'हाईकोर्ट ने किसी भी बात पर चर्चा नहीं की': दहेज हत्या मामले में यांत्रिक तरीके से ज़मानत देने के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट की आलोचना की

Update: 2026-03-27 04:17 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट की आलोचना की कि उसने कथित दहेज हत्या के एक मामले में पति को ज़मानत देने का आदेश बिना सोचे-समझे (यांत्रिक तरीके से) पारित किया।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने पाया कि हाईकोर्ट ने अपराध की गंभीरता और रिकॉर्ड पर मौजूद उन सबूतों पर विचार किए बिना ज़मानत देकर गलती की, जिनसे पहली नज़र में आरोपी-पति की संलिप्तता का पता चलता है।

कोर्ट ने कहा,

"हाईकोर्ट द्वारा आरोपी को ज़मानत पर रिहा करने का जो आदेश दिया गया, वह पूरी तरह से गलत है। दहेज हत्या जैसे बेहद गंभीर अपराध में हाईकोर्ट को अपने विवेक का इस्तेमाल करते समय बहुत सावधान रहना चाहिए था।"

कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने जिस आधार पर ज़मानत दी, यानी आरोपी द्वारा जेल में बिताई गई अवधि और बाकी गवाहों की जांच में हुई देरी, वे आधार इस मामले में महत्वहीन थे। खासकर तब, जब पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मृत पत्नी के शरीर पर कई चोटें होने की बात सामने आई और ट्रायल भी संतोषजनक गति से आगे बढ़ रहा था।

कोर्ट ने कहा,

"हाईकोर्ट ने अपने आदेश में किसी भी बात पर चर्चा नहीं की। हाईकोर्ट ने सिर्फ़ इस बात को ध्यान में रखा कि आरोपी न्यायिक हिरासत में था और जिस तारीख को हाई कोर्ट ने आदेश दिया, तब तक केवल दो गवाहों की जांच हुई... हाईकोर्ट ने मामले के कई महत्वपूर्ण पहलुओं को नज़रअंदाज़ किया, विशेष रूप से पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट को, जिसमें मृतका के शरीर पर कई चोटें होने की बात कही गई। साथ ही 'भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023' की धारा 118 के तहत अपराध किए जाने की जो कानूनी धारणा (Presumption) है, उसे भी नज़रअंदाज़ किया।"

मामले की पृष्ठभूमि

अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि शादी के डेढ़ साल बाद मृत पत्नी अपने ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में मृत पाई गई और उसके शरीर पर बाहरी और अंदरूनी, दोनों तरह की चोटें थीं।

मृतका की मां (अपीलकर्ता) ने मृतका के पति (प्रतिवादी नंबर 2) के खिलाफ 'भारतीय न्याय संहिता, 2023' (BNS) की क्रमशः धारा 103(1) और 80 के तहत दंडनीय अपराधों के लिए FIR दर्ज कराई।

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में मौत का कारण सिर में चोट लगने से हुआ रक्तस्राव (Hemorrhage) और सदमा (Shock) बताया गया। इसके अलावा, रिपोर्ट में शरीर पर मौजूद बाहरी चोटों की भी पुष्टि की गई। आरोपी पति को हाईकोर्ट ने दूसरी कोशिश में ज़मानत दी, जिसके बाद मृतक की माँ ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

फ़ैसला

हाईकोर्ट के रवैये को गलत बताते हुए बेंच ने टिप्पणी की कि हाईकोर्ट अपराध की गंभीरता को समझने में नाकाम रहा। उसने रिकॉर्ड पर रखे गए ज़रूरी सबूतों पर ध्यान दिए बिना बस मशीनी तरीके से ज़मानत का आदेश पारित कर दिया; ये सबूत दिखाते थे कि आरोपी अपराध करने में शामिल था।

इसके समर्थन में कोर्ट ने शबीन अहमद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2025 LiveLaw (SC) 278 मामले का हवाला देते हुए दोहराया, जिसमें कहा गया,

"जहां तथ्य स्पष्ट रूप से जानलेवा घटनाओं में (आरोपी की) सीधी संलिप्तता दिखाते हैं, वहां दहेज हत्या के मामलों में ज़मानत देते समय अदालतों को बहुत ज़्यादा सावधानी बरतनी चाहिए।"

उपरोक्त बातों के आधार पर कोर्ट ने अपील स्वीकार की और आरोपी को ज़मानत देने वाला आदेश रद्द किया। साथ ही उसे एक हफ़्ते के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया।

इसके अलावा, रजिस्ट्री को निर्देश दिया गया,

"इस आदेश की एक प्रति पटना हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी जाए, जो बदले में इसे पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के समक्ष रखेंगे।"

हाल ही में जस्टिस पारदीवाला की अगुवाई वाली बेंच ने इलाहाबाद हाईकोर्ट को भी यह कहते हुए फटकार लगाई कि दहेज हत्या के एक मामले में ज़मानत देने के लिए बिना किसी ठोस कारण के आदेश पारित किया गया।

Cause Title: LAL MUNI DEVI VERSUS STATE OF BIHAR & ANR.

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