भारतीय कानून के खिलाफ विदेशी तलाक का फैसला और नागरिकता बदलना, पति को 'द्विविवाह' के मुकदमे से नहीं बचा सकता: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार (3 नवंबर) को व्यक्ति के खिलाफ 'द्विविवाह' (दूसरी शादी करने) के मामले को जारी रखने का फैसला सुनाया। इस व्यक्ति ने ब्रिटेन की नागरिकता लेने के बाद वहां की अदालत से 'शादी के पूरी तरह टूट जाने' (Irretrievable Breakdown of Marriage) के आधार पर तलाक का फैसला हासिल किया था और इसके दम पर दूसरी शादी कर ली थी। इससे पहले उसने भारत में भी अपनी पहली शादी खत्म करने की कोशिश की थी, जो नाकाम रही थी।
चूंकि 'शादी के पूरी तरह टूट जाने' (Irretrievable Breakdown of Marriage) का आधार 'हिंदू विवाह अधिनियम, 1955' के तहत मान्य नहीं है, इसलिए कोर्ट ने कहा कि CPC (सिविल प्रक्रिया संहिता) की धारा 13 के अनुसार, ऐसा विदेशी तलाक का फैसला भारत में लागू नहीं होगा। यह फैसला उस महिला पर बाध्यकारी नहीं हो सकता, जिसने कभी विदेशी अदालत के अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं किया था, और जिसकी शादी भारत में हुई थी।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की खंडपीठ ने कहा,
"...अगर विदेशी फैसला CPC की धारा 13 की शर्तों को पूरा नहीं करता है तो क्या आरोपी नंबर 1 (पति) ऐसे फैसले के आधार पर यह दावा कर सकता है कि भारतीय वैवाहिक कानूनों की नजर में उसकी पहली शादी खत्म हो चुकी है। इस तरह वह IPC की धारा 494 (द्विविवाह के लिए सजा) से बच सकता है? हमारी राय में, इसकी अनुमति नहीं दी जा सकती।"
अपीलकर्ता (पति) ने सुप्रीम कोर्ट में आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी याचिका खारिज की गई थी। उसने अपनी पहली पत्नी (प्रतिवादी नंबर 1) द्वारा ब्रिटेन में दूसरी शादी करने के आरोप में शुरू किए गए 'द्विविवाह' का मामला रद्द करने की मांग की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में दखल देने से इनकार किया।
जस्टिस मिश्रा द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि विदेशी अदालत का 'शादी के पूरी तरह टूट जाने' (Irretrievable Breakdown of Marriage) के आधार पर दिया गया तलाक का फैसला भारतीय कानूनों के खिलाफ है, इसलिए यह भारत में लागू नहीं होगा।
कोर्ट ने अपने हालिया मामले 'किशोरकुमार मोहन काले बनाम कश्मीरा काले, 2026 लाइव लॉ (SC) 259' का हवाला देते हुए कहा,
“यह विदेशी तलाक का फैसला भारत के मौजूदा वैवाहिक कानूनों के खिलाफ है। ऐसे आधार पर दिया गया, जिसे कानून में मान्यता ही नहीं है। यह न केवल CPC की धारा 13 की कानूनी शर्तों का उल्लंघन करता है—जिनसे किसी भी विदेशी फैसले को गुजरना पड़ता है ताकि उसे भारत में लागू किया जा सके—बल्कि यह उन शर्तों को भी पूरा नहीं करता जो भारत में किसी विदेशी फैसले को लागू करने के लिए जरूरी हैं।”
विदेशी नागरिकता लेने और वहां दूसरी शादी करने के बाद भी पति 'द्विविवाह' (bigamy) के मामले में कानूनी कार्रवाई से नहीं बच सकता।
कोर्ट ने कहा,
“अब आरोपी नंबर 1 (पति) की इस दलील पर आते हैं कि जब उसने आरोपी नंबर 4 (दूसरी पत्नी) से दूसरी शादी की, तब वह ब्रिटिश नागरिक था और यह शादी भारत के बाहर हुई, इसलिए IPC की धारा 4 के प्रावधानों के तहत उसे जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। हम इस दलील को नहीं मान सकते, क्योंकि आरोपी नंबर 1 (पति) ने भारत में हिंदू रीति-रिवाजों के अनुसार प्रतिवादी नंबर 2 (पहली पत्नी) से शादी की थी। इसलिए भले ही दूसरी शादी भारत के बाहर हुई हो, IPC की धारा 494 के तहत लगे आरोप कमजोर नहीं होते। 'द्विविवाह' के अपराध की जांच केवल उस जगह तक सीमित नहीं रखी जा सकती जहां दूसरी शादी हुई, बल्कि इसमें पहले से मौजूद वैवाहिक रिश्ते को भी ध्यान में रखना जरूरी है। इसके अलावा, पहले से मौजूद शादी से जुड़े कानूनी नतीजों को, बाद में आरोपी नंबर 1 (पति) की नागरिकता बदलने से खत्म नहीं किया जा सकता।”
परिणामस्वरूप, अपील खारिज कर दी गई।
Case Title : N. SRIDHAR REDDY v. THE STATE OF A.P.