'कई स्तरों पर गलत इरादे से प्रेरित': पटना हाईकोर्ट ने पैसे मांगने के आरोपी ADJ का CrPC की धारा 319 के तहत दिया गया आदेश रद्द किया
पटना हाईकोर्ट ने हत्या के मामले में CrPC की धारा 319 के तहत एक व्यक्ति को ट्रायल का सामना करने के लिए बुलाने वाला आदेश रद्द किया। कोर्ट ने कहा कि यह कार्यवाही "कई स्तरों पर गलत इरादे से प्रेरित" लग रही थी और ट्रायल कोर्ट ने जिन सबूतों के आधार पर यह फैसला लिया, वह CrPC की धारा 319 के तहत शक्तियों का इस्तेमाल करने के लिए "बहुत कम" हैं।
जस्टिस अंशुल की सिंगल जज बेंच क्रिमिनल मिसलेनियस याचिका पर सुनवाई कर रही थी। यह याचिका भागलपुर के एडिशनल डिस्ट्रिक्ट एंड सेशंस जज-VII द्वारा 22.08.2019 को दिए गए आदेश को चुनौती देने के लिए दायर की गई। यह आदेश सेशंस ट्रायल नंबर 492/2015 (जो कोतवाली पुलिस स्टेशन केस नंबर 305/2012 से जुड़ा था) में दिया गया। इस आदेश के तहत याचिकाकर्ता को IPC की धारा 302/34 और आर्म्स एक्ट की धारा 27 के तहत अपराधों के लिए CrPC की धारा 319 के तहत ट्रायल का सामना करने के लिए बुलाया गया।
अभियोजन पक्ष का मामला विश्वनाथ कुमार गुप्ता की हत्या से जुड़ा था। आरोप है कि 02.06.2012 को भारती चौक के पास चाय पीने के बाद लौटते समय उन्हें गोली मार दी गई। बाद में चोटों के कारण उनकी मौत हो गई। कोर्ट ने गौर किया कि हालांकि पुलिस स्टेशन को 02.06.2012 को शाम 07:30 बजे सूचना मिल गई, लेकिन FIR 03.06.2012 को दर्ज की गई और मजिस्ट्रेट के पास 06.06.2012 को पहुंची।
याचिकाकर्ता के अनुसार, मृतक की मोहम्मद नसीम के साथ बिजनेस को लेकर दुश्मनी थी। नसीम परिवार के फलों के बिजनेस में पार्टनर था और इसी दुश्मनी के कारण हत्या हुई। याचिकाकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि भागलपुर के तत्कालीन सीनियर सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस (SSP), के.एस. अनुपम (जो कथित तौर पर याचिकाकर्ता के रिश्तेदार थे और उनके साथ पैसों का विवाद था) ने जांच को गलत तरीके से प्रभावित किया और उन्हें इस मामले में फंसाया।
यह तर्क दिया गया कि मो. सद्दाम और मो. रुस्तम की गिरफ्तारी के बाद कोर्ट की छुट्टी के दिन मजिस्ट्रेट के सामने जबरदस्ती CrPC की धारा 164 के तहत उनके कबूलनामे दर्ज किए गए। पुलिस ने आरोप लगाया कि याचिकाकर्ता ने किराएदारों को एक खास म्युनिसिपल उम्मीदवार को वोट देने के लिए कहा था। चूंकि वह उम्मीदवार बहुत कम अंतर से हार गया, इसलिए याचिकाकर्ता को शक हुआ कि मृतक ने उसे वोट नहीं दिया।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि डायरेक्टर जनरल ऑफ़ पुलिस (DGP) से शिकायत करने के बाद जांच तत्कालीन SSP के कंट्रोल से हटाकर CID के DIG रैंक के अधिकारी को सौंप दी गई। कोर्ट ने यह भी देखा कि संबंधित SHO के खिलाफ नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन (NHRC) में कार्यवाही हुई, जिसमें उन पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। इस मामले की गलत जांच के लिए उन्हें विभागीय तौर पर भी सजा दी गई।
याचिकाकर्ता ने संबंधित एडिशनल डिस्ट्रिक्ट जज पर भी गंभीर आरोप लगाए। उसने दावा किया कि CrPC की धारा 319 के तहत उसे समन न भेजने के बदले एक APP के ज़रिए पैसे की मांग की गई। याचिकाकर्ता के अनुसार, इन आरोपों से जुड़ी वीडियो रिकॉर्डिंग और शिकायतें बाद में पटना हाईकोर्ट के इंस्पेक्टिंग जज के सामने पेश की गईं। कोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ता ने बाद में एक सप्लीमेंट्री हलफनामा दायर किया, जिसमें कहा गया कि संबंधित ज्यूडिशियल ऑफिसर के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू की गई और हाईकोर्ट ने सजा सुनाई।
शिकायतकर्ता की ओर से दी गई दलीलों पर विचार करते हुए—जिनमें कहा गया कि याचिकाकर्ता एक प्रभावशाली व्यक्ति है, जिसने सिस्टम में हेरफेर किया—कोर्ट ने ऐसे आरोपों को सख्ती से खारिज किया।
कोर्ट ने कहा:
“इस कोर्ट की राय में यह अदालत की अवमानना (Contempt) के दायरे में आता है। कई बार ऐसा होता है कि केस फाइल होने की तारीख पर ही उसका ज़िक्र किया जाता है। सूचना देकर उस पर सुनवाई की जाती है; ऐसी स्थिति में माननीय कोर्ट पर गलत मंशा का आरोप लगाना बेतुका है और यह अदालत की अवमानना के बराबर है।”
कोर्ट ने न्यायिक अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्यवाही के रिकॉर्ड मंगाने से भी इनकार किया और कहा:
“इस कोर्ट की राय में उस कार्यवाही के रिकॉर्ड मंगाना, जिसमें किसी न्यायिक अधिकारी को दंडित किया गया हो, केवल 'सार्वजनिक रूप से गंदे कपड़े धोने' (यानी निजी मामलों को सबकेसामने लाने) जैसा होगा। यह मामला पूरी तरह से दुर्भावनापूर्ण (Malafide) लगता है।”
CrPC की धारा 319 के तहत समन जारी करने के आदेश की वैधता की जांच करते हुए कोर्ट ने दोहराया कि धारा 319 के तहत शक्ति का प्रयोग करने का आधार ट्रायल के दौरान पेश किए गए सबूत होने चाहिए, न कि CrPC की धारा 164 के तहत दिए गए बयान। कोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने CrPC की धारा 319 के तहत शक्तियों का प्रयोग करते समय CrPC की धारा 164 के तहत दर्ज बयानों पर बहुत अधिक भरोसा करके पूरी तरह से गैर-कानूनी काम किया।
ट्रायल के दौरान दर्ज गवाहों के बयानों की जांच करने पर कोर्ट ने पाया कि ग्यारह गवाहों में से दस ने याचिकाकर्ता के खिलाफ कुछ भी नहीं कहा।
कोर्ट ने कहा:
“अगर ये तथ्य काफी नहीं हैं तो बयानों पर एक सरसरी नज़र डालने से ही पता चल जाएगा कि ग्यारह गवाहों में से दस ने याचिकाकर्ता के खिलाफ कुछ नहीं कहा। ग्यारहवें गवाह का कहना है कि याचिकाकर्ता ने ही उसके बेटे की हत्या के लिए हत्यारे को पैसे दिए। सेशन जज ने इस बात पर विचार किया, लेकिन बयान के पैरा-5 को नहीं देखा, जिसमें महिला ने कहा कि उसे यह जानकारी अखबार से मिली थी।”
कोर्ट ने माना कि अखबार की रिपोर्ट पर आधारित ऐसे सुनी-सुनाई बातों वाले सबूत (Hearsay Evidence) आरोप तय करने को भी सही नहीं ठहरा सकते, CrPC की धारा 319 के तहत समन जारी करना तो दूर की बात है। बेंच ने आगे कहा कि पूरी कार्यवाही शुरू से ही दुर्भावनापूर्ण (Malafide) लगती है। इसलिए कोर्ट ने CrPC की धारा 319 के तहत याचिकाकर्ता को समन करने वाले 22.08.2019 का आदेश रद्द किया।
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:
“इस प्रकार, कोर्ट को 22.08.2019 के धारा 319 का आदेश रद्द करने में कोई संकोच नहीं है, जिसके तहत याचिकाकर्ता को समन किया गया। कोर्ट का मानना है कि यह कार्रवाई कई स्तरों पर दुर्भावनापूर्ण है और जिन सामग्रियों के आधार पर समन जारी किए गए, वे इस शक्ति का प्रयोग करने के लिए बेहद अपर्याप्त हैं।”
Case Title: Deepak Kumar @ Deepak Sah v. State of Bihar.