रेलवे, बिजली अधिनियम के तहत 'उपभोक्ता', 'डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी' नहीं: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (8 मई) को फैसला सुनाया कि रेलवे, बिजली अधिनियम, 2003 के अर्थ के तहत एक 'उपभोक्ता' है। इस फैसले के साथ ही रेलवे का वह दावा खारिज हो गया, जिसमें वह 'डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी' (माना गया वितरण लाइसेंसी) का दर्जा मांग रहा था, ताकि वह वितरण कंपनियों को क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज और अतिरिक्त सरचार्ज का भुगतान करने से बच सके।
कोर्ट ने कहा कि भारतीय रेलवे एक बंद और आत्मनिर्भर बिजली नेटवर्क चलाता है, जिसका एकमात्र उद्देश्य उसकी अपनी आंतरिक परिचालन ज़रूरतों को पूरा करना है—जिसमें ट्रैक्शन, सिग्नलिंग और स्टेशन की सुविधाएं शामिल हैं। इसलिए इसे "वितरण लाइसेंसी" नहीं माना जा सकता, क्योंकि यह अपने नेटवर्क के बाहर के बाहरी उपभोक्ताओं को बिजली की आपूर्ति नहीं करता है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने कहा,
"जैसा कि अपीलकर्ता (रेलवे) ने तर्क दिया है, ट्रांसमिशन लाइनें या वितरण लाइनें बिछाने मात्र से अपीलकर्ता को उस बिजली की आपूर्ति करने का अधिकार नहीं मिल जाता, जिसे उसने तीसरे पक्ष के उपभोक्ताओं के लिए खरीदा है... ऐसा तभी होगा जब बिजली रेलवे के परिचालन क्षेत्र के बाहर के उपभोक्ताओं को बेची या दी जाए; केवल तभी अपीलकर्ता द्वारा की गई गतिविधियां एक वितरण लाइसेंसी के दायित्वों के दायरे में आएंगी।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"अपीलकर्ता बिजली अधिनियम की धारा 2(15) के अर्थ और दायरे के तहत एक उपभोक्ता है। यह बिजली केवल अपने स्वयं के उपयोग के लिए खरीदता है और अपने स्वयं के घटकों (संस्थाओं) के अलावा किसी और को इसकी आपूर्ति नहीं करता है। इस प्रकार, किसी भी अन्य उपभोक्ता की तरह क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज और अतिरिक्त सरचार्ज अपीलकर्ता पर भी लागू होते हैं।"
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद भारतीय रेलवे के इस दावे से शुरू हुआ था कि वह बिजली अधिनियम, 2003 की धारा 14 के तीसरे परंतुक (Proviso) के तहत 'डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी' (DDL) के रूप में योग्य है। रेलवे ने तर्क दिया था कि ट्रैक्शन सिस्टम और रेलवे परिचालन के लिए उसका बिजली का बुनियादी ढांचा एक "वितरण प्रणाली" के समान है। इसलिए उसे क्रॉस-सब्सिडी और अतिरिक्त सरचार्ज का भुगतान किए बिना 'ओपन एक्सेस' (खुली पहुंच) के माध्यम से बिजली खरीदने का अधिकार है।
यह विवाद 2015 में तब शुरू हुआ, जब रेलवे ने ट्रैक्शन सबस्टेशनों के लिए अंतर-राज्यीय ओपन एक्सेस के माध्यम से 100 मेगावाट बिजली खरीदने के लिए कनेक्टिविटी मांगी थी। उसकी कानूनी स्थिति के संबंध में आपत्तियां उठाए जाने के बाद रेलवे ने केंद्रीय विद्युत नियामक आयोग (CERC) से संपर्क किया।
CERC ने रेलवे के पक्ष में फैसला सुनाया और उसे एक 'डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी' घोषित कर दिया। हालांकि, APTEL ने बाद में इस फ़ैसले को पलट दिया। उसने कहा कि रेलवे बिजली अधिनियम के दायरे में बिजली वितरण के काम में शामिल नहीं है। इसके बाद, भारतीय रेलवे ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
फ़ैसला
अपील खारिज करते हुए जस्टिस शर्मा द्वारा लिखे गए फ़ैसले में समझाया गया कि बिजली अधिनियम के तहत 'डीम्ड डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी' (माना गया वितरण लाइसेंसी) का दर्जा पाने के लिए अधिनियम की धारा 14 के तहत दो शर्तें पूरी होनी ज़रूरी हैं, यानी:
(a) उपभोक्ताओं को बिजली की सप्लाई के लिए एक वितरण प्रणाली को चलाना और उसका रखरखाव करना।
(b) अपने सप्लाई क्षेत्र के भीतर उपभोक्ताओं को बिजली की सप्लाई करना।
चूंकि अपीलकर्ता का आंतरिक बिजली नेटवर्क केवल अपने इस्तेमाल के लिए है, इसलिए कोर्ट ने कहा कि इसे किसी "सप्लाई क्षेत्र" के भीतर "उपभोक्ताओं" को बिजली की सप्लाई नहीं माना जा सकता। जबकि, डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी के तौर पर मान्यता पाने के लिए यह एक अनिवार्य शर्त है।
कोर्ट ने कहा कि अगर भारतीय रेलवे को अपने आंतरिक कामकाज के लिए बिना 'क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज' और 'अतिरिक्त शुल्क' दिए बिजली खरीदने की अनुमति दी जाती है तो इससे असली डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी कंपनियों पर वित्तीय दबाव पड़ेगा।
कोर्ट ने कहा,
"जब भारतीय रेलवे जैसे ज़्यादा बिजली इस्तेमाल करने वाले और ज़्यादा राजस्व देने वाले उपभोक्ता 'ओपन-एक्सेस' के ज़रिए बिजली खरीदना चुनते हैं तो डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी कंपनियों के पास ऐसा बुनियादी ढांचा और बिजली खरीदने की ऐसी प्रतिबद्धताएँ बच सकती हैं, जिनका पूरा इस्तेमाल न हो पाए, जिससे उन पर वित्तीय बोझ पड़ सकता है।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज और अतिरिक्त शुल्क, वितरण क्षेत्र के वित्तीय स्वास्थ्य और परिचालन क्षमता को बनाए रखने के लिए बहुत ज़रूरी हैं। ये इस क्षेत्र को बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने में निवेश करने, भरोसेमंद सेवा सुनिश्चित करने और सभी श्रेणियों के उपभोक्ताओं के प्रति अपनी ज़िम्मेदारियों को लगातार पूरा करने में सक्षम बनाते हैं।"
उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने अपील खारिज की। साथ ही प्रतिवादियों को निर्देश दिया कि वे अपीलकर्ता पर बकाया क्रॉस-सब्सिडी सरचार्ज और अतिरिक्त शुल्क की रक़म का विस्तृत हिसाब लगाकर जारी करें। यह हिसाब सप्लाई क्षेत्र और ओपन-एक्सेस का लाभ उठाने की अवधि के हिसाब से अलग-अलग करके दिया जाना चाहिए। इसके लिए अपीलकर्ता को बकाया रक़म का जवाब देने और उसे चुकाने के लिए उचित समय दिया जाए। यह समय संबंधित डिस्ट्रीब्यूशन लाइसेंसी/कंपनियों के विवेक पर तय होगा, और इस पर 'उपयुक्त आयोग' की न्यायिक समीक्षा लागू होगी।
Cause Title: INDIAN RAILWAYS VERSUS WEST BENGAL STATE ELECTRICITY DISTRIBUTION COMPANY LIMITED & ORS. (with connected matter)