'राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला': राजस्थान हाईकोर्ट ने भारत-पाक सीमा पर मस्जिदों और दरगाहों को जारी बेदखली नोटिस के खिलाफ याचिकाएं खारिज कीं
राजस्थान हाईकोर्ट ने भारत-पाकिस्तान सीमा के 50 किलोमीटर के दायरे में स्थित मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों को जारी 'कारण बताओ' (show-cause) और बेदखली नोटिस को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं को खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है और इसमें धार्मिक भेदभाव का कोई पहलू नहीं है। [2026 LiveLaw (Raj) 279]
कोर्ट कई मदरसों, मस्जिदों और दरगाहों की उन याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था, जिनमें राज्य अधिकारियों द्वारा जारी बेदखली/खाली करने और 'कारण बताओ' नोटिस की वैधता को चुनौती दी गई। ये नोटिस याचिकाकर्ताओं की उन संपत्तियों और निर्माणों के संबंध में जारी किए गए, जो भारत-पाकिस्तान सीमा से लगभग 50 किलोमीटर के दायरे में स्थित हैं।
जस्टिस समीर जैन ने गृह मंत्रालय की 11.10.2021 की अधिसूचना का हवाला दिया, जो 'सीमा सुरक्षा बल अधिनियम' (Border Security Force Act) की धारा 139 के तहत जारी की गई। इस अधिसूचना के अनुसार, केंद्र सरकार ने सीमावर्ती क्षेत्रों में सीमा सुरक्षा बल (BSF) के अधिकार क्षेत्र और परिचालन शक्तियों का विस्तार और युक्तिकरण (rationalization) किया, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सीमा से 50 किलोमीटर तक के क्षेत्र शामिल हैं।
यह देखते हुए कि यह कदम बड़े जनहित में उठाया गया, कोर्ट ने कहा:
"यह नोटिफ़िकेशन सबसे ऊंचे स्तर पर लिए गए एक सोच-समझकर किए गए पॉलिसी फ़ैसले को दिखाता है। इसमें मौजूदा सुरक्षा हालात, इंटेलिजेंस इनपुट और तस्करी, घुसपैठ और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए नुकसानदेह दूसरी गतिविधियों जैसे सीमा-पार अपराधों को प्रभावी ढंग से रोकने की ज़रूरत को ध्यान में रखा गया। इसलिए नोटिफ़ाई किए गए ज़ोन में सक्षम अधिकारियों द्वारा की गई कोई भी प्रशासनिक या रेगुलेटरी कार्रवाई, खासकर अनधिकृत निर्माण या गतिविधियों के संबंध में, बढ़े हुए कानूनी ढांचे और सुरक्षा संबंधी अहम बातों के नज़रिए से देखी जानी चाहिए।
यह कोर्ट गृह मंत्रालय द्वारा 11 अक्टूबर 2021 को जारी नोटिफ़िकेशन की सराहना करता है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा और जन-सुरक्षा के हित में कानूनी शक्तियों के सोच-समझकर और नेक नीयत से किए गए इस्तेमाल को दिखाता है। संवेदनशील सीमावर्ती इलाकों में बॉर्डर सिक्योरिटी फ़ोर्स (BSF) के अधिकार क्षेत्र को बढ़ाने और तर्कसंगत बनाने का फ़ैसला, उभरती सुरक्षा चुनौतियों - जिनमें घुसपैठ, सीमा-पार अपराध और देश की संप्रभुता और अखंडता के लिए अन्य खतरे शामिल हैं - से निपटने के लिए एक सक्रिय और अच्छी तरह से सोचे-समझे नज़रिए को दिखाता है। नेक नीयत से उठाए गए और कानूनी अधिकार से समर्थित ऐसे कदम, देश की क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा करने के लिए राज्य की प्रतिबद्धता को दिखाते हैं। साथ ही यह भी सुनिश्चित करते हैं कि शासन बदलती ज़मीनी हकीकत के प्रति संवेदनशील बना रहे। इसलिए, यह नोटिफ़िकेशन बड़े जनहित में उठाए गए एक कदम के तौर पर उचित मान्यता का हकदार है, जो देश और उसके नागरिकों की रक्षा करने के राज्य के संवैधानिक कर्तव्य को मज़बूत करता है।"
कोर्ट ने यह भी कहा कि इस कार्रवाई को "सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश" की गई, जो पूरी तरह से गलत और तथ्यों पर आधारित नहीं है।
इसने कहा:
"रिकॉर्ड पर रखी गई सामग्री से पता चलता है कि संवेदनशील सीमावर्ती इलाके में जहां भी अनधिकृत ढांचे पाए गए हैं, वहां बिना किसी खास समुदाय का भेदभाव किए सभी को नोटिस जारी किए गए। इसलिए यह सावधानीपूर्वक और स्पष्ट रूप से कहा जाना चाहिए कि यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और नियमों के पालन का है, न कि धार्मिक भेदभाव का। इसके अलावा, सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं ने खुद माना कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने वाली स्थितियों में सक्षम अधिकारियों द्वारा उचित कार्रवाई की जा सकती है। साथ ही खुली कार्यवाही में संवेदनशील इंटेलिजेंस इनपुट का खुलासा करना न तो समझदारी है और न ही उचित, क्योंकि ऐसा खुलासा सुरक्षा हितों से समझौता कर सकता है।"
शुरुआत में ही कोर्ट ने कहा कि याचिकाओं में कुछ बुनियादी कमियां हैं, खासकर 'लोकस स्टैंडी' (मुकदमा करने का अधिकार), याचिकाकर्ताओं की पहचान और संबंधित मस्जिद, मदरसा या दरगाह से उनके संबंध को साबित करने वाले ठोस सबूतों की कमी के मामले में। ज़्यादातर याचिकाओं में किसी कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त संस्था या सोसाइटी से कोई भरोसेमंद दस्तावेज़, प्रस्ताव या अधिकार-पत्र पेश नहीं किया गया।
कोर्ट ने आगे कहा कि कई याचिकाओं में यह माना गया कि धार्मिक इमारतों को बनाने के लिए 'धार्मिक भवन अधिनियम' की धारा 5 (धार्मिक उद्देश्यों के लिए सार्वजनिक स्थानों के इस्तेमाल पर रोक) और धारा 6 (सार्वजनिक धार्मिक इमारतों का निर्माण आदि) के तहत ज़रूरी मंज़ूरी कभी नहीं ली गई, और न ही ऐसी मंज़ूरी के लिए संबंधित अधिकारी यानी कलेक्टर के पास कोई आवेदन दिया गया।
कोर्ट ने कहा,
"नतीजतन, जिन ढांचों की बात हो रही है, वे पहली नज़र में अनधिकृत और बिना मंज़ूरी के किए गए निर्माण की श्रेणी में आते हैं।"
राज्य ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं ने कानूनी ढांचे के अनुसार किसी वैध मंज़ूरी या अधिकार के बिना, और ज़रूरी मंज़ूरी या कानूनी बदलाव के बिना पक्के निर्माण किए। प्रतिवादियों ने यह भी आरोप लगाया कि ये ढांचे/संपत्तियां अंतरराष्ट्रीय सीमा (भारत-पाकिस्तान सीमा) से 0-50 किमी के दायरे में स्थित हैं, जो एक अधिसूचित या प्रतिबंधित क्षेत्र में आता है और इन्हें बिना उचित मंज़ूरी के बनाया गया।
प्रतिवादियों ने मुख्य रूप से तर्क दिया कि उपलब्ध रिकॉर्ड, दस्तावेज़ी सामग्री, शिकायतों और खुफिया स्रोतों से मिली जानकारी के आधार पर ऐसे ढांचों का अस्तित्व और संचालन राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकता है।
वहीं, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि न तो पर्याप्त 'कारण बताओ नोटिस' जारी किए गए और न ही याचिकाकर्ताओं को व्यक्तिगत सुनवाई का कोई सार्थक मौका दिया गया। यह कहा गया कि राजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम 1956, खासकर इसकी धारा 90A के तहत कानूनी निर्देशों का सही अर्थ और भावना के साथ पालन नहीं किया गया। यह तर्क दिया गया कि धारा 90A के पीछे विधायी मंशा केवल नियमन की नहीं बल्कि सुविधा देने की भी है, क्योंकि यह कानूनी शर्तों को पूरा करने पर भूमि के उपयोग को नियमित करने में सक्षम बनाती है।
कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं का 'ढांचों को गिराने के मामले में निर्देशों' (Re: Directions in the Matter of Demolition of Structures) पर भरोसा करना बेबुनियाद है, क्योंकि वह फैसला अपराधियों/दोषियों/आरोपियों की ज़मीन/संपत्ति पर बुलडोज़र के इस्तेमाल से संबंधित है, इसलिए "सपने में भी" इसकी तुलना मौजूदा मामले से नहीं की जा सकती, जहां संपत्ति अंतरराष्ट्रीय सीमा के पास है और मामला राष्ट्रीय सुरक्षा का है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि राजस्थान भूमि राजस्व अधिनियम के तहत कानूनी व्यवस्था याचिकाकर्ताओं को उचित और असरदार उपाय देती है। इसलिए 'कारण बताओ नोटिस' (show-cause notice) के चरण में ये याचिकाएं स्वीकार करने लायक नहीं हैं, क्योंकि इनमें तथ्यों से जुड़े विवादित सवाल शामिल है और कानूनी उपायों का इस्तेमाल नहीं किया गया।
कोर्ट ने कहा,
"यह कोर्ट मानता है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों में 'प्राकृतिक न्याय' (natural justice) के पारंपरिक और कड़े नियमों का हमेशा सख्ती से पालन करना ज़रूरी नहीं है। ऐसी कार्रवाई को सही ठहराने वाले सबूत मौजूद होने पर व्यावहारिक और हालात के हिसाब से अपनाया गया तरीका मंज़ूर किया जा सकता है। इस मामले में प्रक्रिया का पर्याप्त पालन किया गया और याचिकाकर्ताओं को कोई नुकसान नहीं पहुंचा है, क्योंकि वे खुद ही इसमें शामिल नहीं हुए।"
याचिकाओं को खारिज करते हुए कोर्ट ने संवेदनशील संपत्तियों से जुड़े मामलों की (अलग-अलग) जांच करने के लिए समिति बनाने का निर्देश दिया। इस समिति में संबंधित इलाके के ज़िला कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक (SP) और सीमा सुरक्षा बल (BSF) के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
Case title: Peer Mohammad Shah Jilani Dargah Samiti v/s The State Of Rajasthan and batch