अगर क्लाइंट विरोधी बन जाए, तब भी वकील उसकी गोपनीय जानकारी ज़ाहिर नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट ने वकील का सस्पेंशन सही ठहराया
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (21 अगस्त) को वकील के प्रैक्टिस करने के लाइसेंस को दो साल के लिए सस्पेंड करने का फ़ैसला सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि पब्लिक में लगे आरोपों का जवाब देने के नाम पर पुराने क्लाइंट की गोपनीय जानकारी ज़ाहिर करना सही नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने कहा,
"वकील का फ़र्ज़ इस बात पर निर्भर नहीं करता कि क्लाइंट का वकील के प्रति व्यवहार कैसा रहा है। वकील भरोसे में मिली जानकारी का इस्तेमाल अपने क्लाइंट के ख़िलाफ़ नहीं कर सकता। इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि क्लाइंट बाद में उसका विरोधी बन गया हो।"
बेंच ने बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया की डिसिप्लिनरी कमिटी के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें संबंधित वकील का बार लाइसेंस दो साल के लिए सस्पेंड किया गया।
यह मामला अपीलकर्ता (एक्ट्रेस रेहाना ख़ाना उर्फ़ रोज़लिन ख़ान) द्वारा अपने पूर्व वकील, यानी प्रतिवादी (रिज़वान सिद्दीकी) के ख़िलाफ़ बार काउंसिल ऑफ़ महाराष्ट्र एंड गोवा में एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 35 के तहत दर्ज कराई गई शिकायत से जुड़ा है। अपीलकर्ता ने 2013-2014 में सीनियर पुलिस अधिकारी पर यौन उत्पीड़न के आरोपों के सिलसिले में प्रतिवादी को अपना वकील नियुक्त किया।
शिकायत का मुख्य मुद्दा यह था कि 5 अगस्त 2014 को प्रतिवादी ने टेलीविज़न इंटरव्यू दिए, जिनमें उसने अपीलकर्ता के साथ हुई गोपनीय बातचीत का खुलासा किया, उनके बीच हुई रिकॉर्डेड बातचीत और मैसेज एक्सचेंज को सार्वजनिक किया, और उसकी शिकायत को "रेप का झूठा केस" बताते हुए उस पर पब्लिसिटी पाने की कोशिश करने का आरोप लगाया।
बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया (BCI) की डिसिप्लिनरी कमिटी ने 11 अगस्त 2025 के आदेश से प्रतिवादी को पेशेवर कदाचार (प्रोफेशनल मिसकंडक्ट) का दोषी पाया और उसका लाइसेंस दो साल के लिए सस्पेंड किया। साथ ही उस पर शिकायतकर्ता को ₹3 लाख देने और बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया के वेलफेयर फंड में ₹2 लाख जमा करने का जुर्माना भी लगाया।
अपीलकर्ता और प्रतिवादी दोनों ने BCI के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील दायर की। अपीलकर्ता ने सज़ा बढ़ाने की मांग की, जबकि प्रतिवादी ने सज़ा रद्द करने की मांग की। BCI के बार लाइसेंस सस्पेंशन ऑर्डर को सही ठहराते हुए जस्टिस नाथ के फैसले में रेस्पोंडेंट (प्रतिवादी) द्वारा अपने पुराने क्लाइंट की गोपनीय जानकारी उजागर करने के काम को गलत बताया गया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ क्लाइंट-वकील का रिश्ता खत्म होने की वजह से रेस्पोंडेंट अपने पुराने क्लाइंट के खिलाफ़ लगे आरोपों का जवाब देने के लिए उसकी संवेदनशील और गोपनीय जानकारी उजागर नहीं कर सकता।
रेस्पोंडेंट ने इस आधार पर अनुशासनात्मक कार्यवाही को चुनौती दी थी कि यह आदेश बिना सही नोटिस दिए एकतरफा (Ex Parte) पारित किया गया।
कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा:
"रेस्पोंडेंट पेश हुआ और उसने आरोपों का खंडन करते हुए लिखित बयान दाखिल किया। उसका प्रतिनिधित्व वकील ने किया और उसने सबूत दर्ज करने की प्रक्रिया में भाग लिया। यह स्पष्ट है कि उसे अनुशासनात्मक मामले की शुरुआत से लेकर अगस्त 2025 में विवादित आदेश पारित होने तक पता था कि उसके खिलाफ कार्यवाही चल रही है और उन कार्यवाहियों में क्या आरोप लगाए गए। जो पक्ष शुरू से अंत तक मौजूद रहा हो, वह यह नहीं कह सकता कि वह अनुपस्थित था, खासकर वह व्यक्ति जो खुद एक वकील है। यह आधार कमजोर है। हमारी राय में बाद में सोचा गया बहाना है, क्योंकि कोई बेहतर आधार उपलब्ध नहीं है।"
कोर्ट ने अपीलकर्ता की सजा बढ़ाने की मांग को भी यह देखते हुए खारिज किया कि वह साफ नीयत से कोर्ट के सामने नहीं आई, क्योंकि मामला लंबित रहने के दौरान उसने खुद एक प्रेस ब्रीफिंग में भाग लिया था।
कोर्ट ने कहा,
"रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री, जिसमें वे बातचीत भी शामिल हैं, जिन पर उसने खुद भरोसा किया। यह दिखाती है कि जब एंगेजमेंट (काम का संबंध) चल रहा था, तब वह और रेस्पोंडेंट इस बात पर चर्चा कर रहे थे कि पुलिस अधिकारी को कैसे फंसाया जाए, जो केवल कानूनी सलाह लेने वाले क्लाइंट का आचरण नहीं है। न ही उसके बाद क्या हुआ, इसका उसका विवरण पूरा है। वह 28 जुलाई 2014 को अपनी मर्जी से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने पेश हुई और अपने मामले के बारे में बात की। हालांकि हमारे सामने उसकी शिकायत यह है कि उसका मामला सार्वजनिक कर दिया गया। इसके अलावा, पुलिस अधिकारी को 4 दिसंबर 2015 को बरी किया गया। उस आदेश को उसने कभी चुनौती नहीं दी। इन सभी मामलों के बारे में पूरी सच्चाई न बताने के कारण वह हमसे उसे दी गई राहत को बढ़ाने के लिए नहीं कह सकती।"
कोर्ट ने महत्वपूर्ण जानकारी छिपाने के लिए दोनों पक्षों के आचरण की भी निंदा की। नतीजतन, अपीलें निपटा दी गईं और अपीलकर्ता तथा प्रतिवादी, दोनों पर ₹5-5 लाख का खर्च लगाया गया, जिसे चार हफ़्तों के भीतर सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज़ कमिटी के पास जमा करना था।
Cause Title: REHANA KHAN VS. RIZWAN SIDDHIQUEE (with connected case)