PM Modi से जुड़े कथित वीडियो मामले में मधु किश्वर को अग्रिम जमानत से राहत नहीं, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने लेखिका और सोशल एक्टिविस्ट मधु किश्वर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से जुड़े कथित वीडियो को सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर साझा करने के मामले में अग्रिम जमानत देने से इनकार किया। हाईकोर्ट ने कहा कि मामले की जांच अभी शुरुआती चरण में है और कई महत्वपूर्ण पहलुओं का खुलासा होना बाकी है।
जस्टिस अमन चौधरी ने अपने आदेश में कहा कि संबंधित वीडियो भले ही पहले अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर डाला गया, लेकिन याचिकाकर्ता द्वारा अपनी टिप्पणियों के साथ उसे साझा किए जाने के बाद उसे लगभग 1.74 लाख बार देखा गया। अदालत ने कहा कि इसके बाद वीडियो को एक संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति से जोड़कर अटकलें लगाई गईं, जिन्हें बाद में याचिकाकर्ता की ओर से किए गए एक अन्य पुनर्प्रसारण से और बल मिला।
मधु किश्वर के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं, जिनमें समुदायों के बीच वैमनस्य फैलाने, धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेज के उपयोग, लोक शांति भंग करने वाले बयान और मानहानि से संबंधित प्रावधान शामिल हैं, के तहत मामला दर्ज किया गया। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धाराएं भी लगाई गईं।
अदालत ने जांच एजेंसी की ओर से दायर स्टेटस रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि 20 अप्रैल, 26 अप्रैल और 5 मई को नोटिस भेजे जाने के बावजूद याचिकाकर्ता जांच में शामिल नहीं हुईं। जबकि अन्य कुछ सह-आरोपियों ने जांच में सहयोग किया। अदालत ने इसे जांच में असहयोग का संकेत माना।
स्टेटस रिपोर्ट के अनुसार विवादित वीडियो सबसे पहले अन्य व्यक्ति द्वारा सोशल मीडिया पर अपलोड किया गया, जिसमें एक पुरुष को एक महिला से मालिश कराते हुए दिखाया गया।
अदालत ने अपने आदेश में कहा कि रचनात्मक आलोचना और किसी व्यक्ति की छवि धूमिल करने के उद्देश्य से की गई पोस्ट में स्पष्ट अंतर होता है।
आदेश में कहा गया,
"यदि ऐसा कार्य किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाए जिसकी सोशल मीडिया पर बड़ी पहुंच हो तो उसके प्रभाव की व्यापकता का अनुमान लगाना कठिन है। ऐसे पोस्ट सामाजिक असामंजस्य पैदा कर सकते हैं, अलगाववादी भावनाओं को बढ़ावा दे सकते हैं और देश की एकता एवं अखंडता को खतरे में डाल सकते हैं।"
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता स्वयं को स्कॉलर और प्रतिष्ठित सार्वजनिक व्यक्तित्व बताती हैं, इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि उन्हें अपने पोस्ट के संभावित प्रभाव का अंदाजा नहीं था। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि संबंधित पोस्ट पर बड़ी संख्या में प्रतिक्रियाएं आईं और इससे व्यापक चर्चा छिड़ गई।
अदालत ने यह भी कहा कि यदि यह एक अकेली घटना होती तो मामले पर अलग दृष्टिकोण अपनाया जा सकता था, लेकिन स्टेटस रिपोर्ट से यह भी सामने आया कि याचिकाकर्ता पूर्व में भी संवेदनशील विषयों से जुड़े पोस्ट और हैशटैग साझा करती रही हैं।
मधु किश्वर की ओर से दलील दी गई कि उन्होंने केवल 14 सेकंड का एक वीडियो पुनर्प्रसारित किया था, उसमें कोई दुर्भावना नहीं थी और वीडियो तैयार करने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। यह भी कहा गया कि जालसाजी का अपराध उनके खिलाफ नहीं बनता क्योंकि वीडियो उन्होंने नहीं बनाया। याचिकाकर्ता ने अपने स्वच्छ आपराधिक रिकॉर्ड और अकादमिक पृष्ठभूमि का भी हवाला दिया।
वहीं, चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से कहा गया कि वीडियो पहले अन्य मंचों पर अपलोड किया गया, लेकिन याचिकाकर्ता ने उसे डाउनलोड कर अपने 'एक्स' खाते से साझा किया, जहां उनके लगभग 18 लाख अनुयायी हैं। प्रशासन का कहना था कि इससे कथित भ्रामक सूचना का व्यापक प्रसार हुआ और सरकार के मुखिया की छवि को नुकसान पहुंचा।
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाइकोर्ट ने कहा कि मामले में कथित आपराधिक भूमिका को इस स्तर पर पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि सोशल मीडिया के दौर में गलतफहमी और भ्रामक सूचना बहुत तेजी से फैल सकती है, इसलिए सामग्री साझा करते समय अधिक सामाजिक जिम्मेदारी अपेक्षित है।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने मधु किश्वर की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की।