PPP मॉडल के तहत NGO से सैलरी मिलने की वजह से सरकारी अस्पतालों के अनुभव को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट
राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में मेडिकल सेवाएँ देने से मिले अनुभव और उससे जुड़े फ़ायदों से संबंधित लोगों को सिर्फ़ इसलिए वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि उनकी सैलरी राज्य सरकार द्वारा मंज़ूर प्रशासनिक व्यवस्था के तहत एक चैरिटेबल ट्रस्ट के ज़रिए दी जाती थी।
जस्टिस नूपुर भाटी की बेंच ने कहा कि सैलरी देने का तरीका कानूनी रूप से महत्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि यह असल में दी गई सेवा और हासिल किए गए अनुभव के निर्विवाद तथ्य को कम नहीं कर सकता।
बता दें, याचिकाकर्ताओं ने नर्सिंग ऑफिसर की भर्ती प्रक्रिया में भाग लिया था, जिसमें उन्होंने मेरिट हासिल की, लेकिन अंतिम चयन सूची में उनका नाम नहीं था।
उन्हें पता चला कि उनकी उम्मीदवारी इसलिए खारिज कर दी गई, क्योंकि उन्हें उनके अनुभव का लाभ नहीं दिया गया, क्योंकि वे पब्लिक-प्राइवेट पार्टनरशिप (PPP) मॉडल के तहत चैरिटेबल ट्रस्ट के माध्यम से सैलरी ले रहे थे, न कि सीधे राज्य सरकार से। इसलिए याचिका दायर की गई।
याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि वे 2019 से राज्य सरकार और एक चैरिटेबल ट्रस्ट के बीच हुए MOU के तहत बनाए गए सरकारी-मंज़ूर पदों पर नर्सिंग ऑफिसर के रूप में काम कर रहे थे। भले ही उनकी सैलरी ट्रस्ट द्वारा दी जाती थी, लेकिन इस तथ्य से नौकरी की प्रकृति नहीं बदली। इसलिए यह तर्क दिया गया कि वे अनुभव के लाभ के हकदार थे।
तर्कों को सुनने के बाद कोर्ट ने कहा,
"भर्ती प्रक्रिया में अनुभव के लिए बोनस अंक देने का उद्देश्य उन उम्मीदवारों को पहचानना और पुरस्कृत करना है जिन्होंने सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में मेडिकल सेवाएँ देते हुए व्यावहारिक अनुभव हासिल किया।"
कोर्ट ने माना कि चूँकि याचिकाकर्ताओं ने आवश्यक अवधि के लिए सरकारी-मंज़ूर पदों पर सेवाएं दी थीं, इसलिए सैलरी का तरीका अनुभव को कम या खत्म नहीं कर सकता।
गोविंद दायमा और अन्य बनाम राजस्थान राज्य और अन्य के डिवीज़न बेंच मामले का हवाला दिया गया, जिसमें कोर्ट ने इसी तरह की तथ्यात्मक स्थिति पर विचार किया और उम्मीदवारों के पक्ष में फैसला सुनाया।
इसके अनुसार, याचिका स्वीकार की गई और राज्य को निर्देश दिया गया कि वह याचिकाकर्ताओं को उनके कार्य अनुभव के अनुसार बोनस अंक दे और परिणामस्वरूप, यदि वे योग्य पाए जाते हैं, तो उन्हें नियुक्ति दे।
Title: Sanjay Kumar & Ors. v State of Rajasthan