सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (7 अक्टूबर) को कहा कि IPC की धारा 394 / BNS की धारा 309 (6) के तहत सज़ा तब तक नहीं दी जा सकती, जब तक यह साबित न हो जाए कि डकैती हुई थी या डकैती की कोशिश की गई।

जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने IPC की धारा 394 के तहत सज़ा को रद्द करते हुए कहा,

"डकैती या डकैती की कोशिश कोई मामूली बात नहीं है, बल्कि यह अपराध का एक ज़रूरी हिस्सा है।"

IPC की धारा 394 में डकैती के दौरान जान-बूझकर गंभीर चोट पहुँचाने के काम के लिए सज़ा का प्रावधान है।

यह मामला जनवरी 1993 में महाराष्ट्र के फार्महाउस में हुई घटना से जुड़ा है, जहाँ रात में चार हमलावर कथित तौर पर घुस आए थे। शिकायतकर्ता ने अप्पा की पहचान उस व्यक्ति के तौर पर की जिसने उसे चाकू से धमकाया, उसके हाथ को घायल किया और उसके चेहरे पर मुक्का मारा, जिससे उसका ऊपर का एक दाँत टूट गया।

अपीलकर्ता अप्पा पर शिकायतकर्ता का सोने का मंगलसूत्र और डोरले छीनने का आरोप पूरी तरह से उसके दावे पर आधारित है। न तो कोई गहना बरामद हुआ और न ही अपीलकर्ता के पास से कोई ऐसी चीज़ मिली जिससे अपराध साबित हो सके।

कोर्ट ने पाया कि IPC की धारा 394 के तहत सज़ा सही नहीं ठहराई जा सकती, क्योंकि अभियोजन पक्ष कथित डकैती को ठीक से साबित करने में नाकाम रहा। कथित तौर पर लूटी गई सोने की चीज़ बरामद नहीं हुई। साथ ही लूटी गई चीज़ों की पहचान या कीमत साबित करने के लिए कोई खरीद रसीद या कोई अन्य सबूत भी नहीं है।

कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि डकैती या डकैती की कोशिश IPC की धारा 394 के तहत केवल एक घटना नहीं है, बल्कि अपराध का एक ज़रूरी हिस्सा है।

कोर्ट ने कहा,

"इस मामले में डकैती का आरोप पूरी तरह से शिकायतकर्ता के इस दावे पर टिका है कि अपीलकर्ता ने उसके गले से उसका मंगलसूत्र और डोरले छीन लिया था। कथित गहने बरामद नहीं हुए और न ही अपीलकर्ता के पास से कोई ऐसी चीज़ मिली जिससे अपराध साबित हो सके। चीज़ों की पहचान या कीमत साबित करने के लिए कोई खरीद रसीद या कोई अन्य सबूत नहीं है, जैसा कि खुद शिकायतकर्ता ने जिरह के दौरान माना था।"

कोर्ट ने कहा,

"इसलिए हमारी राय में हम IPC की धारा 394 के तहत दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रख सकते।"

जानबूझकर गंभीर चोट पहुँचाने के लिए दोषसिद्धि को IPC की धारा 394 से बदलकर IPC की धारा 325 कर दिया गया।

IPC की धारा 394 के तहत अपराध के लिए अपीलकर्ता को बरी करते हुए कोर्ट ने IPC की धारा 325 (एक संबंधित/मामूली अपराध) के तहत दोषसिद्धि में बदलाव किया। यह बदलाव इस बात को मानते हुए किया गया कि हाथापाई के दौरान अपीलकर्ता द्वारा चाकू से हथेली पर वार करने से पीड़ित/शिकायतकर्ता को चोट लगी थी, जिसकी पुष्टि मेडिकल सबूतों से हुई।

कोर्ट ने कहा,

"...शिकायतकर्ता का यह दावा कि अपीलकर्ता ने उसके मुँह पर वार किया और उसका बाएँ ऊपरी हिस्से का सामने का दाँत (Incisor) टूटकर गिर गया, गवाहों के बयान और मेडिकल सबूतों से पूरी तरह साबित होता है। यह IPC की धारा 320 में दी गई 'गंभीर चोट' (Grievous Hurt) की परिभाषा के अंतर्गत आता है, यानी हड्डी या दाँत का टूटना या अपनी जगह से हट जाना। इसलिए हम अपीलकर्ता की दोषसिद्धि को IPC की धारा 325 के तहत अपराध में बदलना उचित समझते हैं।"

नतीजतन, अपील आंशिक रूप से स्वीकार की गई और अपीलकर्ता की दोषसिद्धि को IPC की धारा 325 के तहत दंडनीय अपराध में बदल दिया गया।

कोर्ट ने आदेश दिया,

"अपीलकर्ता की सज़ा को घटाकर उतनी अवधि कर दिया गया, जितनी वह पहले ही काट चुका है। साथ ही 1,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया गया। अपीलकर्ता को तुरंत रिहा किया जाएगा, बशर्ते उसे किसी अन्य मामले में हिरासत में रखने की आवश्यकता न हो।"

Case Title : APPA VERSUS THE STATE OF MAHARASHTRA

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