विकास के लिए मंज़ूर ज़मीन पर बाद में उगने वाले पेड़ उसे 'डीम्ड फ़ॉरेस्ट' नहीं बना देंगे: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि किसी नोटिफ़ाइड मास्टर प्लान के तहत विकास के लिए तय की गई ज़मीन को सिर्फ़ बाद में पेड़-पौधे या पेड़ उग जाने की वजह से "डीम्ड फ़ॉरेस्ट" (माना गया जंगल) नहीं माना जा सकता। इसलिए ऐसे बाद में उगे पेड़ों को काटने के लिए वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 के तहत केंद्र सरकार की पहले से मंज़ूरी लेने की ज़रूरत नहीं होगी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने दिल्ली के बिजवासन रेलवे स्टेशन पर रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट को मंज़ूरी देने वाले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) का आदेश सही ठहराया। इस प्रोजेक्ट पर इस आधार पर आपत्ति जताई गई कि यह रीडेवलपमेंट ऐसी ज़मीन पर किया जा रहा था, जिसे बाद में पेड़ों के उगने की वजह से 'डीम्ड फ़ॉरेस्ट' का दर्जा मिल गया।
अपील खारिज करते हुए और रीडेवलपमेंट प्लान को मंज़ूरी देते हुए कोर्ट ने कहा:
"...जहां मास्टर प्लान में पेड़ों के होने का ज़िक्र नहीं है या ज़मीन को जंगल से ढकी हुई ज़मीन के तौर पर नहीं बताया गया, वहां समय के साथ पेड़-पौधों का बाद में उगना या बढ़ना, अपने आप में उस ज़मीन को 'डीम्ड फ़ॉरेस्ट' के दायरे में नहीं ला सकता, जिससे पहले से तय की गई प्लानिंग की रूपरेखा में कोई बदलाव हो... अगर ज़मीन का इस्तेमाल न करने या इस्तेमाल करने की वजह से प्राकृतिक या इंसानी दखल के चलते कुछ बदलाव आते हैं तो भी इसका प्रोजेक्ट पर कोई असर नहीं पड़ेगा, जब भी उस प्रोजेक्ट को मास्टर प्लान के मुताबिक और उसके तहत पूरा किया जाएगा। दूसरे शब्दों में मास्टर प्लान की पवित्रता और कानूनी रूप से बाध्यकारी शक्ति को ही प्राथमिकता मिलेगी और वही मान्य होगी।"
यह मामला रेल लैंड डेवलपमेंट अथॉरिटी (RLDA) द्वारा शुरू किए गए एक री-डेवलपमेंट प्रोजेक्ट से जुड़ा है। RLDA ने दिसंबर 2022 में बिजवासन रेलवे स्टेशन के पास 12.4 हेक्टेयर ज़मीन के टुकड़े पर 'मिक्स्ड-यूज़ डेवलपमेंट' (कई तरह के इस्तेमाल वाला विकास) करने के लिए 'रिक्वेस्ट फ़ॉर प्रपोज़ल' (RFP) जारी किया था।
यह ज़मीन 1986 में खेती की ज़मीन के तौर पर, जिस पर उस समय फ़सलें खड़ी थीं, अधिग्रहित की गई। इसे 2008 में एक 'इंटीग्रेटेड मेट्रोपॉलिटन पैसेंजर टर्मिनल' बनाने के लिए रेलवे को सौंप दिया गया। इसके अलावा, 2021 में दिल्ली के मास्टर प्लान के तहत इस ज़मीन को 'मल्टी-यूज़ डेवलपमेंट' के लिए वर्गीकृत किया गया। इस प्रोजेक्ट को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में चुनौती दी गई। याचिकाकर्ता ने दलील दी कि 1,100 से ज़्यादा पेड़ों की मौजूदगी की वजह से यह ज़मीन "डीम्ड फ़ॉरेस्ट" (माना हुआ जंगल) बन गई है। इसके लिए उन्होंने T.N. Godavarman Thirumulkpad बनाम Union of India मामले में तय किए गए सिद्धांतों का हवाला दिया।
NGT ने उक्त याचिका खारिज की। NGT ने कहा कि यह ज़मीन जंगल की ज़मीन नहीं है, क्योंकि यह पूरी तरह से शहरी इलाके में मौजूद है। इसके आस-पास पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई।
NGT का फैसला सही ठहराते हुए जस्टिस मसीह ने अपने फैसले में कहा कि "सिर्फ़ पेड़-पौधों या पेड़ों की मौजूदगी को ही अपने आप में एक प्राकृतिक जंगल के इकोसिस्टम के बराबर नहीं माना जा सकता।"
कोर्ट ने अपीलकर्ता की इस दलील को खारिज किया कि T.N. Godavarman मामले के आधार पर इस ज़मीन को 'डीम्ड फ़ॉरेस्ट' घोषित किया जाए।
कोर्ट ने कहा,
"यह तय करना कि ज़मीन का कोई खास टुकड़ा 'जंगल' या 'डीम्ड फ़ॉरेस्ट' की परिभाषा में आता है या नहीं, अकेले तौर पर नहीं किया जा सकता। इस तरह के दावे पर विचार करते समय ज़मीन के ऐतिहासिक स्वरूप, रेवेन्यू और प्लानिंग रिकॉर्ड में दर्ज वर्गीकरण, और उन परिस्थितियों को ध्यान में रखना ज़रूरी है जिनके तहत इस ज़मीन का इस्तेमाल शुरू हुआ।"
यह देखते हुए कि यह ज़मीन पूरी तरह से शहरी इलाके में मौजूद है। इसके आस-पास काफ़ी विकास हो चुका है, कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ कुछ बाहरी प्रजातियों के पेड़-पौधों के उग जाने से, जिनका इस ज़मीन पर पहले से मौजूद होने का कोई ऐतिहासिक रिकॉर्ड नहीं है, इस ज़मीन को "डीम्ड फ़ॉरेस्ट" का दर्जा नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
"स्थानीय पेड़-पौधों में ऐसी प्रजातियां शामिल होती हैं, जो किसी खास भौगोलिक क्षेत्र में ही विकसित हुई होती हैं और वहां के प्राकृतिक इकोसिस्टम का हिस्सा होती हैं। ये प्रजातियां वन्यजीवों, परागण करने वाले जीवों और ज़मीन से जुड़ी प्रक्रियाओं को सहारा देकर जैव विविधता और इकोलॉजिकल संतुलन बनाए रखती हैं। साथ ही ये वहां के स्थानीय मौसम और पानी से जुड़ी स्थितियों के हिसाब से खुद को ढाल लेती हैं। इसके विपरीत, बाहरी प्रजातियां ऐसी होती हैं, जिन्हें उनके प्राकृतिक क्षेत्र से बाहर से लाया जाता है। ये प्रजातियां बहुत तेज़ी से फैलती हैं और वहां के मूल पेड़-पौधों की जगह ले लेती हैं।"
कोर्ट ने आगे कहा,
“सिर्फ़ पेड़-पौधों का बढ़ जाना—खासकर जहां उनमें ऐसी बाहरी प्रजातियां शामिल हों जो इंसानों के पुराने दखल की वजह से वहां पहुंची हों—इसका मतलब यह ज़रूरी नहीं है कि वहाँ कोई प्राकृतिक जंगल का इकोसिस्टम मौजूद है।”
नतीजतन, अपील खारिज की गई और यह फ़ैसला दिया गया:
“एक ठीक से मंज़ूर किया गया और नोटिफ़ाई किया गया मास्टर प्लान कानूनी तौर पर मान्य होता है और ज़मीन के इस्तेमाल और शहरी विकास के लिए एक गवर्निंग फ़्रेमवर्क देता है। इस प्लान पर सिर्फ़ इसलिए रोक नहीं लगाई जा सकती कि बाद में पेड़-पौधों या पेड़ों की बढ़त में कोई बदलाव आ गया हो—खासकर तब, जब इस बढ़त में ऐसी बाहरी प्रजातियां शामिल हों, जो प्राकृतिक जंगल के इकोसिस्टम का हिस्सा न हों। अगर कोई ऐसा समकालीन सबूत मौजूद न हो जिससे यह साबित होता हो कि मास्टर प्लान बनाते समय उस ज़मीन का स्वरूप जंगल जैसा था, तो बाद में पेड़-पौधों के बढ़ जाने से उस ज़मीन की कानूनी स्थिति नहीं बदल सकती और न ही मास्टर प्लान के तहत सोचे गए विकास कार्यों में कोई रुकावट आ सकती है। इसलिए मास्टर प्लान ही मान्य होगा। उस ज़मीन को 'माना गया जंगल' (Deemed Forest) नहीं माना जा सकता; नतीजतन, 1980 के एक्ट की धारा 2 के तहत केंद्र सरकार से किसी भी तरह की अनुमति या मंज़ूरी लेने की ज़रूरत नहीं होगी।”
Cause Title: NAVEEN SOLANKI AND ANOTHER VERSUS RAIL LAND DEVELOPMENT AUTHORITY AND OTHERS