न्यायिक सेवा में 3 वर्ष की वकालत अनिवार्य करने के फैसले पर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखा

Update: 2026-07-30 11:30 GMT

सुप्रीम कोर्ट ने सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर सीधी भर्ती के लिए तीन वर्ष की वकालत को अनिवार्य बनाने वाले अपने फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिकाओं पर सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रखा।

साथ ही अदालत ने दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए तीन वर्ष की अनिवार्य वकालत की शर्त में छूट देने की मांग वाली एक रिट याचिका पर भी सुनवाई की।

मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने की। पीठ ने विभिन्न पक्षों के वकीलों, हस्तक्षेपकर्ताओं और न्यायालय मित्र की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया।

पुनर्विचार याचिकाओं में सुप्रीम कोर्ट के मई 2025 के उस फैसले पर पुनर्विचार की मांग की गई, जिसमें निचली न्यायिक सेवा में सीधी भर्ती के लिए कम से कम तीन वर्ष की वकालत का अनुभव अनिवार्य कर दिया गया। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह शर्त प्रतिभाशाली विधि स्नातकों को पढ़ाई पूरी करने के तुरंत बाद न्यायिक सेवा में आने से हतोत्साहित करेगी।

सुनवाई के दौरान इस शर्त का विरोध करने वाले वकीलों ने कहा कि तीन वर्ष का अनिवार्य इंतजार युवा अभ्यर्थियों के लिए बाधा बनेगा।

एक वकील ने पीठ से कहा,

"यदि तीन वर्ष तक इंतजार करना पड़ेगा तो युवा इस पेशे को नहीं अपनाएंगे। खासकर महिलाएं और दिव्यांग अभ्यर्थी न्यायिक सेवा में आने से पीछे हटेंगे।"

सीनियर एडवोकेट पिंकी आनंद ने दलील दी कि भर्ती से पहले वकालत अनिवार्य करने के बजाय नियुक्ति के बाद न्यायिक प्रशिक्षण को अधिक मजबूत बनाया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि पूरे देश में न्यायिक प्रशिक्षण का एक समान ढांचा होना चाहिए, क्योंकि अलग-अलग राज्यों की न्यायिक अकादमियों के मानक अलग हैं।

सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्विस ने भी तीन वर्ष की अनिवार्य वकालत का विरोध करते हुए कहा कि लॉ ग्रेजुएट को सीधे न्यायिक अकादमियों में व्यापक प्रशिक्षण दिया जा सकता है। उन्होंने बताया कि लगभग सभी राज्यों में न्यायिक अकादमियां मौजूद हैं और कई राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों सहित अन्य विधि संस्थानों ने भी इस शर्त का विरोध किया।

एमिक्स क्यूरी सिद्धार्थ भटनागर ने सुझाव दिया कि शर्त को पूरी तरह समाप्त करने के बजाय कुछ वर्गों को सीमित छूट दी जा सकती है। उन्होंने कहा कि महिलाओं और दिव्यांग अभ्यर्थियों को पात्रता संबंधी अंकों में रियायत दी जा सकती है। साथ ही न्यायिक लॉ क्लर्क के रूप में किए गए कार्य को भी न्यायिक सेवा के लिए आवश्यक अनुभव के रूप में मान्यता देने पर विचार किया जा सकता है।

सुनवाई के दौरान एक आवेदन में यह भी मांग की गई कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में कार्यरत विधि अधिकारियों के अनुभव को भी तीन वर्ष की वकालत के बराबर माना जाए।

इससे पहले कुछ हाईकोर्ट दिव्यांग अभ्यर्थियों के लिए इस शर्त में छूट का समर्थन कर चुके हैं। वहीं कई विधि विश्वविद्यालयों ने भी ऐसी राहत दिए जाने की वकालत की। पिछली सुनवाई में चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने मौखिक रूप से टिप्पणी की थी कि तीन वर्ष की अनिवार्य वकालत की शर्त का सबसे अधिक असर महिला अभ्यर्थियों पर पड़ रहा है।

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