सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीनियर ऑफिसर के सामान्य प्रशासनिक निर्देश, अनुशासनात्मक निगरानी, ​​काम पर खराब टिप्पणी या सख्त व्यवहार को अकेले भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं माना जा सकता। इसके लिए अतिरिक्त सबूत होने चाहिए, जिनसे यह पता चले कि सीनियर का मकसद जानबूझकर जूनियर को आत्महत्या के लिए मजबूर करना था।

कोर्ट ने फॉरेस्ट के डिप्टी कंज़र्वेटर को बरी किया, जिन पर एक जूनियर फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप था। कोर्ट ने माना कि आत्महत्या से ठीक पहले ऐसा कोई "उकसाने वाला काम" नहीं हुआ, जिसे मृतक को आत्महत्या के लिए मजबूर करने वाला माना जा सके।

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट (नागपुर बेंच) और एडिशनल सेशन जज के उस आदेश को रद्द किया, जिसमें बरी करने की अर्जी खारिज कर दी गई। बेंच ने कहा कि अपीलकर्ता के खिलाफ IPC, 1860 की धारा 306 (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 108) के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने के अपराध के तत्व नहीं बनते थे।

हरिसाल रेंज में तैनात एक फॉरेस्ट रेंज ऑफिसर ने 25.03.2021 को खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। उसने तीन सुसाइड नोट छोड़े थे - एक मिस्टर रेड्डी (एडिशनल प्रिंसिपल चीफ कंज़र्वेटर ऑफ फॉरेस्ट) के नाम, एक अपनी मां के नाम और एक अपने पति के नाम। इन नोटों में अपीलकर्ता और मनीषा उइके पर आरोप लगाए गए। सुसाइड नोट के आधार पर अपीलकर्ता के खिलाफ FIR दर्ज की गई। हाईकोर्ट ने IPC की धारा 312 के तहत गर्भपात कराने का आरोप रद्द कर दिया, जबकि IPC की धारा 306, 504 और 506 के तहत बाकी आरोप बने रहे।

अचलपुर के एडिशनल सेशन जज ने अपीलकर्ता की बरी होने की अर्जी खारिज कर दी थी। उसने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच में रिवीजन याचिका दायर की, जिसे भी खारिज कर दिया गया। इसके बाद अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

सुसाइड नोट में आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता ने मृतक को बार-बार डांटा और सस्पेंड किया, उसकी छुट्टी की अर्जियां खारिज कीं, और गर्भवती होने के बावजूद उसे लगातार तीन दिनों तक पैदल चलने (ट्रेकिंग) के लिए मजबूर किया, जिसके कारण उसका गर्भपात हो गया। उसने मनीष उइके के कहने पर उसके खिलाफ़ 'अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989' के तहत FIR भी दर्ज कराई और उसके साथ गलत व्यवहार किया। मरने वाली महिला ने अपने सुसाइड नोट में आरोप लगाया था कि अपीलकर्ता उसकी मौत के लिए "पूरी तरह से जिम्मेदार" था।

अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के सामने तर्क दिया कि धारा 306 के तहत उकसाने (Abetment) के लिए आत्महत्या से ठीक पहले कोई करीबी घटना होनी चाहिए, जबकि सुसाइड नोट में बताई गई कोई भी घटना आत्महत्या के समय के करीब नहीं हुई थी। यह भी बताया गया कि गर्भपात कराने का आरोप पहले ही रद्द कर दिया गया।

हाईकोर्ट के आदेश का समर्थन करते हुए अभियोजन पक्ष ने कहा कि सुसाइड नोट में अपीलकर्ता द्वारा फील्ड विज़िट के दौरान लगातार दुर्व्यवहार और सबके सामने अपमानित करने का विवरण था। उन्होंने 2018 में एक चपरासी द्वारा दर्ज कराई गई एक और FIR का भी हवाला दिया, जिसमें अपीलकर्ता द्वारा अपने अधीनस्थ कर्मचारी के साथ क्रूर व्यवहार का आरोप लगाया गया।

सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 107 (जो 'उकसाने' को परिभाषित करती है) के साथ धारा 306 का ज़िक्र किया और कहा कि दायित्व तय करने के लिए तीन ज़रूरी बातें होनी चाहिए: "(i) प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उकसाना; (ii) आत्महत्या करने की घटना के ठीक पहले; (iii) आत्महत्या के लिए उकसाने का स्पष्ट इरादा (mens rea)।"

बेंच ने 'उदे सिंह बनाम हरियाणा राज्य' मामले का हवाला दिया और दोहराया कि उकसाने का मतलब है किसी व्यक्ति को कोई काम करने के लिए "प्रेरित करना, आगे बढ़ाना, भड़काना, उकसाना या प्रोत्साहित करना", और "गुस्से या भावना में कही गई बात, जिसके नतीजों का इरादा न हो, उसे उकसाना नहीं कहा जा सकता।"

उन्होंने 'प्रकाश बनाम महाराष्ट्र राज्य' के हालिया फैसले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि यह साबित होना चाहिए कि आरोपी ने "किसी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कार्य" के माध्यम से आत्महत्या में योगदान दिया, जिसमें उकसावा "आत्महत्या की घटना के ठीक पहले" हुआ हो और "उकसाने का स्पष्ट इरादा" दिखता हो।

बेंच ने 'मदन मोहन सिंह बनाम गुजरात राज्य' मामले का भी ज़िक्र किया, जिसमें एक ड्राइवर के सुसाइड नोट में अपने मालिक को दोषी ठहराने को अपर्याप्त माना गया, क्योंकि इस बात का कोई सबूत नहीं था कि आरोपी का "इरादा था या उसे पता था" कि उसकी हरकतों के कारण मरने वाला व्यक्ति अपनी जान दे देगा।

कोर्ट ने 'अभिनव मोहन डेलकर बनाम महाराष्ट्र राज्य' मामले में अपने हालिया फ़ैसले का ज़ोरदार हवाला दिया। इस फ़ैसले में कहा गया कि "धारा 306 और धारा 107 के तहत मामला बनाने के लिए, यह साफ़ तौर पर साबित होना चाहिए कि आत्महत्या लगातार हो रही प्रताड़ना का सीधा नतीजा थी और इसके लिए आत्महत्या से ठीक पहले कोई ऐसी घटना हुई हो, जिसने पीड़ित को अपनी जान लेने जैसा चरम कदम उठाने पर मजबूर कर दिया हो।"

बेंच ने इसे "ऊँट की पीठ तोड़ने वाली आखिरी तिनके" (straw that broke the camel's back) जैसी स्थिति बताया। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि "सिर्फ़ इसलिए कि पीड़ित को लगातार परेशान किया गया और एक समय पर उसने अपनी जान लेने जैसा चरम कदम उठा लिया, इसे अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने (Abetment) का मामला नहीं माना जा सकता। 'मेन्स रिया' (अपराध करने का इरादा) का पता सिर्फ़ पीड़ित के मन में चल रही बातों से नहीं लगाया जा सकता।"

ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए अपीलकर्ता पर लगे आरोपों को चार श्रेणियों में बांटा गया: (i) आधिकारिक फटकार और कारण बताओ नोटिस; (ii) अतिक्रमण हटाने और गाँव के पुनर्वास से जुड़े काम; (iii) मनीष उइके की मिलीभगत से कथित तौर पर FIR दर्ज करना; (iv) ट्रेक (पैदल यात्रा) जिसके कारण गर्भपात हुआ। धारा 306 के तहत इन आरोपों पर विचार करते हुए, बेंच ने कहा कि अगर हम इन सभी को सच भी मान लें तो भी ये IPC की धारा 306 के ज़रूरी तत्वों को साबित नहीं करते, क्योंकि "आत्महत्या से ठीक पहले उकसाने वाली कोई भी घटना नहीं हुई।"

कोर्ट ने गौर किया कि गर्भपात अक्टूबर 2020 में हुआ, जबकि आत्महत्या पाँच महीने से ज़्यादा समय बाद हुई और अतिक्रमण तथा FIR दर्ज करने की घटनाएँ मार्च 2020 की थीं।

आत्महत्या से कुछ समय पहले मिली फटकार के बारे में बेंच ने कहा,

"सामान्य प्रशासनिक निर्देश, अनुशासनात्मक निगरानी, ​​काम के प्रदर्शन के बारे में नकारात्मक टिप्पणी, या यहां तक कि वरिष्ठ अधिकारी का सख्त व्यवहार - भले ही मृतक को ये बातें बुरी लगी हों - उन्हें IPC की धारा 306 के तहत आत्महत्या के लिए उकसाने (abetment) का मामला नहीं माना जा सकता, जब तक कि कोई अतिरिक्त सबूत न हो जो यह दिखाए कि अधीनस्थ कर्मचारी को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का जानबूझकर इरादा है।"

सस्पेंशन (निलंबन) की धमकी के बारे में बेंच ने गौर किया कि अपीलकर्ता के पास किसी वरिष्ठ अधिकारी की मंज़ूरी के बिना मृतक को सस्पेंड करने का अधिकार नहीं है। इसलिए कोर्ट ने माना कि IPC की धारा 504 (जानबूझकर अपमान करना ताकि शांति भंग हो) और धारा 506 (आपराधिक धमकी के लिए सज़ा) के तहत कोई मामला नहीं बनता।

सुप्रीम कोर्ट ने अपील मंज़ूर की और हाईकोर्ट व सेशंस कोर्ट के आदेशों को रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि आपराधिक कार्यवाही जारी रखना "कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग" होगा। इस तरह अपीलकर्ता को सेशंस मामले से बरी कर दिया गया।

Case Title: Vinod Shivakumar v State of Maharashtra (SLP Crl. 17179/2025)

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