थराइटिस) सीधे तौर पर 'ऑपरेशन रक्षक' के तहत कारगिल में उनकी तैनाती से जुड़ा है। AFT ने अप्रैल 2024 में उनका दावा स्वीकार कर लिया। उनका मानना था कि यह बीमारी कारगिल में तैनाती के दौरान शुरू हुई थी। साथ ही, मंत्रालय की यह आपत्ति कि विकलांगता दुश्मन की कार्रवाई या वैसी ही किसी स्थिति के कारण नहीं हुई, बेबुनियाद थी। अगस्त 2025 में हाई कोर्ट ने भी इस फैसले को बरकरार रखा।
केंद्र सरकार की अपील
केंद्र सरकार का लगातार यही तर्क रहा कि चूंकि संबंधित कर्मी जम्मू-कश्मीर में 'ऑपरेशन रक्षक' (जो 1990 से चल रहा है) के तहत तैनात थे, इसलिए वे रक्षा मंत्रालय के 31.01.2001 के पॉलिसी लेटर के पैरा 4.1, कैटेगरी E(i) के तहत 'युद्ध में लगी चोट के लिए पेंशन' (War Injury Pension) पाने के हकदार नहीं हैं।
सरकार का कहना था कि 'ऑपरेशन रक्षक' को पैरा 4.1, कैटेगरी E(i) के तहत विशेष रूप से अधिसूचित (notified) नहीं किया गया। इसलिए कर्मी को हुआ 'रूमेटाइड आर्थराइटिस' (सीरोपॉजिटिव) 'युद्ध में लगी चोट' की श्रेणी में नहीं आता है।
संक्षेप में, केंद्र सरकार का पक्ष यह था कि कैटेगरी E(i) में केवल वे ऑपरेशन शामिल होंगे, जिन्हें सरकार ने विशेष रूप से अधिसूचित किया है, जैसे 'ऑपरेशन सिंदूर' या 'ऑपरेशन स्नो लेपर्ड' आदि। इसमें 'ऑपरेशन रक्षक' (पूरे जम्मू-कश्मीर में) या 'ऑपरेशन राइनो' (पूरे असम में) जैसे चल रहे ऑपरेशन शामिल नहीं होंगे।
केंद्र सरकार के इस तर्क को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि किसी ऑपरेशन को रक्षा मंत्रालय की पॉलिसी के पैरा 4.1, कैटेगरी E(i) के तहत अधिसूचित किया गया है तो उस ऑपरेशन के दौरान कर्मी को होने वाली कोई भी बीमारी उसे 'युद्ध में लगी चोट के लिए पेंशन' का दावा करने का हकदार बनाती है।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
" एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) के मौखिक बयान के अलावा कि 'ऑपरेशन रक्षक' को कैटेगरी E(i) के दायरे में नहीं रखा जाना चाहिए। हमारे पास ऐसा कोई आधार नहीं है, जिससे 'ऑपरेशन रक्षक' को इस कैटेगरी से बाहर रखा जा सके।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"अगर पॉलिसी बनाने वाला अपनी ही पॉलिसी की व्याख्या इस तरह करता है, जो उसकी स्पष्ट भाषा के खिलाफ हो, या जो भेदभावपूर्ण, मनमानी, तर्कहीन हो, या फिर पॉलिसी के मूल उद्देश्य के ही खिलाफ हो, तो अदालतें ऐसी व्याख्या को नहीं मानेंगी।"
अदालत ने आगे कहा,
“जब किसी नीति की भाषा पर कोई प्रतिबंध न हो तो अदालत का यह काम नहीं है कि वह व्याख्या की प्रक्रिया के ज़रिए इसके दायरे को सीमित करे, ख़ासकर तब जब यह नीति पेंशन संबंधी लाभ देने से जुड़ी हो। ऐसी स्थिति में एक उदार व्याख्या अपनाना ज़रूरी हो जाता है, और इस अदालत ने ऐसी नीतियों की व्याख्या करते समय हमेशा इसी दृष्टिकोण को अपनाया है।”
अदालत ने केंद्र सरकार को यह भी सुझाव दिया,
“श्रेणी E(i) के तहत किसी गतिविधि को अधिसूचित करते समय, सरकार को स्पष्ट रूप से यह बताना चाहिए कि 31.01.2001 के रक्षा मंत्रालय (MoD) नीति पत्र के पैरा 4.1, श्रेणी E(i) में बताए गए पेंशन संबंधी लाभ, उस अधिसूचना पर लागू होंगे या नहीं।”
परिणामस्वरूप, अपील ख़ारिज की गई।
Case Title : UNION OF INDIA & ORS. VERSUS NARENDER KUMAR