सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को चेतावनी दी: उम्र या जेंडर की परवाह किए बिना, हर लापता व्यक्ति के लिए तुरंत FIR दर्ज होनी चाहिए
सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में साफ़ किया कि लापता व्यक्ति के बारे में जानकारी मिलने पर पुलिस को तुरंत FIR दर्ज करने का उसका निर्देश हर व्यक्ति पर लागू होता है, चाहे उसकी उम्र या जेंडर कुछ भी हो। कोर्ट ने कहा कि उसके पिछले आदेश में "व्यक्ति" (Person) शब्द का मतलब सिर्फ़ बच्चों से नहीं निकाला जा सकता और चेतावनी दी कि जो राज्य और केंद्र शासित प्रदेश इस निर्देश का पालन नहीं करेंगे, उनके ख़िलाफ़ अदालत की अवमानना की कार्रवाई हो सकती है।
जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने मानव तस्करी को रोकने और लापता लोगों का पता लगाने के उपायों से जुड़ी कार्यवाही में अपने पिछले आदेशों के पालन की समीक्षा करते हुए यह निर्देश जारी किया।
कोर्ट ने गौर किया कि 22 मई, 2026 के आदेश के तहत सभी राज्यों को निर्देश दिया गया कि वे किसी भी लापता व्यक्ति के बारे में जानकारी मिलने पर FIR दर्ज करें। हालांकि, कोर्ट को बताया गया कि कुछ राज्य यह समझकर काम कर रहे थे कि पिछले आदेश में "व्यक्ति" शब्द का मतलब सिर्फ़ बच्चों से था।
कोर्ट ने इस व्याख्या को खारिज कर दिया और इसे "जानबूझकर और गलत नीयत से खड़ा किया गया बहाना" बताया। कोर्ट ने साफ़ किया कि "व्यक्ति" का मतलब हर व्यक्ति है, चाहे उसकी उम्र या जेंडर कुछ भी हो।
कोर्ट ने कहा,
"आज हमें यह जानकर हैरानी हुई कि कुछ राज्यों को यह गलतफहमी है कि 'व्यक्ति' शब्द का मतलब सिर्फ़ बच्चों से है और इसमें वयस्क शामिल नहीं हैं। हमें लगता है कि ऐसे राज्यों ने जानबूझकर और गलत नीयत से यह बहाना बनाया। हमारे पिछले आदेश की भाषा साफ़ और स्पष्ट है। 'व्यक्ति' शब्द का मतलब हर व्यक्ति है, चाहे उसकी उम्र या जेंडर कुछ भी हो।"
कोर्ट ने कहा कि अगर किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश ने पिछले आदेश का पालन नहीं किया है तो संबंधित मुख्य सचिव और DGP को अवमानना का नोटिस जारी किया जाएगा। उन्हें व्यक्तिगत रूप से कोर्ट के सामने पेश होना होगा और कारण बताओ हलफनामा (Show-Cause Affidavit) दाखिल करना होगा कि क्यों उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई न की जाए और कोर्ट के आदेशों की जानबूझकर अनदेखी और पालन न करने के लिए उन्हें सज़ा न दी जाए।
22 मई के आदेश के तहत कोर्ट ने हर पुलिस स्टेशन को निर्देश दिया था कि जैसे ही किसी व्यक्ति के लापता होने की जानकारी मिले, तुरंत FIR दर्ज की जाए। पुलिस को खास तौर पर शुरुआती जांच का इंतज़ार करने या लापता व्यक्ति को पहले परिवार या अभिभावकों द्वारा खोजने के लिए छोड़ने से मना किया गया। कोर्ट ने कहा था कि लापता व्यक्ति का पता लगाने के लिए पुलिस मशीनरी को तुरंत सबसे ऊंचे स्तर पर सक्रिय किया जाना चाहिए। कोर्ट ने माना था कि किसी व्यक्ति के लापता होने के बाद के शुरुआती कुछ घंटे "गोल्डन आवर्स" होते हैं, जिनमें उनके सुरक्षित मिलने की संभावना सबसे ज़्यादा होती है।
कोर्ट ने निर्देश दिया था कि FIR में 'भारतीय न्याय संहिता, 2023' (BNS) की संबंधित धाराओं और किसी व्यक्ति या बच्चे के अपहरण या तस्करी से जुड़े अन्य लागू कानूनी प्रावधानों को शामिल किया जाए।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि अगर जांच एजेंसी के पास यह मानने का ठोस कारण हो कि मामला तस्करी से जुड़ा है तो इसे चार महीने की अवधि खत्म होने का इंतज़ार किए बिना मानव तस्करी, अपहरण और उससे जुड़े अपराधों को देखने वाली विशेष यूनिट को सौंप दिया जाना चाहिए।
कोर्ट ने केंद्र सरकार, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को यह सुनिश्चित करने का भी निर्देश दिया कि सभी AHTU (एंटी-ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट) चार हफ़्तों के भीतर पूरी तरह से काम करने लगें।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि बरामद या बचाए गए व्यक्ति को सही अभिभावक को सौंपे जाने की पुष्टि के बाद, बिना किसी देरी के उनके परिवार को वापस सौंप दिया जाना चाहिए। हालांकि, अगर परिवार या अभिभावकों की मिलीभगत से व्यक्ति की तस्करी की गई तो पीड़ित को उस परिवार को नहीं सौंपा जाना चाहिए था; ऐसे में उनकी देखभाल और सुरक्षा की ज़िम्मेदारी राज्य के अधिकारियों, जिसमें बाल कल्याण समितियां भी शामिल हैं, की होनी चाहिए थी।
कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया था कि लापता होने के बाद मिले या बचाए गए हर व्यक्ति को तुरंत आधार वेरिफिकेशन या आधार कार्ड बनवाने (जैसा भी मामला हो) के लिए ले जाया जाए। साथ ही कोर्ट ने अधिकारियों से कहा था कि वे माता-पिता या अभिभावकों की स्वेच्छा से सहमति मिलने पर जन्म स्थान पर ही आधार कार्ड जारी करने की संभावना पर विचार करें।
5 अगस्त के अपने हालिया आदेश में कोर्ट ने यह भी गौर किया कि कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने उसके पिछले निर्देशों का पालन करने के बारे में हलफनामे दाखिल नहीं किए। कोर्ट ने माना कि प्रथम दृष्टया यह अदालत की अवमानना का मामला है।
कोर्ट ने संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों और DGP को अवमानना नोटिस जारी करने का निर्देश दिया। उन्हें व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने और कारण बताओ हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया गया, जिसमें यह बताया जाए कि कोर्ट के खास निर्देशों का पालन न करने के लिए उनके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही क्यों न शुरू की जाए।
कोर्ट ने देखा कि केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख ने अपना जवाब दाखिल नहीं किया। कोर्ट ने लद्दाख के मुख्य सचिव और DGP को व्यक्तिगत रूप से सत्यापित हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया, जिसमें यह बताया जाए कि निर्देशों का पालन न करने के लिए उनके खिलाफ उचित कार्रवाई क्यों न की जाए।
कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह छह सप्ताह के भीतर देश भर के सभी संबंधित पोर्टलों को आपस में जोड़े।
इस मामले की अगली सुनवाई 5 अक्टूबर, 2026 को दोपहर 2 बजे तय की गई।
Case Title – G. Ganesh v. State of Tamil Nadu & Ors