कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों की जगह दूसरे कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को नहीं रखा जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट ने वोकेशनल ट्रेनर्स को राहत दी

Update: 2026-06-11 09:23 GMT

राजस्थान हाईकोर्ट ने उन याचिकाकर्ताओं को राहत दी, जो कई सालों से वोकेशनल ट्रेनर के तौर पर काम कर रहे थे और जिन्हें थर्ड-पार्टी एजेंसियों यानी वोकेशनल ट्रेनिंग प्रोवाइडर्स (VTPs) के ज़रिए नियुक्त किया गया। राज्य सरकार द्वारा VTPs के साथ कॉन्ट्रैक्ट खत्म करने के बाद याचिकाकर्ताओं की सेवाएं भी खत्म की गईं।

जस्टिस अशोक कुमार जैन की बेंच ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं को सीधे कॉन्ट्रैक्ट के ज़रिए नियुक्त करें और उन्हें बैंक ट्रांसफर के ज़रिए सीधे मानदेय का भुगतान करें।

कोर्ट ने माना कि कई मामलों में यह तय हो चुका है कि कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों के एक समूह की जगह दूसरे कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के समूह को नहीं रखा जा सकता, जब तक कि उनकी जगह नियमित रूप से चुने गए उम्मीदवार को न रखा जाए।

बता दें, कोर्ट उन याचिकाकर्ताओं की याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जिन्होंने राज्य सरकार द्वारा VTPs के साथ जुड़ाव का समझौता रद्द करने के बाद अपने अधिकारों और आजीविका की सुरक्षा के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि राज्य सरकार का यह दायित्व है कि वह वोकेशनल ट्रेनर्स को सीधे नियुक्त करे, न कि VTPs के ज़रिए। यह भी कहा गया कि VTPs ने वोकेशनल ट्रेनर्स के साथ व्यवहार करते समय अनुचित श्रम प्रथाओं को अपनाया, जिससे उनका शोषण हुआ और भुगतान न मिलने जैसी समस्याएं पैदा हुईं।

इसके विपरीत, राज्य सरकार की ओर से पेश हुए एडिशनल एडवोकेट जनरल (AAG) ने तर्क दिया कि चूंकि याचिकाकर्ताओं और राज्य सरकार के बीच कोई सीधा कॉन्ट्रैक्ट नहीं था, इसलिए याचिकाकर्ताओं के पास याचिका दायर करने का कोई अधिकार नहीं था।

इसके अलावा AAG ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति के अनुसार वोकेशनल ट्रेनर्स को सीधे या VTPs के ज़रिए नियुक्त करना राज्य सरकार का अधिकार है। इसलिए राज्य सरकार को वोकेशनल ट्रेनर्स को सीधे आधार पर नियुक्त करने का कोई निर्देश नहीं दिया जा सकता।

तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के 'मनीष गुप्ता और अन्य बनाम प्रेसिडेंट जन भागीदारी समिति' मामले का हवाला दिया, जिसमें यह कहा गया कि कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों के एक समूह की जगह दूसरे समूह को नहीं रखा जा सकता।.

इसके अलावा, कोर्ट ने माना कि चूँकि याचिकाकर्ता सरकारी योजना के तहत काम कर रहे थे और उन्हें उसी योजना को लागू करने के लिए नियुक्त किया गया, इसलिए जब VTPs के साथ कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने पर उनकी सेवाएँ खत्म कर दी गईं, तो उन्हें राज्य सरकार के इस फैसले को चुनौती देने का अधिकार मिल गया। कोर्ट ने आगे कहा कि कॉन्ट्रैक्ट पर काम करने वाले कर्मचारी की नौकरी तभी बनी रह सकती है जब उन्हें सीधे तौर पर काम पर रखा गया हो।

आगे कहा गया,

“अगर किसी कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी को सर्विस प्रोवाइडर के ज़रिए काम पर रखा जाता है तो हर साल दूसरा सर्विस प्रोवाइडर बदलने से कर्मचारियों के शोषण और उनकी सेवाएं बंद होने का खतरा बढ़ जाता है। कोई नया कॉन्ट्रैक्टर (VTP) याचिकाकर्ताओं की सेवाएं बंद कर सकता है। ऐसे हालात में कोई भी कानून हर साल के बाद कर्मचारी की सेवाएं बंद करने की इजाज़त नहीं देता। ऐसा करना अधिकारियों द्वारा अपनी ताकत का गलत इस्तेमाल है।”

इस मामले में कोर्ट ने हरियाणा राज्य का उदाहरण दिया, जहां VTP के ज़रिए काम पर रखे गए लोगों को काम पर बनाए रखा गया और सीधे तौर पर नियुक्त किया गया, और अब उन्हें राज्य सरकार सीधे भुगतान कर रही है।

कोर्ट ने कहा कि राजस्थान भी इसी मॉडल को अपनाने पर विचार कर सकता है, जो न सिर्फ़ याचिकाकर्ताओं के लिए बल्कि NEP (नई शिक्षा नीति) को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए भी फ़ायदेमंद होगा।

कोर्ट ने कहा,

“अगर सर्विस प्रोवाइडर (VTP) और संबंधित अधिकारियों के बीच कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो गया तो अधिकारियों के पास यही विकल्प बचता है कि वे याचिकाकर्ताओं को सीधे कॉन्ट्रैक्ट के ज़रिए काम पर रखें। अधिकारी या तो खुद या राज्य में स्किल डेवलपमेंट के लिए बनी सरकारी कॉर्पोरेशन के ज़रिए उन्हें काम पर रखने की प्रक्रिया बना सकते हैं।”

इस पृष्ठभूमि में कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की सेवा समाप्ति को रद्द करने और उन्हें सीधे कॉन्ट्रैक्ट के तहत काम पर रखने का निर्देश दिया, बशर्ते उनकी योग्यताएं तय मानकों के अनुसार हों।

इसी के साथ याचिकाएं निपटा दी गईं।

Tags:    

Similar News