टेंडर में 'मौजूदा प्रतिबद्धता' वही मानी जाएगी, जो वास्तव में लागू हों: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि टेंडर प्रक्रिया में केवल वही कार्य “मौजूदा प्रतिबद्धता” माने जाएंगे, जो वास्तव में लागू और प्रभावी हों। जिन कार्यों को पहले ही समाप्त करने का प्रस्ताव हो चुका हो, उन्हें छिपाने के आधार पर बोलीदाता को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।
जस्टिस सुधीर सिंह और जस्टिस शैलेन्द्र सिंह की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए तकनीकी मूल्यांकन समिति द्वारा एक बोलीदाता को अयोग्य ठहराने का आदेश रद्द किया।
मामला ग्रामीण कार्य विभाग द्वारा सड़क और पुल निर्माण से जुड़े टेंडर से संबंधित था। याचिकाकर्ता को पहले तकनीकी रूप से योग्य घोषित किया गया लेकिन बाद में एक शिकायत के आधार पर उसे यह कहते हुए अयोग्य कर दिया गया कि उसने अपने एक पुराने कार्य का खुलासा नहीं किया।
याचिकाकर्ता ने दलील दी कि जिस कार्य का खुलासा नहीं करने का आरोप लगाया गया, उसे बोली जमा करने से पहले ही विभाग द्वारा समाप्त करने का प्रस्ताव दिया जा चुका था, इसलिए वह “मौजूदा प्रतिबद्धता” नहीं था।
अदालत ने टेंडर की शर्तों की व्याख्या करते हुए कहा कि “मौजूदा प्रतिबद्धता” का अर्थ ऐसे कार्य से है, जो अभी चल रहा हो और जिसका असर बोलीदाता की कार्य क्षमता पर पड़ता हो।
अदालत ने कहा,
“यह स्पष्ट है कि 'मौजूदा प्रतिबद्धता' वही है, जो लागू और प्रभावी हो तथा जिसका सीधा असर बोलीदाता की क्षमता पर पड़े। केवल वही कार्य शामिल होंगे जिन्हें पूरा किया जाना बाकी है।”
अदालत ने पाया कि विवादित कार्य को बोली जमा करने की अंतिम तिथि से पहले ही समाप्त करने का प्रस्ताव दिया गया और उस पर कोई काम नहीं हो रहा था। ऐसे में उसे जारी कार्य मानना गलत है।
हाईकोर्ट ने राज्य के इस तर्क को भी खारिज कर दिया कि समाप्ति की प्रक्रिया लंबित होने के कारण उसे “मौजूदा कार्य” माना जाए। अदालत ने कहा कि विभागीय देरी का नुकसान बोलीदाता को नहीं उठाना चाहिए।
साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकारी स्पष्टीकरण या प्रेस विज्ञप्ति टेंडर की मूल शर्तों को बदल नहीं सकती, केवल उन्हें स्पष्ट कर सकती है।
इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने बोलीदाता की अयोग्यता को मनमाना और नियमों के खिलाफ बताते हुए रद्द कर दिया।