सुप्रीम कोर्ट ने टेलीफोन विभाग के कैशियर-सह-काउंटर क्लर्क को बरी करने के फैसले को बहाल रखा। यह मामला भारतीय दंड संहिता, 1860 (IPC) की धारा 409 (अब भारतीय न्याय संहिता, 2023/BNS की धारा 316(5)) के तहत दर्ज किया गया।

कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि आरोपी को संपत्ति सौंपी गई, या उसने उसका गबन किया, या उसकी मंशा बेईमान थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा आरोपी को बरी करने के फैसले को पलटने में हाई कोर्ट से गलती हुई।

जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट का वह फैसला रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। बॉम्बे हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को पलट दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि जांच अधिकारी द्वारा मांगे जाने के बावजूद, अभियोजन पक्ष मूल कैशबुक, दैनिक रजिस्टर और ऑडिट रिपोर्ट पेश करने में विफल रहा।

कोर्ट ने आगे कहा कि इन दस्तावेजों के बिना, "यह कहना मुश्किल होगा कि वास्तव में आरोपी को नकद राशि सौंपी गई, जो कि 'विश्वासघात' (Breach of Trust) साबित करने के लिए एक मुख्य शर्त है।"

आरोपी औरंगाबाद में टेलीफोन विभाग में कैशियर-सह-काउंटर क्लर्क के रूप में काम कर रहा था। आरोप है कि उसने ग्राहकों से 8,73,737 रुपये का टेलीफोन शुल्क वसूला, जिसमें से 3,88,035 रुपये तो सरकारी खाते में जमा कर दिए गए, लेकिन 4,75,702 रुपये कभी जमा ही नहीं किए गए। इसके बाद IPC की धारा 409, 477 और 420 (अब BNS की धारा 316(5), 343 और 318(4)) के तहत मामला दर्ज किया गया। हालांकि, आरोप केवल IPC की धारा 409 के तहत तय किए गए। ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के सबूतों को "अस्पष्ट और सामान्य प्रकृति का" मानते हुए आरोपी को बरी कर दिया। इसमें यह भी कहा गया कि जब्त किए गए रजिस्टरों को सबूत के तौर पर पेश नहीं किया जा सका, क्योंकि गवाहों ने अभियोजन पक्ष का समर्थन नहीं किया। साथ ही यह माना गया कि जब अपीलकर्ता के घर से कथित तौर पर 46 वस्तुएं जब्त की गईं, तब दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 100(7) - जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 103(7) है - के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

इसके बाद बॉम्बे हाईकोर्ट (औरंगाबाद बेंच) ने बरी किए जाने का फैसला पलट दिया और अपीलकर्ता को एक साल के कठोर कारावास की सजा सुनाई। साथ ही 5,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया; जुर्माना न भरने की स्थिति में उसे एक महीने की अतिरिक्त जेल काटनी होगी।

बॉम्बे हाईकोर्ट के इस फैसले से असंतुष्ट होकर आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट बी.एच. मारलापल्ले और सीनियर एडवोकेट सुधांशु एस. चौधरी ने अपीलकर्ता की ओर से दलील दी कि हाईकोर्ट ने बरी किए जाने के फैसले में हस्तक्षेप करने से जुड़े स्थापित सिद्धांतों को नजरअंदाज किया। हाईकोर्ट ने केवल इसलिए अपना नजरिया थोप दिया, क्योंकि एक दूसरा नजरिया भी संभव था। यह भी कहा गया कि 'सौंपी गई संपत्ति' (Entrustment) और 'बेईमानी के इरादे' को साबित नहीं किया जा सका। इसके अलावा, अभियोजन पक्ष को संबंधित रिकॉर्ड पेश करने का आदेश दिया गया, लेकिन वे ऐसा करने में विफल रहे, जिससे उनके खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference) निकाला जाना चाहिए था। यह भी तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट ने गलत तरीके से सबूत पेश करने का भार (Burden of Proof) अपीलकर्ता पर डाल दिया।

प्रतिवादी पक्ष ने तर्क दिया कि 8,73,737 रुपये की राशि सौंपे जाने (Entrustment) की बात साबित हो चुकी है। उन्होंने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने इन दस्तावेजों पर ठीक से विचार नहीं किया: अपीलकर्ता को दिया गया वह नोटिस (प्रदर्श 7) जिसमें पूछा गया कि ग्राहकों से मिली रकम जमा क्यों नहीं की गई; अपीलकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित रसीद बुक (प्रदर्श 8); 4,75,700 रुपये की राशि जमा होने को दर्शाने वाली सूची (प्रदर्श 9); और हैंडराइटिंग एक्सपर्ट (हस्तलेख विशेषज्ञ) की राय।

'चेलूर मंकल नारायण इत्तिरावी नंबूदिरी बनाम त्रावणकोर-कोचीन राज्य' मामले का हवाला देते हुए खंडपीठ ने कहा कि बरी किए जाने के खिलाफ अपील में अपीलीय अदालत को ट्रायल कोर्ट के विचारों को उचित महत्व देना चाहिए। इसमें गवाहों की विश्वसनीयता, आरोपी के निर्दोष होने की धारणा, संदेह का लाभ पाने के आरोपी के अधिकार और उन निष्कर्षों को बदलने में अपीलीय अदालत द्वारा बरती जाने वाली सावधानी शामिल है, जो गवाहों को प्रत्यक्ष रूप से देखने वाले जज द्वारा दिए गए हों।

अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि धारा 405 के तहत 'आपराधिक विश्वासघात' (क्रिमिनल ब्रीच ऑफ ट्रस्ट) के लिए जरूरी है कि संपत्ति किसी को सौंपी गई हो या उस पर उसका नियंत्रण हो, और फिर बेईमानी से उसका गबन किया गया हो, उसे बदला गया हो, इस्तेमाल किया गया हो या ठिकाने लगाया गया हो। 'आर. वेंकटकृष्णन बनाम सीबीआई' मामले का हवाला देते हुए यह भी कहा गया कि केवल विश्वासघात करना तब तक अपराध नहीं है, जब तक कि उसके पीछे बेईमानी का इरादा न हो; हालांकि, संपत्ति का अस्थायी गबन भी इस अपराध के दायरे में आता है।

अदालत ने शुरुआती जांच अधिकारी (PW 12) के बयान पर गौर किया, जिसमें उन्होंने बताया कि शिकायतकर्ता ने कैशबुक, बैलेंस शीट, डेली रजिस्टर, ऑडिट रिपोर्ट या रफ कैशबुक पेश नहीं की थी। साथ ही किसी भी सब्सक्राइबर ने रसीद न मिलने या कनेक्शन कट जाने की कोई शिकायत नहीं की थी।

इस पर खंडपीठ ने निम्नलिखित टिप्पणी की:

“उपर्युक्त स्वीकारोक्तियों से स्पष्ट है कि IO (जांच अधिकारी) द्वारा मूल कैशबुक, ऑडिट रिपोर्ट और अन्य संबंधित दस्तावेज (जिनमें ग्राहकों से वसूली गई रकम का विवरण भी शामिल है) पेश करने के लिए कहे जाने के बावजूद, शिकायतकर्ता, PW1 और टेलीफोन विभाग के अन्य अधिकारियों ने इन्हें पेश नहीं किया। इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर अपीलकर्ता को संपत्ति सौंपी गई।”

इसमें आगे कहा गया कि मूल कैशबुक या दैनिक रजिस्टर से यह पता चल सकता था कि अपीलकर्ता ने कितनी नकदी जमा की है। इससे यह स्थिति बनती है कि या तो उसने वह रकम जमा ही नहीं की, या फिर कुछ समय के लिए उसका गबन (दुरुपयोग) कर लिया।

ट्रायल कोर्ट ने दैनिक कैश हैंडओवर रजिस्टर और अपीलकर्ता को दी गई रसीद बुक्स के स्टॉक रजिस्टर को पेश न किए जाने पर एक प्रतिकूल निष्कर्ष (Adverse Inference) निकाला था। इस पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की थी कि अपीलकर्ता को दैनिक रजिस्टर पेश करने चाहिए थे।

हाईकोर्ट के इस नजरिए से असहमति जताते हुए बेंच ने कहा:

“हमारी राय में ट्रायल कोर्ट का अभियोजन पक्ष (Prosecution) के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकालना सही था, क्योंकि वे उन संबंधित दस्तावेजों को रिकॉर्ड पर नहीं ला पाए जो शिकायतकर्ता, यानी टेलीफोन विभाग की कस्टडी में थे।”

पंच गवाहों के अपने बयान से मुकर जाने (हॉस्टाइल होने) के संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने कहा,

“जब्ती (Seizure) को साबित करने में गंभीर कमियां हैं, क्योंकि दोनों गवाहों ने अभियोजन पक्ष का समर्थन नहीं किया। इसके अलावा, कोड की धारा 100(4) और 100(7) की आवश्यकताओं का पालन न करके उनका उल्लंघन किया गया। ऐसी स्थिति में केवल IO के बयान के आधार पर—बिना किसी अन्य पुख्ता सबूत के—जब्ती को सही ढंग से साबित हुआ नहीं माना जा सकता।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि एक वैध जब्ती को साबित करने की जिम्मेदारी अभियोजन पक्ष की थी।

'सुंदर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य' और 'पंजाब राज्य बनाम बलबीर सिंह' मामलों का हवाला देते हुए बेंच ने स्पष्ट किया कि धारा 100 का पालन न करने से ही पूरी जब्ती अवैध नहीं हो जाती; यह केवल एक प्रक्रियात्मक अनियमितता (Irregularity) है। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि जब इसे अन्य ऐसे कारकों के साथ मिलाकर देखा जाता है जो अभियोजन पक्ष के मामले पर संदेह पैदा करते हैं, तो “यह अपीलकर्ता के पक्ष में जाता है, खासकर तब जब मामला बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ अपील का हो।”

खंडपीठ ने हाईकोर्ट के फैसले में एक और बड़ी कमी पाई। 29.09.2017 को बहस पूरी होने के बाद हाईकोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया और 12.10.2017 को सुनाया। उसी दिन, अपीलकर्ता को दोषी ठहराते हुए उसे सजा भी सुना दी गई, जबकि सजा तय करने से पहले उसका पक्ष नहीं सुना गया।

'मुकेश कुमार यादव बनाम स्टेट (अंडमान और निकोबार द्वीप समूह)' मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि यदि कोई अपीलीय अदालत किसी आरोपी को बरी किए जाने के फैसले को पलटकर पहली बार दोषी ठहराती है तो उसे "सजा के सवाल पर दोषी व्यक्ति का पक्ष सुनना होगा।" वह केवल सजा सुनाने के लिए मामले को वापस ट्रायल कोर्ट के पास नहीं भेज सकती।

इसके अलावा, यह भी कहा गया कि हाईकोर्ट ने इस बात को बहुत ज़्यादा अहमियत दी कि अपीलकर्ता जब्त किए गए दस्तावेजों के बारे में स्पष्टीकरण नहीं दे सका। 'रवींद्र कुमार डे बनाम स्टेट ऑफ ओडिशा' मामले के आधार पर, कोर्ट ने कहा कि यह साबित करने की ज़िम्मेदारी पूरी तरह से अभियोजन पक्ष (Prosecution) की है। आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता है, और अभियोजन पक्ष की यह ज़िम्मेदारी कभी नहीं बदलती।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला,

"हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता पर यह बोझ डालकर गलती की है।"

इस प्रकार, खंडपीठ ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को सही ढंग से बरी किया था।

खंडपीठ ने कहा,

"अभियोजन पक्ष यह साबित करने में विफल रहा कि अपीलकर्ता को संपत्ति सौंपी गई। रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री इस नतीजे पर पहुँचने के लिए पर्याप्त नहीं है कि अपीलकर्ता ने उस संपत्ति का गबन किया। ऐसा कोई सबूत भी नहीं है जिससे यह पता चले कि अपीलकर्ता की कोई बेईमानी भरी मंशा थी, जिसके कारण दंड संहिता की धारा 409 के तहत कोई अपराध बनता हो। हाईकोर्ट ने बरी करने के फैसले को पलटकर गलती की। हाईकोर्ट ने इस तथ्य को पर्याप्त महत्व नहीं दिया कि ट्रायल कोर्ट के पास गवाहों के व्यवहार को देखने का मौका था और सभी सबूतों का आकलन करने के बाद ही उसने अपीलकर्ता को बरी किया था।"

खंडपीठ ने आगे कहा,

“हाईकोर्ट द्वारा आपराधिक अपील संख्या 278/2002 में 12.10.2017 को दिया गया फैसला रद्द किया जाता है। औरंगाबाद के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा RCC संख्या 80163/1996 में 20.02.2002 को अपीलकर्ता को बरी किए जाने का फैसला बहाल किया जाता है। इस प्रकार, अपीलकर्ता को दंड संहिता की धारा 409 के तहत दंडनीय अपराध से बरी किया जाता है।”

Case Title : Ramkrushna Prahllad Dongardive v State of Maharashtra (Diary No 36340/2017)

अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

Tags: