धार्मिक स्वतंत्रता की व्याख्या सुधारवादी आवाज़ों को खामोश न करे : सुप्रीम कोर्ट में दलील

Update: 2026-05-13 10:09 GMT

सबरीमला मामले की सुनवाई के दौरान बुधवार को सुप्रीम कोर्ट की 9-न्यायाधीशों की संविधान पीठ के सामने धार्मिक स्वतंत्रता, सामाजिक सुधार और संविधान की व्याख्या को लेकर महत्वपूर्ण बहस हुई। डॉ. जी मोहन गोपाल ने कोर्ट से कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता की संवैधानिक व्याख्या ऐसी नहीं होनी चाहिए, जो धर्मों के भीतर से उठने वाली सुधारवादी आवाज़ों को “खामोश” कर दे।

Sree Narayana Manava Dharmam Trust की ओर से हस्तक्षेपकर्ता के रूप में पेश हुए डॉ. गोपाल ने कहा कि यह मामला केवल मौलिक अधिकारों और धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों के टकराव का नहीं है, बल्कि उन सामाजिक न्याय की मांगों का भी है जो स्वयं धार्मिक समुदायों के भीतर से उठती हैं।

उन्होंने कहा कि 19वीं सदी के कई बड़े सामाजिक सुधार आंदोलन धर्मों के भीतर से ही उभरे थे और श्री नारायण गुरु जैसे सुधारकों ने समाज में बदलाव का नेतृत्व किया। इसलिए संविधान की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए, जिससे धर्मों के भीतर मौजूद सुधारवादी परंपराओं को जगह मिल सके।

सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने टिप्पणी की कि यदि किसी धर्म के भीतर से सुधार की मांग उठती है, तो वह भी अनुच्छेद 25 के तहत संरक्षित हो सकती है।

इस पर डॉ. गोपाल ने कहा कि पिछले 75 वर्षों की न्यायिक व्याख्याओं ने धर्म के भीतर मौजूद सुधारवादी आवाज़ों को प्रभावी रूप से “साइलेंस” कर दिया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान संदर्भ सुप्रीम कोर्ट के लिए एक ऐतिहासिक अवसर है, जिसमें संविधान बदले बिना उसकी व्याख्या के ढांचे को पुनर्संतुलित किया जा सकता है।

डॉ. गोपाल ने संविधान सभा में डॉ. बी.आर. आंबेडकर द्वारा प्रस्तुत 1947 के दस्तावेज़ का हवाला देते हुए कहा कि उसमें धार्मिक स्वतंत्रता के तहत “profess, preach and convert” शब्द थे, लेकिन “practice” शब्द शामिल नहीं था। उन्होंने तर्क दिया कि यह omission महत्वपूर्ण था और धार्मिक संरचनाओं के भीतर मौजूद उत्पीड़न की ऐतिहासिक समझ को दर्शाता है।

उन्होंने 1966 के Swami Yagnapurushdasji case फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि हिंदू धर्म की एकरूप परिभाषा देना उचित नहीं है। उन्होंने कहा कि हर हिंदू वेदों को अंतिम प्रामाणिक स्रोत नहीं मानता, इसलिए हिंदू धर्म को केवल पुरोहितवादी व्याख्या तक सीमित नहीं किया जा सकता।

इस पर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा कि हिंदू धर्म को अक्सर “जीवन जीने के तरीके” के रूप में समझा गया है और कोई व्यक्ति मंदिर न जाए या धार्मिक अनुष्ठान न करे, तब भी वह हिंदू रह सकता है।

डॉ. गोपाल ने चेतावनी दी कि यदि किसी भी समूह को खुद को धार्मिक संप्रदाय घोषित कर संविधान के भाग-III के मौलिक अधिकारों से ऊपर रखने की अनुमति दे दी गई, तो यह धार्मिक स्वतंत्रता की गंभीर गलत व्याख्या होगी। उन्होंने कहा, “असल मुद्दा ईश्वर में आस्था बनाम पादरियों/पुरोहितों में आस्था का है। व्यक्तिगत अंतरात्मा से उत्पन्न ईश्वर में विश्वास को पुरोहितवादी नियंत्रण से दबाया नहीं जाना चाहिए।”

ट्रस्ट की लिखित दलीलों में कहा गया कि संविधान भारत में धर्म को “संविधान से बाहर एक स्वायत्त और धर्मतांत्रिक क्षेत्र” नहीं बनाता। ट्रस्ट ने तर्क दिया कि अनुच्छेद 25 व्यक्ति की अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जबकि अनुच्छेद 26 केवल धार्मिक संस्थाओं को प्रबंधन का अधिकार देता है, न कि लोगों के मौलिक अधिकारों को सीमित करने की शक्ति।

ट्रस्ट ने यह भी कहा कि यदि महिलाओं के सबरीमला प्रवेश पर प्रतिबंध को बनाए रखना है, तो इसके लिए संसद या विधानमंडल को कानून बनाना चाहिए, न कि अदालतें पुरोहितवादी अधिकारों को संवैधानिक मान्यता दें।

दलीलों में यह भी कहा गया कि “संवैधानिक नैतिकता” ही अनुच्छेद 25 और 26 में प्रयुक्त “morality” का वास्तविक अर्थ है। यदि धार्मिक प्रथाओं का उपयोग बहिष्कार और भेदभाव कायम रखने के लिए किया जाता है, तो अदालतों का हस्तक्षेप संवैधानिक आवश्यकता बन जाता है।

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