सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व भारतीय व्यापार सेवा अधिकारी को समय से पहले अनिवार्य रिटायरमेंट देने का आदेश रद्द करते हुए केंद्र सरकार को उन्हें 15 लाख रुपये देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि बेदाग सेवा रिकॉर्ड और लगातार उत्कृष्ट मूल्यांकन वाले अधिकारी को बिना किसी नए प्रतिकूल रिकॉर्ड के अचानक डेडवुड या संदिग्ध सत्यनिष्ठा वाला अधिकारी नहीं बताया जा सकता।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने अधिकारी को प्रतिष्ठा को हुए नुकसान के लिए 9 लाख रुपये और मुकदमे के खर्च के लिए 6 लाख रुपये देने का आदेश दिया। साथ ही कोर्ट ने विदेश व्यापार महानिदेशक को निर्देश दिया कि अधिकारी को कार्यालय बुलाकर पूरे सम्मान के साथ औपचारिक विदाई दी जाए जैसी विदाई उन्हें निर्धारित रिटायरमेंट की तारीख पर मिलती।

कोर्ट ने कहा कि अनिवार्य रिटायरमेंट का उद्देश्य ऐसे सरकारी कर्मचारियों को सेवा से हटाना है, जो जनहित की कसौटी पर अपनी उपयोगिता खो चुके हों। लेकिन जिस अधिकारी को उसकी योग्यता के आधार पर अनिवार्य रिटायरमेंट से महज दो महीने पहले संयुक्त सचिव के पद पर पदोन्नति दी गई हो, उसे अचानक 'डेडवुड' बताने के लिए बीच की अवधि में कोई प्रतिकूल सामग्री होना जरूरी है।

पीठ ने कहा कि अधिकारी को संघ लोक सेवा आयोग की मंजूरी के बाद संयुक्त सचिव पद पर पदोन्नति मिली थी और नियुक्ति समिति की स्वीकृति भी प्राप्त थी। यह इस बात की स्पष्ट मान्यता थी कि अधिकारी की सेवा अत्यंत संतोषजनक और योग्यता आधारित थी तथा वह अधिक जिम्मेदारी संभालने के योग्य था।

कोर्ट ने कहा कि विभाग द्वारा पदोन्नति देने के महज दो महीने बाद उसी अधिकारी को जनहित के नाम पर 'डेडवुड' बताकर सेवा से हटाना दोनों कार्रवाइयों को एक-दूसरे के विपरीत खड़ा करता है। दोनों बातें एक साथ सही नहीं हो सकतीं।

पीठ ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि जिसने अपने जीवन के बेहतरीन वर्ष देश की सेवा में लगाए, ऐसे अधिकारी को 'डेडवुड' बताकर जनहित के नाम पर सेवा से हटाना दुर्भावना और अधिकारों के मनमाने इस्तेमाल की ओर इशारा करता है। कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कुछ नहीं है, जिससे यह साबित हो कि अनिवार्य सेवानिवृत्ति का आदेश वास्तव में जनहित में लिया गया।

अधिकारी वर्ष 1989 में भारतीय व्यापार सेवा में नियुक्त हुए थे। 1994 में उन्हें विदेश व्यापार महानिदेशालय में उप-महानिदेशक और 2001 में संयुक्त महानिदेशक बनाया गया। वर्ष 2014 में उन्हें महानिदेशालय में अतिरिक्त निदेशक नियुक्त किया गया।

16 नवंबर 2017 को उन्हें संयुक्त सचिव स्तर के वरिष्ठ प्रशासनिक ग्रेड में रखा गया। इसके बाद 27 फरवरी 2018 को उन्हें नियमित पदोन्नति दी गई। लेकिन महज दो महीने से कुछ अधिक समय बाद, 10 मई 2018 को सक्षम प्राधिकारी ने मौलिक नियम 56(जे) के तहत उन्हें निर्धारित सेवानिवृत्ति से करीब पांच वर्ष पहले ही अनिवार्य रिटायरमेंट दे दिया।

समीक्षा समिति ने सेवा संबंधी गोपनीय मूल्यांकन रिपोर्ट में कुछ टिप्पणियों, तत्कालीन अतिरिक्त सचिव एवं महानिदेशक की गोपनीय टिप्पणी और पूर्व वरिष्ठ अधिकारी के साथ हुई बातचीत के आधार पर समय से पहले रिटायरमेंट की सिफारिश की थी।

केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण और इसके बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने भी अनिवार्य रिटायरमेंट का आदेश बरकरार रखा था। इसके बाद अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

जस्टिस दीपांकर दत्ता द्वारा लिखे गए फैसले में पीठ ने कहा कि अधिकारी को करियर के शुरुआती दौर में लगातार 'उत्कृष्ट' मूल्यांकन मिला था और बाद में भी उनकी वार्षिक गोपनीय मूल्यांकन रिपोर्ट में लगातार अच्छे अंक रहे। ऐसे में उनकी हालिया योग्यता आधारित पदोन्नति को इस सवाल पर विचार करते समय नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि क्या वह आगे सेवा के लिए अनुपयुक्त हो गए।

कोर्ट ने समीक्षा समिति की इस बात के लिए भी आलोचना की कि उसने अधिकारी के खिलाफ जाने वाली कुछ सामग्री पर चुनिंदा तरीके से भरोसा किया, जबकि पूरे सेवा रिकॉर्ड, हालिया प्रदर्शन और पदोन्नति जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर समुचित विचार नहीं किया।

पीठ ने स्पष्ट किया कि मौलिक नियम 56(जे) का इस्तेमाल नियमित विभागीय कार्यवाही से बचने के लिए या बिना पर्याप्त सामग्री के किसी अधिकारी को सेवा से हटाने, बदला लेने अथवा किसी निहित स्वार्थ को पूरा करने के लिए नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि जब किसी अधिकारी को लगातार उत्कृष्ट मूल्यांकन मिलने के बाद पदोन्नति दी गई हो और उसके बाद बिना किसी नए प्रतिकूल रिकॉर्ड के अचानक यह राय बना ली जाए कि उसका प्रदर्शन अपेक्षित स्तर का नहीं है तो ऐसा निर्णय प्रथमदृष्टया मनमाना, विकृत और अधिकारों का गलत इस्तेमाल माना जा सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपील मंजूर करते हुए अधिकारी को सभी सेवा लाभ देने का निर्देश दिया, मानो उन्हें अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त किया ही नहीं गया। यदि इस अवधि में उनसे कनिष्ठ अधिकारियों को पदोन्नति मिली है तो कानून के अनुसार उन्हें काल्पनिक पदोन्नति का लाभ भी दिया जाएगा।

इसके साथ ही कोर्ट ने विदेश व्यापार महानिदेशक को अधिकारी को कार्यालय बुलाकर पूरे सम्मान के साथ विदाई देने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि उन्हें वैसी ही विदाई मिलनी चाहिए थी, जैसी उनकी निर्धारित सेवानिवृत्ति के समय मिलती, लेकिन समय से पहले और बिना सम्मान के सेवा संबंध समाप्त कर दिए गए।

गौरतलब है कि अप्रैल 2026 में भी जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ ने पूर्व वायुसेना कर्मी की प्रतिष्ठा बहाल करने के लिए उसे औपचारिक विदाई देने का निर्देश दिया। उस मामले में भी समान आरोपों पर आपराधिक कार्यवाही से बरी किए जाने के बावजूद उसके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की गई।

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