सुप्रीम कोर्ट का निर्देश: 'मानव तस्करी विरोधी इकाइयों' को पुलिस स्टेशन का दर्जा देने के लिए अधिसूचना जारी करें राज्यों और केंद्र शासित प्रदेश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे कानून के अनुसार उचित अधिसूचना जारी करके 'मानव तस्करी विरोधी इकाइयों' (ATHUs) को पुलिस स्टेशन का दर्जा दें। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि मानव तस्करी से निपटने के लिए उसकी 'पीड़ित सुरक्षा योजना' (Victim Protection Plan) को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए यह कदम उठाना जरूरी है।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की खंडपीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के गृह विभागों को इस निर्देश को जल्द-से-जल्द लागू करने का आदेश दिया। कोर्ट ने केंद्र सरकार से भी कहा है कि वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ इस मुद्दे पर बात करे और यह सुनिश्चित करे कि जरूरी अधिसूचनाएं जारी कर दी जाएं।
यह निर्देश एक चल रही सुनवाई के दौरान दिया गया, जिसमें कोर्ट महिलाओं और बच्चों की मानव तस्करी (व्यावसायिक यौन शोषण के उद्देश्य से) से जुड़े अपने 29 मई, 2026 के फैसले के पालन की समीक्षा कर रहा था।
याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट अपर्णा भट ने कोर्ट का ध्यान इस ओर दिलाया कि मुख्य फैसले के पैराग्राफ 362(b)(iii) के अनुसार, ATHUs को पुलिस स्टेशन का दर्जा दिया जाना चाहिए।
इस दलील को स्वीकार करते हुए कोर्ट ने आदेश दिया:
"इस संबंध में हम सभी राज्य/केंद्र शासित प्रदेश सरकारों और उनके गृह विभागों को निर्देश देते हैं कि वे कानून के अनुसार उचित अधिसूचना जारी करके इस निर्देश को जल्द से जल्द लागू करें।"
कोर्ट ने आगे कहा कि केंद्र सरकार को भी "सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के साथ जल्द से जल्द इस मुद्दे पर बात करनी चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उचित अधिसूचनाएं जारी कर दी जाएं।"
यह निर्देश कोर्ट के उस व्यापक प्रयास का हिस्सा है, जिसका उद्देश्य संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत तैयार की गई 'पीड़ित सुरक्षा योजना' को प्रभावी ढंग से लागू करना है।
खंडपीठ ने गौर किया कि मुख्य फैसले के पैराग्राफ 456 में दिए गए चार अतिरिक्त निर्देशों का सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों द्वारा पूरी तरह से पालन नहीं किया गया। इनमें शामिल हैं: 'अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956' की धारा 15(6A) और 17A के तहत मान्यता प्राप्त कल्याणकारी संस्थानों को अधिसूचित करना; और राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में पात्र समाज कल्याण कार्यकर्ताओं की सूची तैयार करना। और पुलिस नोडल अधिकारियों तथा सरकारी नोडल अधिकारियों को नियुक्त करना।
अदालत ने कहा कि 'पीड़ित संरक्षण योजना' (Victim Protection Plan) को "जमीनी स्तर पर लागू करने" के लिए ये उपाय "बेहद जरूरी" हैं, और केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक इनका पूरी तरह से पालन सुनिश्चित किया जाए।
अदालत ने केंद्र सरकार से यह भी कहा कि वह सभी संबंधित पक्षों से इस योजना को लागू करने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी जुटाए और एक नई स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करे।
इस मामले की अगली सुनवाई 14 दिसंबर, 2026 को होगी।
Case Title : Prajwala v. Union of India