पत्नी के पुनर्विवाह के बाद विवाह समाप्त: पटना हाईकोर्ट ने डॉक्ट्रिन ऑफ फ्रस्ट्रेशन लागू कर दिया तलाक, फैमिली कोर्ट की व्याख्या को बताया 'विकृत'
पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में फैमिली कोर्ट का आदेश विकृत करार देते हुए विशेष विवाह अधिनियम के तहत हुए विवाह को समाप्त किया। अदालत ने कहा कि जब वैवाहिक संबंध का आधार ही खत्म हो जाए तो कानून को वास्तविकता स्वीकार करनी चाहिए।
जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस चंद्र शेखर झा की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया। मामला वर्ष 2007 में विशेष विवाह अधिनियम के तहत हुए विवाह से जुड़ा था जिसे फैमिली कोर्ट ने शुरू से ही अमान्य बताते हुए तलाक याचिका खारिज की थी।
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट की इस व्याख्या पर कड़ी आपत्ति जताते हुए कहा,
“हमने इस तरह की विकृत कानूनी व्याख्या पहले कभी नहीं देखी।”
अदालत ने स्पष्ट किया कि जब विवाह प्रमाण पत्र विधि के अनुसार जारी हुआ है तो उसे नजरअंदाज कर विवाह को अमान्य नहीं ठहराया जा सकता।
मामले में पत्नी ने पति और ससुराल पक्ष पर क्रूरता, दहेज मांग और जान से मारने की कोशिश जैसे गंभीर आरोप लगाए। समय के साथ दोनों अलग रहने लगे और बाद में पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया तथा उसका एक बच्चा भी है।
इन परिस्थितियों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि अब इस विवाह का अस्तित्व केवल कागजों तक सीमित रह गया और इसका वास्तविक आधार समाप्त हो चुका है।
अदालत ने अपने फैसले में डॉक्ट्रिन ऑफ फ्रस्ट्रेशन का सहारा लिया, जो सामान्यतः अनुबंध कानून में लागू होता है। कोर्ट ने कहा कि यह सिद्धांत उस स्थिति में लागू होता है, जब परिस्थितियां ऐसी हो जाएं कि किसी संबंध के दायित्वों का निर्वहन असंभव हो जाए।
अदालत ने कहा,
“कानून किसी को असंभव कार्य करने के लिए बाध्य नहीं करता। जब विवाह का मूल आधार साथ रहना, विश्वास और पारस्परिक दायित्व पूरी तरह खत्म हो जाए तो उस संबंध को बनाए रखना केवल एक औपचारिकता रह जाती है।”
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह मामला विवाह के अपूरणीय टूटने से अलग है। यहां स्थिति ऐसी थी जहां वैवाहिक दायित्व निभाना ही असंभव हो गया।
अंततः अदालत ने कहा कि यह एक दुर्लभ मामला है, जहां न्याय के हित में डॉक्ट्रिन ऑफ फ्रस्ट्रेशन लागू करना उचित है। इसी आधार पर विवाह समाप्त कर दिया गया।