निजी संस्थान में सेवा समाप्ति के विरुद्ध रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं, सार्वजनिक तत्व का अभाव: राजस्थान हाइकोर्ट
राजस्थान हाइकोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय में कहा कि किसी निजी संस्थान द्वारा की गई सेवा समाप्ति के विरुद्ध रिट याचिका तब तक सुनवाई योग्य नहीं है, जब तक मामले में सार्वजनिक विधि का तत्व स्पष्ट रूप से विद्यमान न हो।
अदालत ने इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ मैनेजमेंट रिसर्च के एक कर्मचारी द्वारा दायर याचिका खारिज की।
जस्टिस प्रवीर भटनागर की एकल पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता और संस्थान के बीच संबंध निजी सेवा अनुबंध पर आधारित है। चूंकि विवाद सेवा संबंधी है और किसी वैधानिक प्रावधान द्वारा शासित नहीं है। इसलिए यह निजी प्रकृति का मामला है, जिसमें सार्वजनिक विधि का कोई तत्व नहीं पाया जाता।
मामले में याचिकाकर्ता ने अपनी सेवा समाप्ति को चुनौती देते हुए पुनर्नियुक्ति और समस्त लाभों की मांग की थी। सुनवाई के दौरान प्रतिवादी संस्थान की ओर से प्रारंभिक आपत्ति उठाई गई कि रिट याचिका ही सुनवाई योग्य नहीं है।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि संबंधित संस्थान सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रबंधन के क्षेत्र में कार्य कर रहा है और सार्वजनिक कार्य कर रहा है। इसलिए इसे संविधान के अनुच्छेद 12 के अंतर्गत राज्य की परिभाषा में माना जाना चाहिए। इस पर हाइकोर्ट की रिट अधिकारिता लागू होती है।
इसके विपरीत प्रतिवादी ने कहा कि संस्थान सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत एक सोसायटी है, न कि कोई वैधानिक निकाय। केवल सार्वजनिक कार्य करने से कोई संस्था स्वतः राज्य नहीं बन जाती।
अदालत ने सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के निर्णय आर्मी वेलफेयर एजुकेशन सोसायटी बनाम सुनील कुमार शर्मा का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया कि शिक्षा प्रदान करना सार्वजनिक कर्तव्य हो सकता है। किंतु कर्मचारी और निजी नियोक्ता के बीच संबंध निजी अनुबंध से उत्पन्न होता है। यदि निजी अनुबंध का उल्लंघन होता है तो वह स्वतः सार्वजनिक विधि का प्रश्न नहीं बनता।
इसी सिद्धांत को लागू करते हुए हाइकोर्ट ने कहा कि वर्तमान विवाद सेवा समाप्ति से संबंधित है, जो मूलतः संविदात्मक और निजी प्रकृति का है। इसमें किसी सार्वजनिक कर्तव्य के उल्लंघन का प्रश्न नहीं उठता।
अतः अदालत ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 226 के अंतर्गत रिट अधिकारिता का प्रयोग ऐसे मामलों में नहीं किया जा सकता, जहां विवाद पूरी तरह निजी सेवा संबंध से उत्पन्न हुआ हो। इसी आधार पर याचिका खारिज की गई।