Spurious Liquor Death: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने ENA सप्लाई करने के आरोपी व्यक्ति को ज़मानत देने से इनकार किया, जल्द सुनवाई का आदेश

Update: 2026-03-13 04:36 GMT

यह देखते हुए कि गंभीर अपराधों में ज़मानत से इनकार को जल्द सुनवाई के संवैधानिक आदेश के साथ संतुलित किया जाना चाहिए, पंजाब एंड हरियाणा हाई कोर्ट ने कहा कि जहां लंबे समय तक हिरासत में रहने के बावजूद ज़मानत नहीं दी जा सकती, वहां अदालतों को "न्याय के साथ खिलवाड़" को रोकने के लिए सुनवाई को जल्द से जल्द पूरा करना सुनिश्चित करना चाहिए।

अदालत एक ऐसे आरोपी से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी, जिस पर कथित तौर पर एक्स्ट्रा न्यूट्रल अल्कोहल (ENA) की सप्लाई करने का आरोप है। इसी ENA का इस्तेमाल कथित तौर पर शराब बनाने में किया गया, जिसके कारण कई लोगों की मौत हो गई।

जस्टिस सुमीत गोयल ने कहा,

"इसलिए ऐसे मामलों में जहां समय बीत जाने के बावजूद, अदालत अपने न्यायिक विवेक से यह पाती है कि अन्य कारक ज़मानत देने में बाधा डाल रहे हैं, वहां न्याय के साथ खिलवाड़ को रोकने के लिए एक सक्रिय दृष्टिकोण अपनाया जाना चाहिए। ऐसे मामलों में ज़मानत देने से इनकार के साथ-साथ सुनवाई को जल्द-से-जल्द पूरा करने का एक अनिवार्य आदेश भी जुड़ा होना चाहिए।"

सुनवाई में देरी से पीड़ित को कष्ट होता है

जज ने आगे कहा कि आपराधिक कार्यवाही में लगातार होने वाली देरी एक ऐसी व्यवस्थागत बुराई है, जो आरोपी के व्यक्तिगत हितों से कहीं आगे बढ़कर समाज की सामूहिक चेतना पर अत्यंत हानिकारक प्रभाव डालती है। हालाँकि कानूनी चर्चाएं अक्सर जेल में बंद लोगों की कठिनाइयों पर केंद्रित होती हैं, लेकिन पीड़ित को होने वाले प्रत्यक्ष कष्ट और पीड़ा को नज़रअंदाज़ करना एक गंभीर न्यायिक त्रुटि है।

अदालत ने आगे कहा,

"पीड़ित के लिए एक अंतहीन सुनवाई महज़ एक प्रक्रियागत देरी नहीं है, बल्कि यह एक प्रकार की 'द्वितीयक पीड़ितता' (Secondary Victimization) है, जो उसे एक ऐसी निरंतर भावनात्मक यातना की स्थिति में धकेल देती है, जहां मामले के अंतिम निष्कर्ष तक न पहुंच पाने के कारण अपराध के घाव हमेशा ताज़ा बने रहते हैं।"

अदालत का 'मध्यम मार्ग' (Golden Mean) दृष्टिकोण

पीठ ने कहा कि जहां राहत की मांग केवल प्रक्रियागत देरी के आधार पर की जा रही हो, वहां अदालत को 'मध्यम मार्ग' वाला दृष्टिकोण अपनाना चाहिए; इस दृष्टिकोण के तहत आरोपी/जेल में बंद व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा तो की जाती है। साथ ही आपराधिक न्याय प्रणाली को भी पूरी तरह से शक्तिहीन नहीं बनाया जाता।

अदालत ने आगे कहा,

"इसलिए देरी के संबंध में की जाने वाली संवैधानिक जाँच वास्तव में एक प्रासंगिक मूल्यांकन होना चाहिए, जिसके तहत यह देखा जाए कि क्या किसी विशेष मामले की विशिष्ट परिस्थितियों (Penumbra) के अंतर्गत आरोपी की निरंतर हिरासत संवैधानिक रूप से स्वीकार्य है या नहीं। जब तक कि देरी इतनी अधिक न हो कि वह न्यायिक अंतरात्मा को ही झकझोर दे, तब तक इसे ज़मानत देने का एकमात्र आधार नहीं माना जा सकता।"

जस्टिस गोयल ने यह राय व्यक्त की कि देरी के आधार पर की गई किसी भी याचिका की जांच किसी 'कानूनी शून्य' (legal vacuum) या केवल एक 'अमूर्त विचार' (Abstraction) के रूप में नहीं की जा सकती। इसके बजाय, इसे आरोपों की गंभीरता; आवेदक को सौंपी गई विशिष्ट भूमिका; मुकदमे की प्रगति; आवेदक को जमानत पर रिहा करने से जुड़े जोखिमों आदि के आधार पर तौला जाना चाहिए।

ये टिप्पणियां अंशुल गर्ग द्वारा दायर दूसरी नियमित जमानत याचिका को खारिज करते हुए की गईं। अंशुल गर्ग पर एक्स्ट्रा न्यूट्रल अल्कोहल (ENA) की आपूर्ति करने का आरोप है, जिसका कथित तौर पर नकली शराब बनाने में इस्तेमाल किया गया था, जिसके कारण हरियाणा में कई लोगों की मौत हो गई थी।

यह मामला FIR संख्या 387 से जुड़ा है, जो 10 नवंबर, 2023 को यमुनानगर जिले के छप्पर पुलिस स्टेशन में IPC की धारा 120-B, 201, 328 और 302 के तहत अपराधों के लिए, साथ ही पंजाब आबकारी अधिनियम, 1914 की धारा 72-A के तहत दर्ज की गई।

अभियोजन पक्ष के अनुसार, FIR तब दर्ज की गई जब कथित तौर पर 9 नवंबर, 2023 को जहरीली देसी शराब पीने के बाद जगमाल नाम के एक व्यक्ति की मौत हो गई। शिकायत उसके बेटे ने दर्ज कराई, जिसने आरोप लगाया कि शराब कुछ खास लोगों से खरीदी गई।

जांच के दौरान, पुलिस ने दावा किया कि उन्होंने एक बड़े नेटवर्क का भंडाफोड़ किया है, जो कथित तौर पर अवैध शराब के निर्माण और वितरण में शामिल था। इसके बाद तीन और लोगों — अनिल कुमार, परमजीत और सुशील — की भी कथित तौर पर वही नकली शराब पीने से मौत होने की खबर मिली।

मूल FIR में याचिकाकर्ता का नाम नहीं था। हालांकि, जांच के दौरान, सह-आरोपियों के बयानों के माध्यम से कथित तौर पर उसका नाम सामने आया; सह-आरोपियों ने दावा किया कि अवैध शराब बनाने में इस्तेमाल किया गया ENA उसी से खरीदा गया।

याचिकाकर्ता की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट विनोद घई ने तर्क दिया कि आरोपी को झूठा फंसाया गया और उसका नाम FIR में नहीं है।

यह तर्क दिया गया कि उसे फंसाना पूरी तरह से सह-आरोपियों के बयानों पर आधारित था, जो तब तक स्वीकार्य नहीं होते जब तक कि उनके समर्थन में कोई स्वतंत्र पुष्टिकारक सबूत न हो। बचाव पक्ष ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता से कोई बरामदगी नहीं हुई और ऐसा कोई दस्तावेजी साक्ष्य नहीं है जो उसे अवैध शराब के कथित निर्माण या आपूर्ति से जोड़ता हो।

याचिकाकर्ता ने यह भी दावा किया कि वह एक लाइसेंसी आयुर्वेदिक निर्माण इकाई चलाता है और COVID-19 महामारी के दौरान उसे सैनिटाइज़र बनाने के लिए ENA खरीदने का अधिकार दिया गया।

याचिका का विरोध करते हुए राज्य सरकार ने कहा कि इस मामले में नकली शराब बनाने और उसे फैलाने की एक सुनियोजित साज़िश शामिल है, जिसके कारण कथित तौर पर कई लोगों की मौत हुई।

अभियोजन पक्ष ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता ने आपूर्ति श्रृंखला में एक अहम भूमिका निभाई, क्योंकि उसने ENA उपलब्ध कराया था; यह ENA ही वह मुख्य कच्चा माल था, जिसका इस्तेमाल ज़हरीली शराब बनाने में किया गया।

यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता की पिछली ज़मानत याचिका पहले ही गुण-दोष के आधार पर खारिज की जा चुकी थी। परिस्थितियों में ऐसा कोई ठोस बदलाव नहीं आया था जिसके आधार पर इस मामले पर दोबारा विचार किया जा सके।

हाई कोर्ट ने इस बात को दोहराया कि हालांकि दूसरी या लगातार दायर की गई ज़मानत याचिकाएं कानूनी रूप से स्वीकार्य होती हैं, लेकिन वे तभी सफल हो सकती हैं, जब पिछली याचिका खारिज होने के बाद परिस्थितियों में कोई ठोस बदलाव आया हो।

जस्टिस गोयल ने टिप्पणी की कि आरोप बेहद गंभीर प्रकृति के हैं, क्योंकि वे अवैध शराब बनाने और उसे फैलाने से जुड़े हैं, जिसके परिणामस्वरूप कई लोगों की जान चली गई।

कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि हालांकि मूल FIR में याचिकाकर्ता का नाम शामिल नहीं था, लेकिन जांच के दौरान बाद में जुटाए गए सबूतों के आधार पर उसकी कथित संलिप्तता सामने आई।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता के आपराधिक इतिहास को भी ध्यान में रखा और यह माना कि ज़मानत पर फैसला लेते समय आपराधिक मामलों में उसकी पिछली संलिप्तता एक प्रासंगिक कारक होती है; विशेष रूप से तब, जब इस बात की आशंका हो कि आरोपी दोबारा वैसी ही गतिविधियां कर सकता है या गवाहों को प्रभावित कर सकता है।

उन सह-आरोपियों के साथ समानता (Parity) की याचिका को खारिज करते हुए, जिन्हें ज़मानत मिल चुकी थी, कोर्ट ने यह फैसला दिया कि समानता के सिद्धांत को आँख मूंदकर लागू नहीं किया जा सकता, बल्कि प्रत्येक आरोपी की भूमिका का मूल्यांकन अलग-अलग किया जाना चाहिए।

कोर्ट ने आगे यह भी टिप्पणी की कि केवल लंबे समय तक जेल में रहने के आधार पर ज़मानत नहीं दी जा सकती, खासकर तब जब आरोप गंभीर हों और आरोपी की भूमिका भी काफी अहम हो।

कोर्ट ने कहा,

"इस प्रकृति के अपराध सार्वजनिक व्यवस्था और सामाजिक चेतना की जड़ों पर ही प्रहार करते हैं।"

ज़मानत देने से इनकार करते हुए कोर्ट ने आपराधिक मुकदमों में होने वाली देरी को लेकर जताई गई चिंताओं को स्वीकार किया। साथ ही इस बात पर ज़ोर दिया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत 'शीघ्र सुनवाई के अधिकार' को हर हाल में सुरक्षित रखा जाना चाहिए।

तदनुसार, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को यह निर्देश दिया कि वह मुकदमे की कार्यवाही में तेज़ी लाने के लिए पूरी गंभीरता से प्रयास करे। यदि आवश्यक हो तो प्रतिदिन सुनवाई करके, इस मुकदमे को अधिमानतः एक वर्ष के भीतर ही पूरा करे।

Title: Anshul Garg v. State of Haryana

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