अटेंडेंस कम होने की वजह से लॉ स्टूडेंट्स को चल रहे एकेडमिक सेशन की परीक्षाओं से नहीं रोका जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार के लिए राहत दी

Shahadat

23 July 2026 10:50 AM IST

  • अटेंडेंस कम होने की वजह से लॉ स्टूडेंट्स को चल रहे एकेडमिक सेशन की परीक्षाओं से नहीं रोका जा सकता: सुप्रीम कोर्ट ने एक बार के लिए राहत दी

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जिन लॉ स्टूडेंट्स का एकेडमिक सेशन उस समय चल रहा था, जब दिल्ली हाईकोर्ट ने 3 नवंबर, 2025 को अटेंडेंस के नियमों में ढील देने वाला फैसला सुनाया था (जिस पर बाद में रोक लगा दी गई थी), उन्हें अटेंडेंस कम होने के आधार पर उस एकेडमिक सेशन की फाइनल परीक्षाओं में बैठने से नहीं रोका जा सकता।

    कोर्ट ने निर्देश दिया,

    "हम यह निर्देश देते हैं और व्यवस्था करते हैं कि जिन स्टूडेंट्स का एकेडमिक सेशन उस समय चल रहा था, जब दिल्ली हाईकोर्ट ने 3 नवंबर, 2025 को फैसला सुनाया था, उन्हें उस एकेडमिक सेशन की फाइनल परीक्षाओं में बैठने से रोका या वंचित नहीं किया जाएगा।"

    कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह एक बार के लिए किया गया उपाय है। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि दिल्ली हाईकोर्ट के इस निर्देश से भ्रम पैदा हो गया कि किसी भी लॉ स्टूडेंट को सिर्फ़ कम अटेंडेंस के आधार पर परीक्षा देने से नहीं रोका जा सकता, और बाद में बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने भी इसे लागू करने के लिए सर्कुलर जारी कर दिया था।

    जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने माना कि स्टूडेंट्स ने इस नेक नीयत (bona fide belief) के साथ काम किया कि कम अटेंडेंस उन्हें परीक्षा देने से नहीं रोकेगी, क्योंकि बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने असल में दिल्ली हाई कोर्ट के निर्देशों को मान लिया था।

    कोर्ट ने कहा,

    "हमारी सोच यह है कि चूंकि नवंबर 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले ने लॉ कॉलेजों में अटेंडेंस के नियमों में ढील दी थी और बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने उस फैसले के निर्देशों को असल में मान लिया था, इसलिए जिन स्टूडेंट्स ने इस नेक नीयत से काम किया कि सिर्फ़ कम अटेंडेंस उनके चल रहे एकेडमिक सेशन की परीक्षाओं में बैठने में बाधा नहीं बनेगी, वे केवल एक बार के उपाय के तौर पर संदेह का लाभ (benefit of doubt) पाने के हकदार हैं।"

    कोर्ट ने निर्देश दिया कि जिन स्टूडेंट्स का एकेडमिक सेशन 3 नवंबर, 2025 को चल रहा था, उन्हें उस एकेडमिक सेशन की फाइनल परीक्षाओं में बैठने से रोका या वंचित नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर ऐसे स्टूडेंट्स की फाइनल परीक्षाएं पूरी तरह या आंशिक रूप से छूट गई थीं, तो उन्हें उस सेशन की सप्लीमेंट्री परीक्षाओं में बैठने की अनुमति दी जानी चाहिए।

    कोर्ट ने कहा,

    "26 मई, 2026 के आदेश के भविष्य में लागू होने के कारण, जिन लॉ स्टूडेंट्स को अटेंडेंस की कमी की वजह से अपना एकेडमिक सेशन गंवाने का खतरा है, उन पर इस कोर्ट के आदेश का बुरा असर नहीं पड़ेगा और उन्हें उस एकेडमिक सेशन की फाइनल परीक्षा में बैठने की इजाज़ पूरी होगी। अगर स्टूडेंट्स पूरी तरह या आंशिक रूप से फाइनल परीक्षा में शामिल नहीं हो पाए हैं तो उन्हें सिर्फ़ इसी सेशन के लिए सप्लीमेंट्री परीक्षा देने की इजाज़त दी जाएगी।"

    दिल्ली हाईकोर्ट ने एक लॉ स्टूडेंट की आत्महत्या से जुड़े 'सुओ मोटो' (खुद से संज्ञान लेने वाले) मामले में अटेंडेंस के नियमों के बारे में निर्देश जारी किए और बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया को अटेंडेंस के नियमों पर फिर से विचार करने का आदेश दिया।

    इस फैसले के बाद बार काउंसिल ऑफ़ इंडिया ने लॉ कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज़ को निर्देश जारी किए कि जब तक अटेंडेंस के नियमों पर फिर से विचार किया जा रहा है, तब तक सिर्फ़ अटेंडेंस की कमी के कारण स्टूडेंट्स को परीक्षा में बैठने या अगले सेमेस्टर में जाने से नहीं रोका जाना चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने देखा कि इसके परिणामस्वरूप कई लॉ स्टूडेंट्स ने रेगुलर क्लास में जाना बंद कर दिया। हाईकोर्ट के फैसले में दिए गए निर्देश पर भविष्य के लिए रोक लगाने वाले 26 मई, 2026 के अंतरिम आदेश के बाद कई कॉलेजों ने अटेंडेंस की कमी वाले स्टूडेंट्स को फाइनल या सप्लीमेंट्री परीक्षा में बैठने से रोकने का प्रस्ताव रखा।

    इसके चलते सुप्रीम कोर्ट में कई आवेदन और अलग-अलग हाईकोर्ट में याचिकाएं दायर की गईं। स्टूडेंट्स ने तर्क दिया कि दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के आधार पर उन्हें यह जायज़ उम्मीद थी कि अटेंडेंस की कमी के कारण उन्हें परीक्षा देने से नहीं रोका जाएगा।

    सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी ने राहत देने का विरोध किया और तर्क दिया कि छह हाई कोर्ट ने अटेंडेंस के नियमों पर दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले के उलट राय रखी थी। उन्होंने कहा कि स्टूडेंट्स दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले का फायदा नहीं उठा सकते और उन्हें अटेंडेंस की कमी के कानूनी नतीजों का सामना करना होगा।

    मौजूदा एकेडमिक सेशन के सीमित मकसद के लिए इस तर्क को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 26 मई के स्टे ऑर्डर (रोक लगाने वाले आदेश) के भविष्य में लागू होने का मतलब यह है कि स्टूडेंट्स को एकेडमिक साल का नुकसान नहीं होना चाहिए, क्योंकि उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट के फैसले और BCI की प्रतिक्रिया से बनी कानूनी स्थिति पर भरोसा किया था।

    कोर्ट ने मामले को 25 अगस्त, 2026 को अंतिम निपटारे के लिए सूचीबद्ध किया।

    Case Title – Prakruthi Jain v. Bar Council of India & Ors. and connected matters

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