गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय के एक छात्र ने ग्रेटर नोएडा के कार्यपालक मजिस्ट्रेट की ओर से जारी उस नोटिस को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसमें उसे प्रस्तावित कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के धरने में छात्रों को शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने के आरोप में पांच लाख रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही राशि के दो जमानतदार पेश करने को कहा गया।

छात्र अक्षत त्रिपाठी ने अपनी याचिका में आरोप लगाया कि यह कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के एक सितंबर के आदेश को दरकिनार करने की कोशिश है।

याचिका के मुताबिक चार सितंबर 2026 को जारी नोटिस में त्रिपाठी को पांच सितंबर को कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश होने का निर्देश दिया गया।

नोटिस में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 126 और 135 का सहारा लिया गया।

इसके तहत शांति भंग होने या सार्वजनिक शांति प्रभावित होने की आशंका के आधार पर सुरक्षा राशि लेने और संबंधित सूचना की जांच की कार्रवाई की जा सकती है।

नोटिस में छह महीने के लिए पांच लाख रुपये के निजी मुचलके के साथ पांच-पांच लाख रुपये के दो जमानतदार मांगे गए।

त्रिपाठी ने याचिका में कहा कि नोटिस में उनके खिलाफ किसी खास तारीख, समय, बयान, प्रत्यक्ष कृत्य या हिंसा की वास्तविक अथवा आसन्न आशंका का उल्लेख नहीं है।

उनका कहना है कि छात्रों को प्रस्तावित धरने में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करने को अपराध की तरह पेश किया गया, जबकि शांतिपूर्ण विरोध और उसमें भाग लेने के लिए अपील करना संविधान के तहत मिले अभिव्यक्ति और शांतिपूर्ण सभा के अधिकारों के दायरे में आता है।

याचिका में एक सितंबर के सुप्रीम कोर्ट के आदेश का भी हवाला दिया गया। यह आदेश 20 से 25 जुलाई 2026 के बीच NEET-UG 2026 में कथित अनियमितताओं के खिलाफ हुए देशव्यापी छात्र प्रदर्शनों से जुड़ा था।

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और महाराष्ट्र में दर्ज प्राथमिकी रद्द कर दी थीं और दूसरे राज्यों में इसी तरह की FIR बंद करने का निर्देश दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले 2,873 चिन्हित लोगों को छोड़कर नए सिरे से FIR दर्ज नहीं की जाएगी। इन लोगों पर शारीरिक नुकसान पहुंचाने या सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने जैसे गंभीर आरोपों का अपवाद रखा गया।

याचिका के अनुसार त्रिपाठी इन 2,873 लोगों में शामिल नहीं हैं और उनके खिलाफ न तो हिंसा न सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने और न ही किसी आपराधिक पृष्ठभूमि का आरोप है।

याचिका में कहा गया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के महज तीन दिन बाद उसी छात्र आंदोलन से जुड़े धरने को लेकर नोटिस जारी किया जाना गंभीर सवाल खड़े करता है।

याचिकाकर्ता का आरोप है कि यह कार्रवाई उस संरक्षण को अप्रत्यक्ष तरीके से निष्प्रभावी करने की कोशिश है जो सुप्रीम कोर्ट ने छात्र प्रदर्शनकारियों को दिया।

मामला बुधवार को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ के सामने भी उठाया गया।

सीनियर एडवोकेट बिश्वजीत भट्टाचार्य ने बताया कि नोटिस बाद में वापस ले लिया गया लेकिन सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद इसे जारी किया जाना प्रथम दृष्टया अवमानना का मामला हो सकता है।

इस पर चीफ जस्टिस ने सवाल किया कि जब कोर्ट ने छात्रों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई पर रोक जैसी सुरक्षा दी थी, तब कार्यपालक मजिस्ट्रेट ऐसा नोटिस कैसे जारी कर सकते हैं।

पीठ ने नोटिस को याचिका के साथ रिकॉर्ड पर रखने को कहा और संकेत दिया कि संबंधित अधिकारी से स्पष्टीकरण मांगा जा सकता है।

त्रिपाठी की याचिका एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड सुभाष चंद्रन केआर के माध्यम से दायर की गई।

इसमें कहा गया कि पुलिस उपनिरीक्षक की रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई शुरू की गई।

रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि त्रिपाठी छात्रों के बीच सरकार विरोधी भ्रामक बातें फैला रहे थे और उन्हें प्रस्तावित CJP धरने में शामिल होने के लिए उकसा रहे थे। पुलिस के मुताबिक इससे तनाव की स्थिति पैदा हुई और छात्रों के बीच झगड़े तथा शांति भंग होने की आशंका थी।

याचिका में इन आरोपों को अस्पष्ट बताते हुए कहा गया है कि छात्र को आरोपों के समर्थन में कोई सामग्री उपलब्ध नहीं कराई गई।

इसके अलावा, चार सितंबर को नोटिस जारी कर अगले ही दिन पेश होने को कहा गया। याचिका के मुताबिक, इतने कम समय में वकील से सलाह लेने, आरोपों को समझने और पांच-पांच लाख रुपये के दो जमानतदारों की व्यवस्था करने की अपेक्षा करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

त्रिपाठी ने दलील दी है कि कार्यपालक मजिस्ट्रेट की यह कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत मिले मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करती है।

उनका कहना है कि शांति भंग की ठोस और स्पष्ट आशंका के बिना निवारक कार्रवाई का इस्तेमाल शांतिपूर्ण विरोध या उसमें शामिल होने की अपील को दबाने के लिए नहीं किया जा सकता।

याचिका में चार सितंबर के नोटिस और उससे जुड़ी पूरी कार्यवाही रद्द करने की मांग की गई। साथ ही, इसी तरह के मामलों में छात्रों के खिलाफ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 126 और 135 के तहत कार्रवाई को अवैध घोषित करने की मांग की गई है बशर्ते वे सुप्रीम कोर्ट द्वारा चिन्हित 2,873 लोगों के अपवाद में शामिल न हों।

याचिकाकर्ता ने नोटिस के आधार पर आगे की कार्रवाई पर रोक लगाने, जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने और की गई कार्रवाई की रिपोर्ट पेश करने का निर्देश देने की भी मांग की।

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