धोखाधड़ी की रकम आरोपी के अकाउंट में ट्रांसफर होने से ही FIRs को एक साथ जोड़ने का आधार नहीं बनता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (24 जुलाई) को साइबर धोखाधड़ी के आरोपी व्यक्ति को FIRs को एक साथ जोड़ने (क्लबिंग) की राहत देने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि धोखाधड़ी की रकम ट्रांसफर करने के लिए आरोपी के बैंक अकाउंट का इस्तेमाल होना ही यह साबित करने के लिए काफी नहीं है कि ये घटनाएं एक ही ट्रांज़ैक्शन का हिस्सा हैं, जिससे FIRs को एक साथ जोड़ा जा सके।
कोर्ट ने गौर किया कि हर FIR अलग-अलग शिकायतकर्ता ने दर्ज कराई, जिन्हें अलग-अलग मौकों पर पैसे देने के लिए बहलाया-फुसलाया गया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ इस बात से कि धोखाधड़ी की रकम का कुछ हिस्सा याचिकाकर्ता के बैंक अकाउंट में पहुंचा, अलग-अलग घटनाओं के बीच कोई "सीधा संबंध या जुड़ाव" साबित नहीं होता।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने कहा,
"सिर्फ़ इस बात से कि धोखाधड़ी की रकम का कुछ हिस्सा याचिकाकर्ता की प्रोप्राइटरी फर्म (निजी कारोबार) के बैंक अकाउंट में ट्रांसफर किया गया, यह साबित नहीं होता कि सभी घटनाएं एक ही ट्रांज़ैक्शन का हिस्सा हैं। हालांकि धोखाधड़ी का तरीका (modus operandi) एक जैसा लग सकता है, लेकिन पीड़ित, शामिल रकम, जिन ट्रांज़ैक्शन की शिकायत की गई और जो नुकसान हुआ, वे सब अलग-अलग हैं। इसलिए पहली नज़र में ये FIRs अलग-अलग ट्रांज़ैक्शन से जुड़ी हैं, जिनमें अलग-अलग अपराध सामने आए हैं और इन्हें एक ही ट्रांज़ैक्शन से जुड़ी घटनाएं नहीं कहा जा सकता।"
FIRs से सामने आए आरोपों के मुताबिक, ये घटनाएं साइबर धोखाधड़ी की हैं, जिनमें अनजान लोगों ने पुलिस अधिकारी बनकर शिकायतकर्ताओं से संपर्क किया और उन्हें झूठी जानकारी दी कि उनके नाम पर मनी लॉन्ड्रिंग की कई गतिविधियां हुईं। इस बहाने से शिकायतकर्ताओं को वेरिफिकेशन और जांच के नाम पर अलग-अलग बैंक खातों में बड़ी रकम ट्रांसफर करने के लिए बहलाया-फुसलाया गया।
आरोप है कि इस तरह ट्रांसफर किए गए पैसे का कुछ हिस्सा याचिकाकर्ता की प्रोप्राइटरी फर्म के बैंक अकाउंट में जमा किया गया। हालांकि, याचिकाकर्ता का नाम इन FIRs में आरोपी के तौर पर नहीं है, लेकिन उसकी प्रोप्राइटरी फर्म के बैंक अकाउंट का ज़िक्र इनमें ज़रूर है।
अलग-अलग राज्यों के पुलिस स्टेशनों में FIRs दर्ज होने के बाद याचिकाकर्ता ने संविधान के आर्टिकल 32 के तहत रिट याचिका दायर की और FIRs को रद्द करने या उनके क्लबिंग/एक साथ जोड़ने की मांग की।
जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में याचिकाकर्ता की याचिका खारिज करते हुए FIR रद्द करने से इनकार किया गया, क्योंकि याचिकाकर्ता मौलिक अधिकारों के उल्लंघन को साबित करने में विफल रहा। [देखें राजेंद्र बिहारी लाल बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2025 LiveLaw (SC) 1021]
इसके अलावा, कोर्ट ने FIR को एक साथ जोड़ने (क्लबिंग) का निर्देश देने से भी यह देखते हुए इनकार किया,
"...हर FIR अलग-अलग शिकायतकर्ता द्वारा दर्ज कराई गई, जिन्हें कथित तौर पर अलग-अलग मौकों पर पैसे देने के लिए उकसाया गया, लेकिन अलग-अलग लोगों के समूहों के बीच लेन-देन का कोई सीधा संबंध या जुड़ाव नहीं था।"
कोर्ट ने कहा,
"...एक ही घटना या ऐसी घटनाओं के संबंध में दूसरी FIR नहीं हो सकती, जो एक ही लेन-देन का हिस्सा हों। साथ ही, जहां बाद की FIR किसी अलग घटना या अपराध से संबंधित हो; जवाबी शिकायत हो; या किसी बड़ी साजिश का खुलासा करती हो, तो उसे दर्ज करना जायज है।" [देखें टीटी एंटनी बनाम केरल राज्य, (2001) 6 SCC 181]
कोर्ट ने 'स्टेट (NCT ऑफ़ दिल्ली) बनाम खिमजी भाई जडेजा, 2026 LiveLaw (SC) 11' के हालिया मामले का हवाला देते हुए बताया कि मौजूदा मामला FIR को एक साथ जोड़ने (क्लबिंग) को सही ठहराने के लिए 'एक ही लेन-देन' (same transaction) तय करने वाले "ट्रिपल टेस्ट" (तीन शर्तों) को पूरा करने में विफल रहा, यानी: (1) उद्देश्य और योजना की एकता; (2) समय और स्थान की निकटता; और (3) कार्रवाई की निरंतरता।
कोर्ट ने कहा,
"...हम रिट याचिका की प्रार्थना (c) में मांगी गई FIR को एक साथ जोड़ने और मिलाने (क्लबिंग और कंसोलिडेशन) की राहत देने में असमर्थ हैं। मौजूदा मामले में हर FIR अलग-अलग शिकायतकर्ता द्वारा दर्ज कराई गई, जिन्हें कथित तौर पर अलग-अलग मौकों पर पैसे देने के लिए उकसाया गया, लेकिन अलग-अलग लोगों के समूहों के बीच लेन-देन का कोई सीधा संबंध या जुड़ाव नहीं था।"
उपरोक्त के आधार पर याचिका खारिज की गई। साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि याचिकाकर्ता के पास कानून के तहत उचित राहत पाने के लिए सही फोरम (अदालत या प्राधिकरण) से संपर्क करने या कानून के तहत उपलब्ध कोई अन्य उपाय अपनाने की छूट है, यदि उसे ऐसी सलाह दी जाती है।
Cause Title: RUTVIJ BHAGAT SINGH WAKHARE Versus THE STATE OF MAHARASHTRA & ORS.