सिर्फ अरेस्ट मेमो देना गिरफ्तारी के आधार बताने के बराबर नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और रिमांड रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में Prabir Purkayastha VS. State (2024) मामले में दिए गए निर्णय के आधार पर एक अपीलकर्ता की गिरफ्तारी और रिमांड को रद्द कर दिया।
इस मामले में यह तय किया गया था कि CrPC की धारा 50 के तहत गिरफ्तारी के कारणों को लिखित रूप में देना अनिवार्य है।
अगर गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं, तो गिरफ्तारी और रिमांड कानून की नजर में अमान्य माने जाएंगे।
जस्टिस एम.एम. सुंदर्रेश और जस्टिन राजेश बिंदल की खंडपीठ ने पाया कि अपीलकर्ता को जो दस्तावेज़ दिया गया था, वह केवल एक अरेस्ट मेमो था, जिसमें कोई ठोस जानकारी नहीं थी, जैसे कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोपों का विवरण।
इस मेमो में सिर्फ आरोपी का नाम, गिरफ्तारी का स्थान और यह लिखा था कि उसे सह-आरोपी के बयान के आधार पर गिरफ्तार किया गया है।
कोर्ट ने कहा, "हम अपीलकर्ता के सिनियर एडवोकेट द्वारा प्रस्तुत दलील से सहमत हैं कि यह अरेस्ट मेमो 'गिरफ्तारी के आधार' के रूप में नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसमें कोई महत्वपूर्ण जानकारी नहीं दी गई थी।"
"यह CrPC की धारा 50 के स्पष्ट उल्लंघन का मामला है, जिसे भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(1) को प्रभावी बनाने के लिए शामिल किया गया था।"
"इसलिए, हम इस विवादित फैसले को रद्द करने के पक्ष में हैं, विशेष रूप से इस न्यायालय द्वारा दिए गए Prabir Purkayastha VS. State (NCT of Delhi) - (2024) 8 SCC 254 के फैसले को ध्यान में रखते हुए।"
इस मामले में, आरोपी को पिछले दिसंबर में गिरफ्तार किया गया था, जो IPC की धारा 384, 420, 468, 471, 509 और 120B के तहत दर्ज FIR से संबंधित था।
उसे 3 दिनों के लिए पुलिस हिरासत में भेजा गया था।
आरोपी ने अपनी गिरफ्तारी और रिमांड को पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने उनकी याचिका स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
30 जनवरी के हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ, सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की गई।
आरोपी ने अपनी गिरफ्तारी और रिमांड को तीन आधारों पर चुनौती दी:
1. CrPC की धारा 41A का पालन न किया जाना।
2. रिमांड के समय सुनवाई का अवसर न दिया जाना।
3. गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध न कराना।
सुप्रीम कोर्ट ने उसकी आपराधिक अपील पर केवल तीसरे आधार के संदर्भ में विचार किया।