तलाक के समझौते में छोड़े गए पैसों के दावे को DV Act की कार्यवाही में दोबारा नहीं उठाया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (24.08.2026) को पत्नी और बेटी द्वारा पति के खिलाफ 'घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005' (DV Act) के तहत शुरू की गई कार्यवाही रद्द की। कार्यवाही रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि एक बार जब पत्नी ने फैमिली कोर्ट के सामने समझौते और उसके बाद दिए गए हलफनामे के ज़रिए अपनी मर्ज़ी से भरण-पोषण (मेंटेनेंस) समेत पैसों से जुड़े सभी दावे छोड़ दिए, तो "बाद की कार्यवाही के ज़रिए ऐसे दावों को फिर से उठाने की इजाज़त नहीं दी जा सकती।"
जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने यह फैसला पति द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई करते हुए सुनाया। पति ने केरल हाई कोर्ट के 2018 के उस फैसले के खिलाफ अपील की, जिसमें DV Act के तहत दर्ज शिकायत को रद्द करने की उसकी याचिका खारिज कर दी गई।
अपीलकर्ता (पति) और प्रतिवादी 1 (पत्नी/R1) ने 2016 में एक समझौता किया, जिसके तहत पत्नी ने साफ़ तौर पर सहमति जताई थी कि वह पति के खिलाफ पैसों या भरण-पोषण का कोई दावा नहीं करेगी। इसके बाद 'तलाक अधिनियम, 1869' की धारा 10A के तहत तलाक के लिए एक संयुक्त अर्ज़ी दायर की गई, जिस पर 2017 में तलाक का आदेश (डिक्री) जारी किया गया।
इसके बाद,पत्नी (R1) और बेटी (प्रतिवादी 2/R2) ने DV एक्ट के तहत शिकायत दर्ज कराई। इसके बाद अपीलकर्ता ने केरल हाईकोर्ट के सामने शिकायत रद्द करने की मांग की। हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई।
सुप्रीम कोर्ट के सामने अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि DV Act के तहत कार्यवाही तब शुरू की गई, जब दोनों पक्षों के बीच सभी विवाद पहले ही सुलझा लिए गए और उसकी पत्नी ने समझौते के तहत साफ़ तौर पर सहमति जताई कि वह पैसों से जुड़ा कोई दावा नहीं करेगी। यह भी कहा गया कि प्रतिवादियों ने उन दावों को फिर से उठाया जो समझौता होने पर खत्म हो चुके थे। आगे यह भी कहा गया कि बेटी को पहले ही दो संपत्तियों के रूप में हिस्सा मिल चुका था, जिन्हें उसने बेच दिया।
इसके विपरीत, प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि समझौता दबाव में किया गया, क्योंकि पत्नी (R1) उस समय अमेरिका जाने के लिए जल्द से जल्द तलाक चाहती थी। यह तर्क भी दिया गया कि सेटलमेंट एग्रीमेंट में गुज़ारा-भत्ता (मेंटेनेंस) का कोई प्रावधान न होना ज़बरदस्ती का संकेत देता है, क्योंकि कानूनी रूप से मान्य सेटलमेंट एग्रीमेंट में पत्नी के लिए कानूनी गुज़ारा-भत्ते का प्रावधान होना चाहिए, और कानूनी व मौलिक अधिकारों को छोड़ने वाला सेटलमेंट एग्रीमेंट पब्लिक पॉलिसी के खिलाफ होने के कारण अमान्य होता है। आगे यह भी कहा गया कि बेटी को अपीलकर्ता से कोई संपत्ति नहीं मिली थी, क्योंकि जिन दो संपत्तियों का ज़िक्र किया गया, वे पहले से ही उसके नाम पर थीं।
रिकॉर्ड्स की जांच करने पर सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि पत्नी ने न केवल सेटलमेंट एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए, बल्कि फैमिली कोर्ट के सामने दावों को छोड़ने की बात दोहराते हुए हलफनामा भी दाखिल किया।
बेंच ने सेटलमेंट एग्रीमेंट पर विचार किया, जिसमें लिखा था:
“इसमें यह सहमति बनी है कि हमारे बीच हुए समझौते के आधार पर हम एर्नाकुलम फैमिली कोर्ट में लंबित O.P. (Div) No. 259/2015 को आगे नहीं बढ़ा रहे हैं; आज हम दोनों (23.07.2016) तलाक की संयुक्त याचिका दायर करने जा रहे हैं। हमारे बीच सभी वित्तीय लेन-देन समाप्त हो गए हैं; इसके आधार पर हम भविष्य में एक-दूसरे के खिलाफ कोई वित्तीय दावा नहीं करेंगे; दूसरी पार्टी पहली पार्टी से किसी भी गुज़ारा-भत्ते (मेंटेनेंस अलाउंस) का दावा नहीं करेगी।”
बेंच ने पत्नी द्वारा फैमिली कोर्ट में दाखिल हलफनामे पर विचार किया, जिसमें लिखा था:
“6. यह बताया जाता है कि हमारे बीच सभी दावों और देनदारियों का निपटारा हो गया। मैंने दूसरे याचिकाकर्ता के खिलाफ गुज़ारा-भत्ते के अपने दावे को छोड़ दिया। हम दोनों इस बात पर सहमत हुए कि हमारे वैवाहिक संबंधों से उत्पन्न कोई भी भविष्य का दावा या देनदारी एक-दूसरे के खिलाफ या हमारे बीच नहीं होगी। 7. आपसी सहमति से तलाक की यह याचिका हमारी अपनी मर्ज़ी, इच्छा और शादी को खत्म करने की चाहत से दायर की गई है। इस याचिका को दायर करने में कोई ज़बरदस्ती या अनुचित दबाव नहीं है।”
दोनों पक्षों को देखने के बाद बेंच ने पाया कि DV Act के तहत शिकायत सेटलमेंट एग्रीमेंट से पहले की कथित घटनाओं से जुड़ी थी, और तलाक के बाद कार्रवाई का कोई नया कारण नहीं बताया गया। बेंच ने यह भी देखा कि हालांकि प्रतिवादियों ने दबाव (duress) के आधार पर सेटलमेंट एग्रीमेंट और तलाक के आदेश को चुनौती देने की कोशिश की, लेकिन पत्नी ने आदेश रद्द करने या सेटलमेंट एग्रीमेंट को अमान्य घोषित करने के लिए कोई कानूनी कार्रवाई शुरू नहीं की।
कोर्ट ने कहा,
"बिना किसी कानूनी चुनौती के केवल दबाव का आरोप लगाना काफी नहीं है। चूंकि दोनों पक्ष अच्छी तरह से पढ़े-लिखे हैं और अपने अधिकारों के बारे में जानते हैं, इसलिए यह माना जाना चाहिए कि उन्होंने सोच-समझकर और अपनी मर्जी से सेटलमेंट एग्रीमेंट और संयुक्त तलाक याचिका पर हस्ताक्षर किए।"
बेंच ने धनंजय राठी बनाम रुचिका राठी मामले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने वैध समझौते के बावजूद DV Act के तहत कार्रवाई शुरू करने की प्रथा की आलोचना की थी।
R1 (पत्नी) के दावों के संबंध में अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बेटी के लिए एक अपवाद रखा। कोर्ट ने देखा कि सेटलमेंट एग्रीमेंट केवल पति और पत्नी के बीच हुआ था, और बेटी (जो सेटलमेंट एग्रीमेंट होने से पहले ही बालिग हो चुकी थी) इसमें शामिल नहीं थी।
इसलिए बेंच ने कहा,
"यह नहीं कहा जा सकता कि प्रतिवादी नंबर 2 - बेटी ने पैसे के दावों के अपने अधिकार को छोड़ दिया था।"
ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केरल हाई कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और कलामासेरी के ज्यूडिशियल फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट के सामने चल रही कार्यवाही को भी खत्म कर दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि R2 (बेटी) अपीलकर्ता के खिलाफ पैसे से जुड़ी राहत पाने के लिए नई कार्यवाही शुरू करने के लिए स्वतंत्र होगी, और ऐसी किसी भी कार्यवाही का फैसला उसके अपने गुण-दोष के आधार पर किया जाएगा।
Case Title: Reji Baby v Subi Mary