मुकदमेबाज़ वकील पर दोष मढ़कर सालों की देरी के बाद खत्म हो चुकी कार्यवाही को दोबारा शुरू नहीं कर सकता: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट
पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (criminal revision petition) को वापस लिए जाने के आधार पर खारिज करने वाला आदेश वापस लेने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने यह माना कि किसी मुकदमेबाज़ को बार-बार मौके दिए जाने के बाद भी केवल अपने वकील की गलतियों का आरोप लगाकर लंबे समय से लंबित कार्यवाही को दोबारा शुरू करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
जस्टिस नीरजा के. कालसन ने कहा,
"रिकॉर्ड से जो आचरण सामने आया, वह किसी एक तारीख के किसी एक काम तक ही सीमित नहीं है। बल्कि, इस कोर्ट द्वारा बार-बार मौके दिए जाने के बावजूद, यह मामला सालों तक लंबित रहा। आखिरी मौका दिए जाने और जुर्माना (costs) लगाए जाने के बाद भी मामले पर बहस नहीं की गई। न्यायिक कार्यवाही को अनिश्चित काल तक लंबित रहने और उसके बाद केवल इस दलील पर दोबारा शुरू करने की अनुमति नहीं दी जा सकती कि चूक वकील की तरफ से हुई थी।"
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि पिछले वकील ने बिना किसी खास निर्देश के ही याचिका वापस ली थी। आगे यह भी तर्क दिया गया कि मामले के लंबित रहने के दौरान बार-बार स्थगन (Adjournments) वकील के आचरण के कारण हुए और वकील की चूक के लिए याचिकाकर्ता को नुकसान नहीं उठाना चाहिए।
इस मामले में उस स्थापित कानूनी सिद्धांत का हवाला दिया गया कि किसी मुकदमेबाज़ को वकील की गलती के लिए दंडित नहीं किया जाना चाहिए।
हालांकि, रिकॉर्ड की जांच करने पर कोर्ट ने पाया कि याचिका 2019 से लंबित थी और लगभग सात सालों तक इस पर कोई फैसला नहीं हुआ था। कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता की ओर से कई सालों तक बार-बार स्थगन की मांग की गई।
कोर्ट ने विशेष रूप से अपने पहले के आदेश का ज़िक्र किया, जो 1 सितंबर, 2025 का था। उस आदेश में यह दर्ज था कि कई मौकों के बावजूद—जिनमें 25 अक्टूबर, 2024 को दिया गया "आखिरी मौका" और 17 मार्च, 2025 को दिया गया एक और मौका शामिल था—मामले पर बहस नहीं की गई। इसके बाद भी एक और स्थगन की मांग की गई, जिसके चलते कोर्ट ने ₹5,000 का जुर्माना लगाया और चेतावनी दी कि अब कोई और मौका नहीं दिया जाएगा।
इन स्पष्ट चेतावनियों के बावजूद, मामले पर फिर भी बहस नहीं की गई, जिसका नतीजा यह हुआ कि 11 मार्च, 2026 को याचिका वापस ली गई।
इस दलील को खारिज करते हुए कोर्ट ने यह स्वीकार किया कि उचित मामलों में किसी मुकदमेबाज़ को वकील की अनजाने में हुई चूक के कारण नुकसान नहीं उठाना चाहिए।
हालांकि, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया:
“उक्त सिद्धांत को इस हद तक नहीं बढ़ाया जा सकता कि कोई मुक़दमेबाज़, कार्यवाही को वर्षों तक ठप रहने देने के बाद केवल वकील पर सब कुछ थोपकर समाप्त हो चुकी कार्यवाही को फिर से खोलने की अनुमति पा जाए।”
अदालत ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मौजूदा मामले में आचरण केवल एक चूक तक सीमित नहीं था, बल्कि यह कई वर्षों से देरी के एक लगातार पैटर्न को दर्शाता था।
वास्तविक न्याय और प्रक्रियात्मक अनुशासन के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए अदालत ने फ़ैसला दिया कि न्यायिक कार्यवाही को “अनिश्चित काल तक लंबित” रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती और फिर ऐसे आधारों पर उन्हें फिर से नहीं खोला जा सकता।
अदालत ने पाया कि एक बार जब बार-बार रियायतें दी जा चुकी हों और पर्याप्त अवसर समाप्त हो चुके हों तो आदेशों को वापस लेने के लिए अपने विवेकाधीन क्षेत्राधिकार का प्रयोग करते समय अदालत को सावधानी बरतनी चाहिए।
11 मार्च, 2026 के आदेश को वापस लेने का कोई पर्याप्त आधार न पाते हुए अदालत ने आवेदन खारिज किया।
Case Title: SXXX V. SXXXXXX