2016 से पहले जारी DRT रिकवरी सर्टिफिकेट के आधार पर 'प्रेसिडेंसी टाउन्स इनसॉल्वेंसी एक्ट' के तहत दिवालियापन का नोटिस नहीं दिया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (13 जुलाई) को कहा कि 'रिकवरी ऑफ़ डेट्स एंड बैंकरप्सी एक्ट' (RDB Act) में 2016 के संशोधन से पहले 'डेट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल' (DRT) द्वारा जारी रिकवरी सर्टिफिकेट को 'प्रेसिडेंसी टाउन्स इनसॉल्वेंसी एक्ट, 1909' की धारा 9(2) के तहत दिवालियापन की कार्यवाही शुरू करने के लिए "डिक्री या आदेश" नहीं माना जा सकता।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने HDFC बैंक की अपील खारिज करते हुए कहा,
"जिस तारीख को वादी कोर्ट पहुंचा, उस तारीख को जो दावा मान्य नहीं, वह केवल इसलिए मान्य नहीं हो सकता, क्योंकि मुकदमे के दौरान कोई अचानक घटना हुई और उसने उसे मान्य बना दिया। मुकदमे का फैसला उसी तारीख के अधिकारों और देनदारियों के आधार पर किया जाना चाहिए, जिस तारीख को मुकदमा शुरू हुआ, जब तक कि कानून या मामले का न्याय-सिद्धांत कुछ और न कहे।"
बेंच ने बॉम्बे हाई कोर्ट के 2007 के उस फैसले के खिलाफ अपील खारिज की, जिसमें यह माना गया कि "डिक्री या आदेश" में संशोधन से पहले के RDB Act के तहत DRT द्वारा जारी रिकवरी सर्टिफिकेट शामिल नहीं होगा।
यह विवाद HDFC बैंक सहित 15 बैंकों के एक समूह द्वारा 'ब्यूटीफुल डायमंड्स लिमिटेड' को दी गई क्रेडिट सुविधाओं से शुरू हुआ। ये लोन कंपनी के डायरेक्टरों द्वारा किए गए मॉर्गेज (गिरवी रखने) और पर्सनल गारंटी से सुरक्षित थे।
उधारकर्ता द्वारा भुगतान न करने (डिफ़ॉल्ट) के बाद HDFC बैंक ने 'डेट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल' (DRT), मुंबई के समक्ष कार्यवाही शुरू की।
अक्टूबर 2004 में DRT ने लगभग 14.74 करोड़ रुपये के लिए रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करने का निर्देश दिया, जो अगले महीने जारी किया गया।
रिकवरी सर्टिफिकेट के आधार पर बैंक ने 'प्रेसिडेंसी टाउन्स इनसॉल्वेंसी एक्ट' की धारा 9(2) के तहत प्रतिवादी (रेस्पोंडेंट) के डायरेक्टर को दिवालियापन का नोटिस भेजा। प्रतिवादी ने बॉम्बे हाई कोर्ट में नोटिस को चुनौती दी और तर्क दिया कि DRT रिकवरी सर्टिफिकेट ऐसी डिक्री या आदेश के बराबर नहीं है जिसके आधार पर दिवालियापन की कार्यवाही की जा सके।
सिंगल जज और डिवीजन बेंच दोनों ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया और दिवालियापन का नोटिस रद्द किया, जिसके बाद HDFC बैंक ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। चुनौती दिए गए फैसले में दखल देने से इनकार करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता ने कहा कि अपील करने वाले का 'रिकवरी ऑफ़ डेट्स एंड बैंकरप्सी एक्ट' (RDB Act) की धारा 19(22A) पर भरोसा करना गलत था; यह धारा 2016 के संशोधन से जोड़ी गई।
कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान भविष्य के लिए लागू होता है और इसे कानून बनने से पहले शुरू हुई कार्यवाही पर लागू नहीं किया जा सकता। इसलिए संशोधन से पहले जारी किए गए DRT रिकवरी सर्टिफिकेट को 'प्रेसिडेंसी टाउन इंसॉल्वेंसी एक्ट, 1909' की धारा 9(2) के तहत दिवालियापन की कार्यवाही शुरू करने के मकसद से "डिक्री या आदेश" नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
"हमारी राय में RDB Act की धारा 19 में उप-धारा (22A) को जोड़ने से अपील करने वाले बैंक का मामला मजबूत होने के बजाय कमजोर हो जाता है। धारा 19(22A), जैसा कि अभी है, इस मुद्दे को सुलझाने में मदद करती है। यह तथ्य कि संसद ने 2016 में RDB Act की धारा 19 में सब-सेक्शन (22A) को इस खास मकसद से जोड़ा कि रिकवरी सर्टिफिकेट को 'डिक्री या आदेश' के बराबर माना जाए, यह साफ तौर पर दिखाता है कि कानून बनाने वालों का मानना था कि पहले ऐसी बराबरी नहीं थी। इसका मतलब यह है कि 2016 के संशोधन से पहले जारी रिकवरी सर्टिफिकेट दिवालियापन की कार्यवाही शुरू करने का आधार नहीं बन सकता। इसके उलट कुछ भी मानना ऐसा होगा जैसे हम वह बात जोड़ रहे हों जो कानून बनाने वालों ने जान-बूझकर नहीं जोड़ी थी – यानी एक साफ 'कैसस ओमिशन' (कानून में रह गई कमी)। इसके अलावा, यह भी अहम है कि संशोधन को पिछले समय से लागू (retrospective effect) नहीं किया गया है। अगर यह संशोधन पहले किया गया होता, तो शायद मामले आसान होते।"
ऊपर बताई गई बातों के आधार पर अपील खारिज कर दी गई।
Cause Title: H.D.F.C. BANK LIMITED VERSUS KISHORE K. MEHTA (DEAD) THR. LRS