गर्भपात की दवा कूरियर से भेजना अपने आप में अपराध नहीं, जबरन देकर गर्भपात कराने का इरादा हो तभी बनेगा मामला: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि केवल किसी महिला को कूरियर के माध्यम से गर्भपात की दवा भेज देना भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 312 और 313 के तहत अपराध नहीं माना जा सकता, जब तक यह साबित न हो कि दवा महिला को जबरन दी गई हो और उसका उद्देश्य गर्भपात कराना हो। इसी आधार पर अदालत ने महिला के खिलाफ दर्ज FIR रद्द किया।
जस्टिस अनूप कुमार ढांड की पीठ ने कहा कि मामले में याचिकाकर्ता महिला के खिलाफ ऐसा कोई आरोप नहीं है कि उसने पीड़िता का गर्भपात कराया हो।
अदालत ने स्पष्ट कहा,
"केवल गर्भपात की दवा भेजना तब तक अपराध नहीं है, जब तक यह न दिखे कि दवा जबरन दी गई और गर्भपात कराने का इरादा था।"
मामले में एक भाई और बहन ने FIR रद्द करने की याचिका दायर की। भाई पर दुष्कर्म का आरोप लगाया गया जबकि बहन पर धारा 312 के तहत आरोप लगाए गए। रिकॉर्ड के अनुसार, शिकायतकर्ता महिला और आरोपी भाई लिव-इन संबंध में थे। शिकायत में आरोप था कि विवाह का झांसा देकर आरोपी ने 2018 से 2019 के बीच कई बार सहमति से शारीरिक संबंध बनाए।
इसी संबंध में पहले भी FIR दर्ज हुई लेकिन बाद में शिकायतकर्ता ने वह मामला वापस ले लिया था। इसके बाद उन्हीं आरोपों के आधार पर दूसरी FIR दर्ज कराई गई। अदालत ने पाया कि दोनों FIR की सामग्री लगभग शब्दशः एक जैसी है और उनमें अल्पविराम तक का अंतर नहीं है।
हाईकोर्ट ने कहा कि एक ही घटना और समान आरोपों पर दूसरी FIR दर्ज करना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है। यह संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि जब एक ही घटना से जुड़ी शिकायत वापस ले ली गई हो तो उसी आधार पर दोबारा FIR दर्ज कराना विधिसम्मत नहीं है।
बहन के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर अदालत ने विशेष रूप से ध्यान दिया कि मूल शिकायत में उसके खिलाफ गर्भपात की दवा भेजने का कोई उल्लेख नहीं था। यह आरोप बाद में उसके पति द्वारा लगाया गया, जबकि महिला ने अपने पति के खिलाफ क्रूरता का मामला दर्ज कर रखा था। अदालत ने इसे प्रतिशोध की भावना से लगाया गया आरोप माना।
अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई प्राथमिक साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो कि आरोपी महिला ने शिकायतकर्ता को जबरन दवा दी या गर्भपात कराने का प्रयास किया। ऐसे में धारा 312 और 313 के आवश्यक तत्व इस मामले में मौजूद नहीं हैं।
इन परिस्थितियों को देखते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने FIR कानून का घोर दुरुपयोग बताते हुए रद्द किया।