स्वास्थ्य का अधिकार जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा, मेडिकल प्रतिपूर्ति नीतियों पर पुनर्विचार जरूरी: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

Update: 2026-06-11 09:09 GMT

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि स्वास्थ्य और चिकित्सा सुविधा का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार का अभिन्न हिस्सा है। अदालत ने राज्य कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति से जुड़े मामलों में मानवीय और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करने का संकेत दिया।

जस्टिस संदीप मौद्गिल ने मेडिकल खर्च की प्रतिपूर्ति से जुड़े कई मामलों का निस्तारण करते हुए कहा कि सामाजिक कल्याण से जुड़ी योजनाओं की व्याख्या तकनीकी आधारों पर नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और संविधान की कल्याणकारी भावना के अनुरूप की जानी चाहिए।

अदालत ने कहा,

"मेडिकल प्रतिपूर्ति नीतियों की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए, जो मानव कल्याण को बढ़ावा दे, न कि तकनीकी आपत्तियों के जरिए उसे बाधित करे। कल्याणकारी राज्य की संवैधानिक अवधारणा हमारी उस प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा से शक्ति प्राप्त करती है, जिसमें कहा गया— 'सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः'।"

हाईकोर्ट ने कहा कि समाज का कल्याण उसके नागरिकों के स्वास्थ्य और सम्मान से जुड़ा हुआ है। इसलिए राज्य की नीतियों का उद्देश्य न्याय सुनिश्चित करना होना चाहिए, न कि उसके मार्ग में बाधा उत्पन्न करना।

मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने उन याचिकाओं पर विचार किया, जिनमें गैर-पैनल अस्पतालों में कराए गए उपचार का खर्च लौटाने से इनकार, मेडिकल प्रतिपूर्ति को सीमित दरों तक रोकना तथा पुराने आय मानदंडों और उपचार पैकेजों के आधार पर दावों को खारिज करने जैसे मुद्दे शामिल हैं।

अदालत ने स्पष्ट किया कि राज्य पर अपने कर्मचारियों और पेंशनभोगियों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने की संवैधानिक जिम्मेदारी है। हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर मेडिकल प्रतिपूर्ति से इनकार नहीं किया जा सकता कि उपचार किसी गैर-मान्यता प्राप्त अस्पताल में कराया गया, विशेषकर तब जब मामला आपातकालीन स्थिति का हो।

पीठ ने कहा कि प्रतिष्ठित सरकारी चिकित्सा संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध होने के बावजूद लंबी प्रतीक्षा सूची, अत्यधिक भीड़ और तत्काल उपचार की आवश्यकता जैसी परिस्थितियां मरीजों को निजी अस्पतालों की ओर जाने के लिए मजबूर कर सकती हैं। ऐसे मामलों में केवल तकनीकी कारणों से प्रतिपूर्ति रोकना मानव जीवन से अधिक प्रक्रिया को महत्व देने जैसा होगा।

अदालत ने कहा,

"मेडिकल प्रतिपूर्ति सामाजिक कल्याण का महत्वपूर्ण साधन है। इसका उद्देश्य बीमारी के समय लोगों को आर्थिक संकट से बचाना है। इसलिए इसकी व्याख्या संवैधानिक करुणा और मानवीय दृष्टिकोण के साथ की जानी चाहिए।"

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि वर्तमान मेडिकल प्रतिपूर्ति नीति और उससे जुड़े विवादित प्रावधानों की समीक्षा की प्रक्रिया शुरू कर दी गई ताकि उन्हें वर्तमान मेडिकल आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जा सके।

इस पर हाईकोर्ट ने याचिकाओं का निस्तारण करते हुए संबंधित अधिकारियों को प्रत्येक मामले पर अलग-अलग और सहानुभूतिपूर्ण ढंग से विचार करने का निर्देश दिया। राज्य द्वारा गठित समिति को चार सप्ताह के भीतर सभी दावों पर निर्णय लेने को कहा गया।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि यदि किसी याचिकाकर्ता को कोई राशि देय पाई जाती है तो उस पर देय तिथि से छह प्रतिशत वार्षिक ब्याज भी दिया जाएगा।

अपने आदेश में हाईकोर्ट ने दोहराया कि कल्याणकारी राज्य की नीतियों का उद्देश्य नागरिकों के हितों की रक्षा करना होना चाहिए और उन्हें प्रक्रियागत कठोरता के कारण निष्प्रभावी नहीं बनाया जाना चाहिए।

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