S.156(3) CrPC/S.175(3) BNSS | आरोपी के बचाव पर भरोसा करके मजिस्ट्रेट के जांच का आदेश रद्द नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट अपनी अंतर्निहित विवेकाधीन शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा निर्देशित पुलिस जांच को तब तक नहीं रोक सकते, जब तक कि शिकायत में पहली नज़र में कोई संज्ञेय अपराध सामने न आता हो।
कोर्ट ने कहा कि इस चरण पर कोर्ट को शिकायत में लगाए गए आरोपों और शिकायतकर्ता द्वारा पेश की गई सामग्री तक ही सीमित रहना चाहिए। साथ ही आरोपी द्वारा पेश किए गए बचावों की जांच करने के लिए उनसे आगे नहीं जाना चाहिए।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने कहा,
"...हाईकोर्ट को अपनी अंतर्निहित अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए, शिकायत में शामिल आरोपों और शिकायतकर्ता द्वारा पेश की गई सामग्री से आगे नहीं जाना चाहिए। साथ ही आरोपी-प्रतिवादियों द्वारा पेश किए जाने वाले बचावों की गहराई में नहीं जाना चाहिए।"
खंडपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट का वह फैसला रद्द किया, जिसमें आरोपी द्वारा पेश किए गए बचावों की जांच करके चल रही जांच में दखल दिया गया था।
यह मामला पक्षों के बीच सिविल लेनदेन से जुड़ा है, जिसने बाद में आपराधिक रूप ले लिया, जब शिकायतकर्ता ने आरोपी पर चोरी, आपराधिक विश्वासघात, धोखाधड़ी, जालसाजी, जाली दस्तावेज़ बनाने और उनका इस्तेमाल करने, और आपराधिक साजिश रचने का आरोप लगाया।
मजिस्ट्रेट ने CrPC की धारा 156(3) के तहत पुलिस जांच का आदेश दिया। साथ ही यह दर्ज किया कि शिकायत में पहली नज़र में संज्ञेय अपराध के तत्व मौजूद हैं। हालांकि, हाईकोर्ट ने शिकायत में पेश की गई सामग्री से आगे बढ़कर आरोपी द्वारा पेश किए गए बचावों की जांच की, जिसमें दस्तावेज़ों की विस्तृत जांच भी शामिल थी।
हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर शिकायतकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और यह तर्क दिया कि हाई कोर्ट का दखल कानून की नज़र में गलत था।
याचिका स्वीकार करते हुए जस्टिस मेहता द्वारा लिखे गए फैसले में यह कहा गया कि हाईकोर्ट ने आरोपी द्वारा पेश किए गए सबूतों की विस्तृत जांच करके जांच में दखल देने में गलती की। कोर्ट ने यह भी बताया कि जांच के चरण पर आरोपी द्वारा पेश किए गए बचावों पर विचार करने की आवश्यकता नहीं होती, और न ही शिकायत के दायरे से बाहर की सामग्री पर विचार किया जाना चाहिए। अन्यथा, यह मुकदमे से पहले के चरण में ही 'मिनी-ट्रायल' (छोटा मुकदमा) चलाने जैसा होगा।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“हाईकोर्ट ने आरोपी-प्रतिवादियों द्वारा जिन दस्तावेज़ों पर भरोसा किया गया, उनकी जांच की, जिनमें उनके पक्ष में निष्पादित बिक्री विलेख भी शामिल थे और उन्हें विवाद का निर्णायक आधार माना। कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि आपराधिक कानून की प्रक्रिया शुरू करने से पहले उन बिक्री विलेखों को पहले रद्द किया जाना और उन्हें सौंप दिया जाना अनिवार्य है। इस प्रकार की कार्यवाही CrPC की धारा 482 के तहत किसी याचिका को रद्द करने के लिए की जाने वाली जाँच के दायरे से स्पष्ट रूप से बाहर थी। बचाव पक्ष की सामग्री, जिसमें बिक्री विलेख या अन्य स्वामित्व दस्तावेज़ शामिल हैं, पर विचार करने का अर्थ अनिवार्य रूप से तथ्यों से जुड़े विवादित प्रश्नों पर निर्णय देना होगा। ये प्रश्न पूरी तरह से जाँच के दायरे में आते हैं। यदि आवश्यक हो तो विचारण (Trial) के चरण में इनका निपटारा किया जाता है। CrPC की धारा 156(3) के चरण पर इस प्रकार की कोई भी कार्यवाही करना, एक 'लघु-विचारण' (Mini-Trial) आयोजित करने के समान होगा, जो पूरी तरह से अस्वीकार्य है। जांच के प्रारंभिक चरण में ही बचाव पक्ष की ऐसी सामग्री का मूल्यांकन करने की अनुमति देना, पुलिस द्वारा जांच का निर्देश देने के मूल उद्देश्य को ही विफल और निष्प्रभावी बना देगा।”
कोर्ट ने आगे कहा,
“यह सिद्धांत भली-भांति स्थापित है कि केवल किसी दीवानी उपचार (Civil Remedy) की उपलब्धता मात्र से ही आपराधिक कार्यवाही बाधित नहीं होती, विशेषकर तब, जब लगाए गए आरोप प्रथम दृष्ट्या किसी संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) के घटित होने का संकेत देते हों। विवाद के गुण-दोषों के आधार पर उसका मूल्यांकन करके और जांच का निर्देश देने वाला आदेश रद्द करके हाईकोर्ट ने प्रभावी रूप से जांच प्रक्रिया को उसके प्रारंभिक चरण में ही अवरुद्ध कर दिया। यह दृष्टिकोण, इस कोर्ट द्वारा समय-समय पर निर्धारित किए गए सिद्धांतों के पूर्णतः विपरीत है।”
परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार की गई। इसके साथ ही विवादित आदेश रद्द किया गया और जांच प्रक्रिया को उसी चरण से पुनः शुरू करने का निर्देश दिया गया, जिस चरण पर उसमें हस्तक्षेप किया गया था।
कोर्ट ने निर्णय दिया,
“हम इस सुविचारित मत पर पहुंचे हैं कि हाईकोर्ट ने कार्यवाही रद्द करते समय स्पष्ट रूप से त्रुटि की। यह कार्यवाही उस चरण पर रद्द की गई, जब मजिस्ट्रेट ने केवल CrPC की धारा 156(3) के तहत FIR दर्ज करने और जांच करने का निर्देश दिया था ('भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023' की धारा 175(3) के समतुल्य है)।”
Cause Title : ACCAMMA SAM JACOB VERSUS THE STATE OF KARNATAKA & ANR. ETC.