भर्ती के नतीजे घोषित होने के बाद उम्मीदवार आरक्षित उप-श्रेणी नहीं बदल सकता: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

Update: 2026-05-13 14:18 GMT

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने उम्मीदवार की वह याचिका खारिज की, जिसमें उसने भर्ती प्रक्रिया के नतीजे घोषित होने के बाद अपनी जाति की उप-श्रेणी में सुधार की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि उम्मीदवार आवेदन के समय चुनी गई श्रेणी से बंधे होते हैं और बाद के चरण में इसमें बदलाव की मांग नहीं कर सकते।

जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने कहा,

"सहानुभूति या निष्पक्षता भर्ती की निर्धारित शर्तों से ऊपर नहीं हो सकती। अगर स्पष्ट रोक वाले नियमों के बावजूद ऐसी मांगों पर विचार किया जाता है तो इससे मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी, जिससे सार्वजनिक रोजगार प्रक्रियाओं में अनिश्चितता पैदा होगी और चयन प्रक्रिया की पवित्रता को भी गंभीर नुकसान पहुंचेगा।"

कोर्ट परविंदर सिंह द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसने पंजाब स्टेट ट्रांसमिशन कॉर्पोरेशन लिमिटेड (PSTCL) के एक विज्ञापन के तहत टेलीफोन मैकेनिक के पद के लिए आवेदन किया था। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसने गलती से अपनी असली एससी (मज़हबी और बाल्मीकि) श्रेणी के बजाय एससी (R&O) उप-श्रेणी चुन ली थी, जबकि उसके पास कट-ऑफ तारीख से पहले का वैध प्रमाण पत्र मौजूद था।

यह तर्क दिया गया कि यह गलती नेकनीयत और लिपिकीय (Clerical) प्रकृति की थी। अगर याचिकाकर्ता पर सही श्रेणी के तहत विचार किया जाता तो वह चयन सूची में आ जाता। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि अगर सुधार की अनुमति दी जाती है तो इससे अन्य उम्मीदवारों को कोई नुकसान नहीं होगा।

हालांकि, कोर्ट ने राहत देने से इनकार किया और कहा कि भर्ती विज्ञापन में आवेदन पत्र जमा करने के बाद श्रेणी में किसी भी बदलाव पर स्पष्ट रूप से रोक लगाई गई। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि याचिकाकर्ता ने जान-बूझकर फॉर्म भरा था, लागू शुल्क का भुगतान किया, और उचित चरण पर कोई आपत्ति उठाए बिना पूरी चयन प्रक्रिया में भाग लिया।

कोर्ट ने आगे कहा,

"याचिकाकर्ता ने जान-बूझकर ऑनलाइन आवेदन पत्र भरा, एससी (R&O) उप-श्रेणी चुनी, आवश्यक शुल्क का भुगतान किया, लिखित परीक्षा में भाग लिया और आगे उचित चरण पर कोई आपत्ति उठाए बिना पूरी चयन प्रक्रिया से गुज़रा। यह तर्क कि गलती 'अनजाने में' या 'लिपिकीय' थी, इस मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए स्वीकार नहीं किया जा सकता, ताकि विज्ञापन की स्पष्ट शर्तों को नज़रअंदाज़ किया जा सके; खासकर तब, जब प्रक्रिया काफी आगे बढ़ चुकी है और नतीजे घोषित हो चुके हैं।"

सुप्रीम कोर्ट के मामलों, जिनमें 'राजस्थान हाईकोर्ट बनाम नीतू हर्ष' का मामला भी शामिल है, पर भरोसा करते हुए कोर्ट ने यह फैसला दिया कि एक बार जब कोई उम्मीदवार किसी खास श्रेणी (Category) को चुन लेता है और चयन प्रक्रिया में हिस्सा लेता है तो उसका यह चुनाव अंतिम माना जाता है। बाद में इसे बदलकर किसी ज़्यादा फ़ायदेमंद पद का दावा नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने आगे यह भी कहा कि नतीजों की घोषणा के बाद इस तरह के बदलावों की इजाज़त देने से चयन प्रक्रिया में अस्थिरता आ जाएगी और दूसरे उम्मीदवारों के साथ अन्याय होगा। इसके अलावा, इससे मुकदमों की बाढ़ भी आ जाएगी। कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि सिर्फ़ एक वैध जाति प्रमाण पत्र (Caste Certificate) होने से ही भर्ती विज्ञापन की बाध्यकारी शर्तों को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ता के आवेदन को खारिज करने में कोई भी गैर-कानूनी बात न पाते हुए कोर्ट ने संबंधित आदेश को सही ठहराया और रिट याचिका खारिज की।

Title: Parwinder Singh v. State of Punjab and others

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