S.35L Central Excise Act | एक्साइज़ेबिलिटी के सवाल पर अपील का फ़ैसला सिर्फ़ सुप्रीम कोर्ट कर सकता है, हाईकोर्ट नहीं: एससी

Update: 2026-06-04 12:30 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि सामान की एक्साइज़ेबिलिटी से जुड़े विवाद उसके खास अपीलीय अधिकार क्षेत्र में आते हैं और सेंट्रल एक्साइज़ एक्ट, 1944 की धारा 35G के तहत हाईकोर्ट उनका फ़ैसला नहीं कर सकते।

कोर्ट ने फ़ैसला दिया,

"एक्साइज़ ड्यूटी की दर या असेसमेंट के मकसद से सामान की कीमत से जुड़े किसी भी सवाल के निर्धारण के संबंध में अपीलीय ट्रिब्यूनल द्वारा पारित आदेश के खिलाफ़ अपील इस कोर्ट में की जा सकती है, हाईकोर्ट में नहीं। हालांकि, यह रोक ड्यूटी की दर या सामान की कीमत से जुड़े हर सवाल पर लागू नहीं होती। सवाल का असेसमेंट से सीधा और करीबी संबंध होना चाहिए। सामान की एक्साइज़ेबिलिटी का सवाल असेसमेंट के मकसद से ड्यूटी की दर से जुड़ा होता है। सामान की एक्साइज़ेबिलिटी पर फ़ैसला, ड्यूटी की दर या सामान की कीमत से जुड़े किसी भी सवाल के निर्धारण से पहले का कदम होगा।"

कोर्ट ने यह भी फ़ैसला दिया कि बिल्डिंग की ज़रूरतों के हिसाब से एल्युमिनियम कंपोजिट पैनल (ACPs) की कटिंग, ग्रूविंग और रूटिंग करना एक्ट की धारा 2(f) के तहत "मैन्युफैक्चरिंग" नहीं माना जाएगा, क्योंकि इस प्रक्रिया से कोई अलग कमर्शियल प्रोडक्ट नहीं बनता।

जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया, जिसमें कहा गया था कि यह काम मैन्युफैक्चरिंग माना जाएगा और इस पर एक्साइज़ ड्यूटी लगेगी। कोर्ट ने कस्टम्स, एक्साइज़ एंड सर्विस टैक्स अपीलीय ट्रिब्यूनल (CESTAT) का रुख बहाल किया, जिसने करदाता (एक कंस्ट्रक्शन कॉन्ट्रैक्टर) के पक्ष में फ़ैसला दिया था।

यह मामला कंपनी द्वारा इंपोर्ट किए गए और बिल्डिंगों के बाहरी हिस्से (Exterior Cladding) में इस्तेमाल किए गए ACPs से जुड़े विवाद से उठा था। इंपोर्ट के बाद करदाता के परिसर में ACPs को ज़रूरी साइज़ में काटा गया और उनके पिछले हिस्से पर खांचे (Grooves) बनाए गए। फिर इन पैनलों को प्रोजेक्ट साइटों पर लगाए गए फ्रेम पर फ़िक्स किया गया।

रेवेन्यू विभाग ने सितंबर 2004 में एक 'शो कॉज़ नोटिस' जारी किया, जिसमें आरोप लगाया गया कि ACPs की कटिंग, ग्रूविंग और असेंबलिंग की प्रक्रिया मैन्युफैक्चरिंग मानी जाएगी। अप्रैल 2002 से दिसंबर 2003 की अवधि के लिए 21,46,437 रुपये की एक्साइज़ ड्यूटी, साथ ही ब्याज और जुर्माना देने की मांग की गई। CESTAT ने यह माना कि कोई नया उत्पाद अस्तित्व में नहीं आया था और राजस्व विभाग कथित निर्मित वस्तुओं की बाज़ार में बिकने की क्षमता (Marketability) साबित करने में विफल रहा था। कर्नाटक हाईकोर्ट ने बाद में राजस्व विभाग के मामले को बहाल कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप यह अपील सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की गई।

राजस्व विभाग ने केंद्रीय उत्पाद शुल्क अधिनियम की धारा 35G के तहत कर्नाटक हाईकोर्ट में CESTAT के आदेश को चुनौती दी थी। करदाता ने यह तर्क दिया कि यह विवाद वस्तुओं पर उत्पाद शुल्क लगने की योग्यता (Excisability) से संबंधित है, इसलिए धारा 35L के तहत इस अपील की सुनवाई केवल सुप्रीम कोर्ट ही कर सकता है।

धारा 35G में CESTAT से हाईकोर्ट्स में कानून के महत्वपूर्ण प्रश्नों पर अपील करने का प्रावधान है, लेकिन इसमें उत्पाद शुल्क की दर या मूल्यांकन के लिए वस्तुओं के मूल्य निर्धारण से संबंधित विवादों को शामिल नहीं किया गया। ऐसे मामलों में धारा 35L के तहत सीधे सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है।

सुप्रीम कोर्ट ने धारा 35G और 35L का विश्लेषण किया और यह माना कि वस्तुओं पर उत्पाद शुल्क लगने की योग्यता से संबंधित प्रश्न सीधे तौर पर शुल्क की दर और मूल्यांकन से जुड़े होते हैं। इसलिए ऐसे विवाद उन मामलों की श्रेणी में आते हैं, जिनकी अपील केवल सुप्रीम कोर्ट में ही की जा सकती है।

न्यायालय ने यह टिप्पणी की कि धारा 35L के तहत प्रयुक्त वाक्यांश "किसी ऐसे प्रश्न का निर्धारण जिसका संबंध उत्पाद शुल्क की दर से हो, अथवा मूल्यांकन के प्रयोजनों के लिए वस्तुओं के मूल्य से हो" का दायरा काफी व्यापक है। न्यायालय ने यह भी कहा कि कोई वस्तु उत्पाद शुल्क के दायरे में आती है या नहीं, इस पर निर्णय लेना, उस पर लागू होने वाली शुल्क की दर तय करने से पहले का एक आवश्यक कदम है। इसलिए इसका मूल्यांकन के साथ प्रत्यक्ष और निकट का संबंध है।

धारा 35L(2), जिसे वर्ष 2014 में जोड़ा गया, यह स्पष्ट करती है कि वस्तुओं की कर-योग्यता (Taxability) या उत्पाद शुल्क-योग्यता (Excisability) का निर्धारण धारा 35L(1)(b) के तहत प्रयुक्त वाक्यांश "किसी ऐसे प्रश्न का निर्धारण जिसका संबंध शुल्क की दर से हो" के अंतर्गत ही शामिल माना जाएगा। न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि यह प्रावधान केवल स्पष्टीकरण के उद्देश्य से है। इस संशोधन के माध्यम से केवल उसी बात को स्पष्ट रूप से व्यक्त किया गया, जो वैधानिक योजना में पहले से ही निहित थी। अतः, न्यायालय के निर्णय के अनुसार, यह प्रावधान भूतलक्षी प्रभाव (Retrospectively) से लागू होता है।

निर्माण के मुख्य मुद्दे पर कोर्ट ने कहा कि एक्साइज़ ड्यूटी लगाने के लिए दो शर्तों का पूरा होना ज़रूरी है। पहली, इस प्रक्रिया से ऐसी अलग चीज़ें बननी चाहिए, जिनका कोई नया नाम, रूप, पहचान या इस्तेमाल हो। दूसरी, बदली हुई चीज़ें बाज़ार में बिकने लायक हों या उन्हें अलग चीज़ों के तौर पर बाज़ार में बेचा जा सके।

इस कसौटी को लागू करते हुए कोर्ट ने पाया कि ACPs को काटने, उनमें खांचे बनाने और मोड़ने के बाद भी वे ACPs ही रहीं। कोर्ट ने कहा कि उत्पाद का मूल रूप नहीं बदला और इस प्रक्रिया से बस पैनलों को ग्राहक की ज़रूरत के हिसाब से लगाने लायक बनाया गया। कोर्ट ने कहा कि इस काम से बस उनके आकार और रूप में बदलाव आया, कोई नया, बाज़ार में बिकने लायक उत्पाद नहीं बना।

कोर्ट ने कहा कि चीज़ों के इस्तेमाल को आसान बनाने के लिए उनका रूप बदलना 'निर्माण' नहीं माना जाएगा, जब तक कि उन चीज़ों के मूल गुण वैसे ही रहें। कोर्ट ने कहा कि फ्रेम लगाना, पैनलों को कसना और खाली जगहों को भरना, ये सब लगाने से जुड़े काम हैं, जिनसे कोई नई चीज़ नहीं बनती।

कोर्ट ने कहा,

"चीज़ों के इस्तेमाल को आसान बनाने के लिए उनमें ऊपरी बदलाव करने की प्रक्रिया से—जिनसे चीज़ों के मूल गुण नहीं बदलते—कोई अलग उत्पाद नहीं बनता, जो 'बदलाव की कसौटी' पर खरा उतर सके। एक्साइज़ ड्यूटी लगाने के लिए यह साबित करना ज़रूरी है कि बना हुआ उत्पाद बाज़ार में बिकने लायक है। बना हुआ उत्पाद तब बाज़ार में बिकने लायक माना जाता है, जब उसे खरीदा या बेचा जा सके, या जब उसे बाज़ार में एक व्यावसायिक उत्पाद के तौर पर जाना जाता हो।"

कोर्ट ने यह भी दोहराया कि एक्साइज़ ड्यूटी लगाने के लिए 'बाज़ार में बिकने लायक होना' एक अलग शर्त है। कोर्ट ने कहा कि यह साबित करने की ज़िम्मेदारी कि उत्पाद बाज़ार में बिकने लायक है, 'राजस्व विभाग' (Revenue) पर है। इसे सिर्फ़ अंदाज़ों के आधार पर नहीं, बल्कि सबूतों के आधार पर साबित किया जाना चाहिए। क्योंकि, ACPs में कोई ऐसा बदलाव नहीं हुआ, जिससे वे कोई अलग चीज़ बन जातीं, इसलिए इस मामले में 'बाज़ार में बिकने लायक होने' का मुद्दा बेमानी हो गया।

यह मानते हुए कि अपील करने वाले ने जो प्रक्रिया अपनाई थी, उससे कोई अलग उत्पाद नहीं बना, कोर्ट ने अपील स्वीकार की और हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया।

Case Title – M/S Alupro Building Systems Pvt. Ltd v. Commissioner of Central Excise Bangalore-II

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