विवाद सुलझाने की कोशिश पुलिस को अपराध का संज्ञान लेने से नहीं रोक सकती: सुप्रीम कोर्ट

Update: 2026-03-14 09:21 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आपस में झगड़ रहे गुटों के बीच विवाद सुलझाने की पुलिस की कोशिश उन्हें आपराधिक कृत्यों के लिए FIR दर्ज करने से नहीं रोक सकती।

जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा,

"सिर्फ़ सुलह की कोशिश पुलिस को आपराधिक कृत्यों का संज्ञान लेने से नहीं रोक सकती।"

यह मामला पंजाब के एक इलाके में दो गुटों के बीच हुए विवाद से जुड़ा है। अपीलकर्ता अनुसूचित जाति समुदाय से है, जबकि प्रतिवादी उच्च जाति के गुट से है। बताया जाता है कि यह विवाद इस आरोप पर शुरू हुआ कि नाली का पानी मोड़कर अपीलकर्ताओं के घरों में डाला जा रहा है।

तनाव बढ़ा तो पुलिस मौके पर पहुंची और विवाद में मध्यस्थता करने की कोशिश की। हालांकि, आरोप है कि सुलह की कोशिशों के दौरान ही स्थिति हिंसक हो गई। अभियोजन पक्ष के अनुसार, गोलियां चलाई गईं और अनुसूचित जाति समुदाय के सदस्यों के साथ जाति-सूचक गालियां दी गईं।

इसके बाद घटना के चश्मदीद एक पुलिस अधिकारी के बयान के आधार पर FIR दर्ज की गई।

पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने प्रतिवादियों को अग्रिम ज़मानत दी थी, सिर्फ़ इसलिए कि FIR पुलिस के बयानों के आधार पर दर्ज की गई, न कि पीड़ितों द्वारा खुद; जिसके बाद अनुसूचित जनजाति समुदाय के सदस्यों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द करते हुए बेंच ने FIR दर्ज करने के लिए सूचना के स्रोत पर हाईकोर्ट का भरोसा खारिज कर दिया। बेंच ने कहा कि अपराध के चश्मदीद पुलिस अधिकारी के बयान के आधार पर भी FIR वैध रूप से दर्ज की जा सकती है, भले ही गुटों के बीच विवाद सुलझाने की प्रक्रिया चल रही हो।

कोर्ट ने कहा कि किसी संज्ञेय अपराध (गंभीर अपराध) की जानकारी मिलने के बाद FIR दर्ज करने का विवेकाधीन अधिकार पुलिस के पास होता है। इस अधिकार को सिर्फ़ इसलिए कम नहीं किया जा सकता कि गुटों के बीच सुलह की कोशिशें चल रही थीं।

कोर्ट ने कहा,

"खुद पुलिस भी मानती है कि इलाके में तनाव था, जिसके चलते आपराधिक कृत्य हुए।"

कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जब आपराधिक अपराध होते हैं तो पुलिस का यह फ़र्ज़ बनता है कि वह कार्रवाई करे। भले ही वह साथ-साथ विवाद में मध्यस्थता करने की कोशिश भी कर रही हो।

संक्षेप में कहें तो कोर्ट ने कहा कि सुलह या मध्यस्थता की कोशिशें, आपराधिक कानूनों को लागू करने के पुलिस के वैधानिक कर्तव्य से ऊपर नहीं हो सकतीं। तदनुसार, अपील स्वीकार कर ली गई, FIR को वैध माना गया और प्रतिवादियों को दी गई अग्रिम ज़मानत इस तथ्य के आधार पर रद्द की गई कि उनके विरुद्ध SC/ST Act के तहत प्रथम दृष्टया मामला बनता है।

Cause Title: Kuldeep Singh and Anr. Versus State of Punjab and Anr. (with connected appeal)

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