पूर्व सांसद सुभाषिनी अली ने संसदीय विशेषाधिकारों पर सुप्रीम कोर्ट के 7-जज रेफरेंस में हस्तक्षेप की अनुमति मांगी
पूर्व लोकसभा सांसद और CPI(M) पोलित ब्यूरो की पूर्व सदस्य सुभाषिनी अली ने सुप्रीम कोर्ट में आवेदन दाखिल कर संविधान के अनुच्छेद 105 और 194 के तहत संसदीय/विधायी विशेषाधिकारों के दायरे और सीमाओं से जुड़े लंबित संवैधानिक रेफरेंस में हस्तक्षेप करने की अनुमति मांगी है।
अली ने कहा है कि एक पूर्व सांसद के रूप में उनका व्यक्तिगत विधायी अनुभव इस संवैधानिक सवाल पर अदालत की सहायता कर सकता है। वह 1989 में कानपुर से लोकसभा सदस्य रही हैं और 2014 से 2024 तक CPI(M) पोलित ब्यूरो की सदस्य थीं।
गैर-सदस्यों के खिलाफ विशेषाधिकार के इस्तेमाल पर सवाल
अपने आवेदन में अली ने विशेष रूप से इस सवाल को उठाया है कि संसद या विधानमंडल के विशेषाधिकारों का इस्तेमाल सदन के बाहर नागरिकों या मीडिया के खिलाफ भाषण, रिपोर्टिंग या आलोचना के मामलों में किस सीमा तक किया जा सकता है।
उनका तर्क है कि संसदीय विशेषाधिकारों का उद्देश्य विधायिकाओं को स्वतंत्र और प्रभावी ढंग से काम करने में सक्षम बनाना है। इन्हें संसद या उसके सदस्यों को सार्वजनिक आलोचना से बचाने वाली सामान्य शक्ति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
अली के अनुसार, किसी गैर-सदस्य के खिलाफ विशेषाधिकार का इस्तेमाल तभी उचित हो सकता है जब उसके भाषण या रिपोर्टिंग का विधानमंडल के कामकाज में वास्तविक और निकट संबंध वाला अवरोध हो।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा सवाल
आवेदन में कहा गया है कि किसी गैर-सदस्य को बाहरी भाषण या रिपोर्टिंग के लिए बुलाना, गिरफ्तार करना, हिरासत में लेना या दंडित करना संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीधे प्रभावित करता है।
अली ने यह भी तर्क दिया है कि अनुच्छेद 105 और 194 ऐसे सार्वजनिक अधिकार-क्षेत्र का निर्माण नहीं कर सकते जो मौलिक अधिकारों और न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह बाहर हो, खासकर तब जब विशेषाधिकार का इस्तेमाल नागरिकों की अभिव्यक्ति या स्वतंत्रता को प्रभावित करता हो।
पुराने फैसलों पर पुनर्विचार की मांग
अली ने अपने आवेदन में M.S.M. Sharma v. Sri Krishna Sinha (Searchlight case) और Special Reference No. 1 of 1964 (Keshav Singh case) में निर्धारित सिद्धांतों की वर्तमान संवैधानिक व्यवस्था के संदर्भ में समीक्षा करने का आग्रह किया है।
उन्होंने Raja Ram Pal v. Speaker, Lok Sabha और Amarinder Singh v. Special Committee, Punjab Vidhan Sabha जैसे फैसलों का भी हवाला दिया है, जिनमें सुप्रीम कोर्ट ने संसदीय विशेषाधिकारों के इस्तेमाल की संवैधानिक सीमाओं और न्यायिक समीक्षा के पहलुओं पर विचार किया था।
अली ने 2024 के सात जजों की संविधान पीठ के फैसले Sita Soren v. Union of India का भी उल्लेख किया है। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने विधायी विशेषाधिकारों की प्रकृति और उनके विधायिका के सामूहिक कामकाज से संबंध पर विस्तार से विचार किया था।
पत्रकारों और नागरिकों की अभिव्यक्ति पर विशेषाधिकार की सीमा
आवेदन में कहा गया है कि यदि विशेषाधिकार का इस्तेमाल सदन के बाहर पत्रकारों, संपादकों, प्रकाशकों या आम नागरिकों की आलोचना और रिपोर्टिंग के खिलाफ किया जाता है, तो अदालत को स्पष्ट संवैधानिक मानक तय करने चाहिए।
अली का सीमित तर्क है कि विशेषाधिकार स्वयं एक संवैधानिक शक्ति है, इसलिए उसका प्रयोग भी संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर होना चाहिए।
यह मामला विशेष रूप से इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि लंबित रेफरेंस में यह भी विचार होना है कि क्या विधानमंडल के विशेषाधिकार नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रभाव डाल सकते हैं और किन परिस्थितियों में किसी भाषण या प्रकाशन को breach of privilege माना जा सकता है।
कुणाल कामरा और पत्रकारों ने भी हस्तक्षेप की मांग की
सुभाषिनी अली से पहले स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा और पत्रकार अजीत अंजुम तथा सीमा चिश्ती सहित अन्य लोगों ने भी इस संवैधानिक रेफरेंस में हस्तक्षेप की अनुमति मांगने के लिए आवेदन दाखिल किए हैं।
कुणाल कामरा ने अपने आवेदन में कहा है कि विधायी विशेषाधिकारों का इस्तेमाल नागरिकों की अभिव्यक्ति को दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। वहीं पत्रकारों ने विशेषाधिकार और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच संवैधानिक संतुलन को स्पष्ट करने की मांग की है।
7 जजों की बेंच 6 अक्टूबर से करेगी सुनवाई
यह संवैधानिक रेफरेंस N. Ravi v. Speaker, Legislative Assembly Chennai से संबंधित है। सुप्रीम कोर्ट की 7 जजों की संविधान पीठ 6 अक्टूबर 2026 से इस मामले की सुनवाई शुरू करेगी।
इसमें मुख्य सवालों में विधायी विशेषाधिकारों और अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संबंध तथा सदन के बाहर नागरिकों और पत्रकारों के खिलाफ विशेषाधिकार की कार्रवाई की संवैधानिक सीमा शामिल है।