'समन जारी करने के चरण में केवल प्रथम दृष्टया मामला होना ज़रूरी': राजस्थान हाईकोर्ट ने दहेज मृत्यु FIR में ससुराल वालों के खिलाफ संज्ञान लेने का आदेश सही ठहराया

Update: 2026-04-08 05:04 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ट्रायल कोर्ट के उस आदेश के खिलाफ दायर याचिका खारिज की, जिसमें एक महिला के ससुराल वालों के खिलाफ IPC की धारा 498A के तहत संज्ञान लिया गया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि समन जारी करने के चरण में केवल प्रथम दृष्टया संतुष्टि होनी चाहिए और दहेज की मांग तथा ससुराल वालों द्वारा प्रताड़ित किए जाने के आरोप उनके खिलाफ आगे की कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त थे।

स्वीकृत तथ्यों के अनुसार, मृतका ने याचिकाकर्ताओं के बेटे से 08.02.2015 को शादी की थी और 24.03.2015 को उसने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली, जिससे उसकी मृत्यु अप्राकृतिक परिस्थितियों में हुई। इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं था कि यह घटना ससुराल में नहीं, बल्कि मृतका के मायके में हुई। आरोप लगाया गया कि शादी के तुरंत बाद, याचिकाकर्ताओं और सह-आरोपियों ने पर्याप्त दहेज न लाने के लिए मृतका को प्रताड़ित करना और उसके साथ दुर्व्यवहार करना शुरू कर दिया।

जस्टिस अनूप कुमार ढांड की पीठ ने फैसला सुनाया कि आरोपियों को समन जारी करने के चरण में, कोर्ट को केवल प्रथम दृष्टया संतुष्टि होनी चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं का यह आरोप कि मृतका 'बाइपोलर डिसऑर्डर' से पीड़ित थी—हालांकि ट्रायल कोर्ट के सामने ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया—और क्या यही आत्महत्या का कारण था, इस बात का फैसला हाई कोर्ट इस चरण में नहीं कर सकता।

कोर्ट ने कहा कि इस तथ्य पर ट्रायल कोर्ट द्वारा मुकदमे के उचित चरण में विचार किया जाएगा।

कोर्ट ने इस स्पष्ट करते हुए कहा,

"हालांकि, PW1 से PW3 के बयानों से याचिकाकर्ताओं के खिलाफ ये आरोप सामने आते हैं कि उन्होंने दहेज की मांग की और कम दहेज लाने के लिए मृतक को प्रताड़ित किया; जो IPC की धारा 498A और 304B के तहत अपराध करने के लिए उनके खिलाफ आगे बढ़ने के लिए पर्याप्त है... आपराधिक मुकदमे का पूरा उद्देश्य मामले की सच्चाई तक पहुंचना होता है। एक बार जब अदालत को यह संतोष हो जाता है कि उसके सामने ऐसे सबूत हैं जिनसे पता चलता है कि किसी आरोपी ने कोई अपराध किया है तो अदालत ऐसे व्यक्ति के खिलाफ आगे बढ़ सकती है। किसी आरोपी को समन जारी करने के चरण में अदालत को प्रथम दृष्टया (Prima Facie) संतोष होना आवश्यक है। अदालत के सामने जो सबूत थे, वे एक प्रत्यक्षदर्शी के थे, जिसने अदालत के सामने स्पष्ट रूप से कहा है कि एक अपराध किया गया, जिसमें अन्य लोगों के साथ-साथ याचिकाकर्ता भी शामिल हैं। अदालत को इस गवाह से जिरह करने की आवश्यकता नहीं है। यदि धारा 319 के तहत ऐसा आवेदन दायर किया गया हो तो अदालत उसी चरण में मुकदमा रोक सकती है। गवाह और अन्य गवाहों की विस्तृत जांच-पड़ताल मुकदमे का विषय है, जो नए सिरे से शुरू होना है।"

याचिकाकर्ताओं का बेटा क्रूरता के एक मामले में आरोपी है, जिसे उसकी मृतक पत्नी के परिवार ने दायर किया। पत्नी ने अपनी शादी के 1.5 महीने के भीतर ही फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी। इसके बाद CrPC की धारा 319 के तहत एक आवेदन दायर किया गया, जिसमें याचिकाकर्ताओं को भी समन जारी करने की मांग की गई। इस आवेदन को स्वीकार कर लिया गया और अदालत के समक्ष याचिका दायर की गई।

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क दिया गया कि मृतक 'बाइपोलर डिसऑर्डर' (Bipolar Disorder) से पीड़ित थी और मानसिक रूप से बीमार थी तथा कई डॉक्टरों से उसका इलाज चल रहा था। ऐसे मामले में यदि उसने आत्महत्या की थी तो याचिकाकर्ताओं को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके अलावा, यह भी प्रस्तुत किया गया कि धारा 319 के चरण में केवल प्रथम दृष्टया मामले से कहीं अधिक जांच-पड़ताल की आवश्यकता होती है।

इसके विपरीत यह तर्क दिया गया कि मृतक की मृत्यु अप्राकृतिक परिस्थितियों में हुई, और वह अपने पीछे एक 'सुसाइड नोट' छोड़ गई, जिसमें याचिकाकर्ताओं पर उसकी ज़िंदगी बर्बाद करने के स्पष्ट और विशिष्ट आरोप लगाए गए।

तर्कों को सुनने के बाद अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत पेश नहीं किया गया, जिससे यह पता चले कि मृतक 'बाइपोलर डिसऑर्डर' से पीड़ित थी। बल्कि, कुछ ऐसे दस्तावेज़ पेश किए गए, जिनसे पता चलता था कि वह कई डॉक्टरों से इलाज करवा रही थी। हालांकि, अदालत ने कहा कि क्या यह बीमारी ही आत्महत्या का एकमात्र कारण थी, इस बात का निर्णय इस चरण में नहीं किया जा सकता।

अदालत ने जांच के दौरान जांच अधिकारी द्वारा ज़ब्त किए गए एक "सुसाइड नोट" का भी संज्ञान लिया। हालांकि, अदालत ने कहा कि यह पता लगाने के लिए कि क्या मृतक ने ही वह नोट लिखा, उसे FSL भेजा गया, और यह भी जोड़ा कि "सबूत के इस अंश पर भी ट्रायल कोर्ट द्वारा मुकदमे के उचित चरण पर विचार किया जाएगा।"

साथ ही, यह राय दी गई कि शिकायतकर्ताओं के याचिकाकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोप—कि उन्होंने दहेज की मांग की और मृतक को प्रताड़ित किया—उनके खिलाफ आगे की कार्रवाई करने के लिए पर्याप्त थे।

इस पृष्ठभूमि में न्यायालय ने यह माना कि निचली अदालत द्वारा आदेश पारित करने में कोई त्रुटि नहीं की गई।

न्यायालय ने कहा,

"इस न्यायालय की सुविचारित राय में इस चरण पर, जिन अभियुक्तों के खिलाफ आरोप-पत्र (Charge-Sheet) दाखिल नहीं किया गया, उनके खिलाफ केवल प्रथम दृष्टया मामले (Prima Facie Case) से कुछ अधिक देखने की आवश्यकता होती है। संज्ञान लेने के इस प्रारंभिक चरण पर अभियुक्तों के मामले के गुण-दोष और उनके बचाव (Defence) की पड़ताल नहीं की जा सकती। अभियुक्तों द्वारा अपने झूठे फंसाए जाने के संबंध में जो बचाव प्रस्तुत किया गया, उसे ट्रायल कोर्ट द्वारा विचारण के उचित चरण पर ध्यान में रखा जाएगा। उन्हें विचारण का सामना करने के लिए समन जारी करने हेतु अभिलेख पर प्रथम दृष्टया साक्ष्य पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। मामले के समग्र तथ्यों और परिस्थितियों तथा अभिलेख पर उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करते हुए इस न्यायालय की सुविचारित राय है कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ IPC की धारा 498A और 304B के तहत आगे की कार्रवाई करने के लिए प्रथम दृष्टया मामले से कहीं अधिक आधार मौजूद हैं।"

तदनुसार, याचिका खारिज कर दी गई। तथापि, याचिकाकर्ताओं के खिलाफ जारी गिरफ्तारी वारंटों को जमानती वारंटों में परिवर्तित कर दिया गया।

Case Title: Mangtu Ram & Anr. v State of Rajasthan & Anr.

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