सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि अतिरिक्त भुगतान की वसूली से जुड़े मामलों में अब तक आए किसी भी फैसले में 'इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872' की धारा 72 के लागू होने पर कोई चर्चा नहीं की गई।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच ने यह टिप्पणी उन शिक्षकों की अपील खारिज करते हुए की, जिनके 'एकेडमिक ग्रेड पे' (Academic Grade Pay) लाभ वापस ले लिए गए, क्योंकि ये लाभ गलती से दिए गए।

यह मामला अपीलकर्ताओं (शिक्षकों) को 'एकेडमिक ग्रेड पे' दिए जाने से जुड़ा है। उन्हें ये वित्तीय लाभ अक्टूबर 2009 के आसपास दिए गए, लेकिन जनवरी 2010 में इन्हें वापस ले लिया गया। इसका कारण यह बताया गया कि उन्होंने सेवा के लिए जरूरी वर्षों की अवधि पूरी नहीं की थी। इसके बाद, उन्होंने केरल हाई कोर्ट में एक रिट याचिका दायर की।

नवंबर 2014 में केरल हाईकोर्ट के सिंगल जज ने शिक्षकों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए उनकी रिट याचिकाओं को स्वीकार कर लिया। बाद में नवंबर 2015 में एक डिवीजन बेंच ने इस फैसले को पलट दिया।

डिवीजन बेंच के इस फैसले से असंतुष्ट होकर शिक्षकों ने सुप्रीम कोर्ट में एक 'स्पेशल लीव पिटिशन' (SLP) दायर की।

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मुख्य सवाल इस प्रकार तय किया:

“क्या उन वित्तीय लाभों को वापस लिया जा सकता है, जो प्रतिवादियों (अधिकारियों) द्वारा शिक्षकों के एक वर्ग को स्वेच्छा से दिए गए, जबकि इसमें शिक्षकों की ओर से कोई गलत जानकारी देना, धोखाधड़ी या कोई गलती शामिल नहीं थी?”

इस मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने यह भी रेखांकित किया,

“अब तक के किसी भी फैसले में 'कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872' की धारा 72 के लागू होने पर कोई टिप्पणी नहीं की गई।”

बता दें, 'इंडियन कॉन्ट्रैक्ट एक्ट, 1872' की धारा 72 उस व्यक्ति की जिम्मेदारी के बारे में है, जिसे गलती से या दबाव में कोई पैसा दिया गया हो या कोई वस्तु सौंपी गई हो। इसके तहत, जिस व्यक्ति को गलती से या दबाव में पैसा मिला है, उसे वह पैसा वापस करना होगा।

कोर्ट ने यह भी कहा कि 'स्टेट ऑफ पंजाब बनाम रफीक मसीह (व्हाइट वॉशर)' का मामला, जिसका हवाला अपीलकर्ताओं ने दिया था, “एक पुरानी पृष्ठभूमि रखता है, इसलिए इसे अलग से (अन्य मामलों से काटकर) नहीं देखा जा सकता।”

इसमें 'चंडी प्रसाद उनियाल बनाम उत्तराखंड राज्य' मामले के उदाहरणों का हवाला दिया गया। इस मामले में यह तय किया गया कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा कोई सिद्धांत नहीं बनाया, जिसके अनुसार, किसी व्यक्ति को गलती से ज्यादा भुगतान किए जाने पर उससे वह रकम तभी वापस ली जा सकती है, जब यह साबित हो जाए कि उसने कोई गलत जानकारी दी थी या धोखाधड़ी की थी।

इसमें यह भी कहा गया कि कानून के अधिकार के बिना दी गई या प्राप्त की गई कोई भी रकम वापस ली जा सकती है (सिवाय कुछ बहुत कठिन परिस्थितियों के)। हालांकि, यह कोई कानूनी अधिकार नहीं है; ऐसी स्थितियों में कानून यह मानता है कि जिसे रकम मिली है, उसका यह दायित्व है कि वह उसे वापस करे, वरना यह 'अनुचित लाभ' (Unjust Enrichment) माना जाएगा।

खंडपीठ ने यह भी गौर किया कि 'राकेश कुमार बनाम हरियाणा राज्य' मामले में, 'श्याम बाबू वर्मा बनाम भारत संघ' और 'साहिब राम बनाम हरियाणा राज्य' के फैसलों तथा 'चंडी प्रसाद उनियाल' मामले के फैसले के बीच विचारों का स्पष्ट अंतर दिखाई दे रहा था। इसलिए इस सवाल को 3 जजों की एक पीठ के पास भेजा गया। उस खंडपीठ ने माना कि इन फैसलों के बीच कोई टकराव नहीं है; 'साहिब राम' और 'श्याम बाबू वर्मा' के मामलों में निर्देश अनुच्छेद 142 के तहत कोर्ट की शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए दिए गए थे, जबकि 'चंडी प्रसाद उनियाल' मामले में कानून अनुच्छेद 136 के तहत तय किया गया।

इस बात पर ध्यान देते हुए खंडपीठ ने कहा:

“ऊपर दिए गए हिस्से को पढ़ने से तार्किक रूप से यह निष्कर्ष निकलता है कि 'चंडी प्रसाद उनियाल' मामले में कानून, संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए तय किया गया। हमारा मानना ​​है कि अनुच्छेद 141 के तहत यह सभी अदालतों पर बाध्यकारी होगा। वहीं, 'साहिब राम' और 'श्याम बाबू वर्मा' के मामलों में कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया।”

इस प्रकार, कोर्ट ने माना कि 'साहिब राम' और 'श्याम बाबू वर्मा' के बाद दिए गए फैसले, जो अनुच्छेद 142 के तहत आए हैं, उन्हें एक बाध्यकारी मिसाल (Binding Precedent) नहीं माना जा सकता। इसके बावजूद, 'रफीक मसीह (व्हाइट वॉशर)' मामले की पीठ ने “'चंडी प्रसाद उनियाल' मामले में तय किए गए कानून को लागू नहीं किया, बल्कि 'साहिब राम', 'श्याम बाबू वर्मा' और 'सैयद अब्दुल कादिर' मामलों में अपनाए गए तरीके का पालन करना बेहतर समझा।”

इसके अलावा, कोर्ट ने 'पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट बनाम जगदेव सिंह' मामले का हवाला दिया। इस मामले में कोर्ट ने माना था कि 'रफीक मसीह (व्हाइट वॉशर)' मामले के पैरा 18 की दूसरी श्रेणी के तहत मिलने वाला संरक्षण वहां लागू नहीं होता, जहां अधिकारी को पहले ही बता दिया गया हो कि अतिरिक्त भुगतान वापस करना होगा, और उसने संशोधित वेतनमान (रिवाइज्ड पे स्केल) चुनते समय एक अंडरटेकिंग (लिखित वचन) दी हो।

इसके बाद कोर्ट ने कहा कि 'साहिब राम' और 'श्याम बाबू वर्मा' के बाद आए फैसलों—जो अनुच्छेद 142 के तहत दिए गए थे—को "एक बाध्यकारी नजीर (बाइंडिंग प्रेसिडेंट) नहीं माना जा सकता।" कोर्ट ने यह भी गौर किया कि 'थॉमस डेनियल बनाम केरल राज्य' मामले में न तो 'चंडी प्रसाद उनियाल' मामले पर विचार किया गया और न ही 'रफीक मसीह' मामले में 3 जजों की बेंच के फैसले पर।

इसके बाद कोर्ट ने यह टिप्पणी की:

"हैरानी की बात है कि किसी भी पूर्व फैसले में 'भारतीय अनुबंध अधिनियम, 1872' (Contract Act, 1872) की धारा 72 के लागू होने पर कोई चर्चा नहीं की गई। हालांकि, इसका जिक्र किए बिना भी, हम पाते हैं कि 'चंडी प्रसाद उनियाल' मामले का मूल सिद्धांत (रेशियो) इसी धारा से प्रेरित है।"

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया:

"हमारा मकसद 'रफीक मसीह (व्हाइट वॉशर)' और 'थॉमस डेनियल' मामलों में समान स्तर की बेंचों (कोऑर्डिनेट बेंच) द्वारा दिए गए फैसलों पर कोई संदेह पैदा करना बिल्कुल नहीं है। ऊपर की गई चर्चा केवल यह बताने के लिए है कि शायद कानून का विकास सही दिशा में नहीं हुआ।"

इसके अलावा, कोर्ट ने 'पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट बनाम जगदेव सिंह' मामले का हवाला दिया। इस मामले में कोर्ट ने माना था कि 'रफीक मसीह (व्हाइट वॉशर)' मामले के पैरा 18 की दूसरी श्रेणी के तहत मिलने वाला संरक्षण वहां लागू नहीं होता, जहां अधिकारी को पहले ही बता दिया गया हो कि अतिरिक्त भुगतान वापस करना होगा, और उसने संशोधित वेतनमान चुनते समय एक अंडरटेकिंग दी हो।

इसके बाद बेंच ने उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए मामले के तथ्यों की जांच की। NIT ने शिक्षकों द्वारा दी गई अंडरटेकिंग रिकॉर्ड पर रखी थी, जिसमें उन्होंने सहमति जताई कि यदि वेतन निर्धारण (पे फिक्सेशन) में कोई गलती पाई जाती है तो अतिरिक्त राशि की वसूली की जा सकती है। डिवीजन बेंच ने यह माना था कि NIT ने केवल एक गलती को सुधारा है। इसमें यह भी पाया गया कि एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति के कारण शिक्षकों को कोई अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं निभानी थी, और वे किसी विशेष श्रेणी के अंतर्गत भी नहीं आते थे।

उपरोक्त बातों पर ध्यान देते हुए बेंच ने कहा,

“इसलिए यह स्पष्ट है कि अपीलकर्ताओं को वित्तीय लाभ देने में गलती हुई। इस गलती का पता चलते ही इन लाभों को वापस ले लिया गया। अपीलकर्ताओं द्वारा दिए गए वचन (अंडरटेकिंग) को देखते हुए गलती से दी गई राशि की वसूली के मामले में सिंगल जज द्वारा रिट अधिकार क्षेत्र का उपयोग करके हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं थी, और डिवीजन बेंच का इस पर रोक लगाने का निर्णय सही प्रतीत होता है।”

इसके विपरीत, अपीलकर्ताओं ने मानव संसाधन विकास मंत्रालय के निदेशक द्वारा सभी NIT के निदेशकों को भेजे गए एक पत्र का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि “संस्थानों के शैक्षणिक कर्मचारियों को पहले दिए जा चुके लाभों की वसूली नहीं की जाएगी।”

कोर्ट ने इस दलील को खारिज कर दिया, क्योंकि यह वसूली रिट याचिका दायर होने से दो साल पहले ही की जा चुकी थी।

अपीलकर्ताओं के मामले में कोई दम न पाते हुए कोर्ट ने उनकी याचिका खारिज की और डिवीजन बेंच का आदेश बरकरार रखा।

Case Title : Dr MK Ravi Varma etc etc v National Institute of Technology and Ors

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