प्रक्रिया में देरी करके एम्प्लॉयर 'अनुकंपा नियुक्ति' का दावा खारिज नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

19 July 2026 7:18 PM IST

  • प्रक्रिया में देरी करके एम्प्लॉयर अनुकंपा नियुक्ति का दावा खारिज नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोई एम्प्लॉयर किसी कर्मचारी की मेडिकल आधार पर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (voluntary retirement) की अर्ज़ी को तब तक पेंडिंग नहीं रख सकता, जब तक कि कर्मचारी तय उम्र सीमा पार न कर ले, और फिर उस देरी का इस्तेमाल कर्मचारी के आश्रित को दया के आधार पर नियुक्ति देने से इनकार करने के लिए करे। कोर्ट ने कहा कि ऐसी व्याख्या से एम्प्लॉयर को "प्रोसेस में देरी करके पात्रता को कंट्रोल करने" और एक फायदेमंद स्कीम के मकसद को नाकाम करने की छूट मिल जाएगी।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को निर्देश दिया कि वह उस कर्मचारी के बेटे को दया के आधार पर नियुक्ति दे, जिसने 55 साल की उम्र पूरी करने से पहले मेडिकल आधार पर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति मांगी थी। कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें दावे को खारिज करने को सही ठहराया गया था।

    मामले की पृष्ठभूमि

    कर्मचारी रामनारायण मदानकर ने 22 जुलाई 2015 को मेडिकल आधार पर स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए अर्ज़ी दी थी, जिसके लिए उन्होंने सिविल सर्जन का सर्टिफिकेट लिया था, जिसमें उन्हें सेवा के लिए स्थायी रूप से अक्षम घोषित किया गया था। उस समय उनकी उम्र 55 साल से कम थी।

    पब्लिक सेक्टर की जनरल इंश्योरेंस कंपनियों में दया के आधार पर नियुक्ति की स्कीम के तहत 55 साल की उम्र तक पहुंचने से पहले अक्षमता के कारण मेडिकल आधार पर रिटायर होने वाले कर्मचारियों के आश्रित दया के आधार पर नियुक्ति के पात्र होते हैं, बशर्ते अक्षमता को विधिवत गठित मेडिकल बोर्ड द्वारा प्रमाणित किया गया हो।

    हालांकि कर्मचारी ने कंपनी को बार-बार याद दिलाया कि 10 दिसंबर 2015 को 55 साल का होने से पहले उसकी अर्ज़ी पर कार्रवाई की जाए, लेकिन कंपनी ने उसे 3 फरवरी 2016 तक यह नहीं बताया कि मेडिकल बोर्ड सर्टिफिकेट की ज़रूरत है; तब तक वह उम्र सीमा पार कर चुका था। सूचना मिलने के सात दिनों के भीतर उसने मेडिकल बोर्ड सर्टिफिकेट हासिल कर लिया। फिर भी कंपनी ने उसके बेटे के दया के आधार पर नियुक्ति के दावे को इस आधार पर खारिज कर दिया कि कर्मचारी 55 साल की उम्र पूरी करने के बाद रिटायर हुआ।

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस अस्वीकृति को सही ठहराया और कहा कि मेडिकल बोर्ड सर्टिफिकेट कर्मचारी के उम्र सीमा पार करने के बाद ही हासिल किया गया।

    सुप्रीम कोर्ट की राय

    सुप्रीम कोर्ट ने माना कि दया के आधार पर नियुक्ति सामान्य भर्ती प्रक्रिया का एक अपवाद है और इसे लागू स्कीम के तहत सख्ती से नियंत्रित किया जाना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि एम्प्लॉयर भी स्कीम को निष्पक्ष रूप से और उचित समय के भीतर लागू करने के लिए समान रूप से बाध्य है। कोर्ट ने कहा कि अगर किसी कर्मचारी ने पूरी लगन और लगातार अपनी मांग के लिए कोशिश की है, तो उसे 'दया के आधार पर नौकरी' (Compassionate Appointment) देने से मना करने के मामले में एम्प्लॉयर (Employer) अपनी ही गलती का फ़ायदा नहीं उठा सकता।

    कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर बेंच का फ़ैसला पलट दिया। कोर्ट ने कहा कि अपील करने वाले के माता-पिता ने मेडिकल आधार पर स्वैच्छिक रिटायरमेंट (Voluntary Retirement) के लिए तुरंत आवेदन किया, इसलिए एम्प्लॉयर की अपनी देरी की वजह से अपील करने वाले को दया के आधार पर नौकरी देने से मना नहीं किया जा सकता।

    बेंच ने कहा,

    "जब अपील करने वाले नंबर 2 ने 55 साल की उम्र पूरी होने से पहले मेडिकल आधार पर स्वैच्छिक रिटायरमेंट के लिए आवेदन किया और आवेदन के साथ सरकारी मेडिकल सर्टिफ़िकेट भी लगाया, तो रेस्पॉन्डेंट-कंपनी को उचित तेज़ी से आवेदन की जांच करनी चाहिए। अगर सिविल सर्जन का सर्टिफ़िकेट काफ़ी नहीं माना गया तो रेस्पॉन्डेंट-कंपनी को उम्र की सीमा खत्म होने से पहले ही अपील करने वाले नंबर 2 को इसकी जानकारी देनी चाहिए। वे तब तक चुप नहीं रह सकते थे जब तक अपील करने वाले नंबर 2 की उम्र 55 साल से ज़्यादा न हो जाए और उसके बाद अपनी ही देरी की वजह से हुए नतीजों का सहारा लें।"

    अपील मंज़ूरी देते हुए जस्टिस कोटिश्वर सिंह द्वारा लिखे गए फ़ैसले में स्कीम का ज़िक्र करते हुए कहा गया कि अगर स्कीम के तहत किसी कर्मचारी को 55 साल की उम्र से पहले मेडिकल आधार पर रिटायर होना ज़रूरी था और अक्षमता को सही तरीके से नियुक्त मेडिकल बोर्ड द्वारा प्रमाणित किया जाना था, तो भी कोर्ट ने माना कि एम्प्लॉयर प्रक्रिया से जुड़ी ज़रूरतों के बारे में बताने में अपनी ही देरी का सहारा लेकर किसी ऐसे दावे को खारिज नहीं कर सकता जो अन्यथा सही था।

    इस सिद्धांत का ज़िक्र करते हुए कि किसी व्यक्ति को अपनी ही गलती का फ़ायदा नहीं मिलना चाहिए, बेंच ने 'कुशेश्वर प्रसाद सिंह बनाम बिहार राज्य' मामले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया:

    "कानून का यह स्थापित सिद्धांत है कि किसी व्यक्ति को कानून की अनुकूल व्याख्या पाने के लिए अपनी ही गलती का अनुचित और गलत फ़ायदा उठाने की इजाज़त नहीं दी जा सकती। यह एक सही सिद्धांत है कि जो व्यक्ति किसी काम को होने से रोकता है, वह उस काम के न होने का फ़ायदा नहीं उठा सकता जो उसी की वजह से हुआ है। दूसरे शब्दों में कहें तो, 'गलती करने वाले को अपनी ही गलती से फ़ायदा उठाने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए।'"

    कानून लागू करते हुए कोर्ट ने कहा:

    “जब अस्वीकृति का आधार ही गलत साबित हो जाता है तो सहानुभूति के आधार पर नियुक्ति (Compassionate Appointment) से इनकार को सही नहीं ठहराया जा सकता। यह दावा 2016 से लंबित है और अपील करने वाले लगातार और पूरी लगन से इस मामले को आगे बढ़ा रहे हैं। अगर इतनी लंबी देरी के बाद मामले को फिर उसी चरण पर छोड़ दिया जाए, जहां रेस्पोंडेंट-कंपनी को सालों पहले कार्रवाई करनी चाहिए थी तो सहानुभूति के आधार पर नियुक्ति का मकसद ही खत्म हो जाएगा। इस मामले के खास हालात को देखते हुए सही राहत यही है कि अपील को मंज़ूर किया जाए और सहानुभूति के आधार पर नियुक्ति देने का निर्देश दिया जाए।”

    बेंच ने बताया कि उम्र की शर्त का मकसद उन मामलों की पहचान करना था, जहां कोई कर्मचारी तय उम्र से पहले ही मेडिकल कारणों से काम करने में असमर्थ हो गया हो; इसका मकसद यह नहीं था कि एम्प्लॉयर उम्र सीमा खत्म होने तक जांच को टालता रहे और फिर दावे को खारिज कर दे।

    कोर्ट ने आगे कहा कि मेडिकल बोर्ड से सर्टिफिकेशन की ज़रूरत का मकसद मेडिकल अक्षमता के असली दावों की पुष्टि करना था। अगर एम्प्लॉयर को शुरुआती मेडिकल सर्टिफिकेट अपर्याप्त लगता तो उसकी ज़िम्मेदारी थी कि वह या तो कर्मचारी को अपने चुने हुए मेडिकल पैनल के पास भेजे या तुरंत उसे सही मेडिकल बोर्ड से सर्टिफिकेशन लेने के लिए कहे।

    बेंच ने कहा कि एम्प्लॉयर को चुप रहने और बाद में तकनीकी आधार पर दावा खारिज करने की इजाज़त देने से इस स्कीम का फ़ायदा "प्रशासनिक देरी की दया पर" निर्भर हो जाएगा और एक लाभकारी कल्याणकारी स्कीम में निहित निष्पक्षता खत्म हो जाएगी।

    ऊपर बताई गई बातों के आधार पर अपील मंज़ूर की गई।

    Cause Title: RAHUL S/o. RAMNARAYAN MADANKAR & ANR. VERSUS THE NEW INDIA ASSURANCE COMPANY LIMITED & ORS.

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