सबूतों की समझ नहीं: पटना हाईकोर्ट ने हत्या के आरोपियों को किया बरी, ट्रायल जज की ट्रेनिंग का दिया निर्देश
पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में हत्या के मामले में दोषी ठहराए गए आरोपियों को बरी करते हुए ट्रायल कोर्ट की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि ट्रायल जज को आपराधिक मामलों में साक्ष्यों की प्रासंगिकता, स्वीकार्यता और वैधता की मूलभूत समझ तक नहीं थी।
जस्टिस बिबेक चौधरी और जस्टिस चंद्र शेखर झा की खंडपीठ 22 जुलाई, 2019 के उस फैसले के खिलाफ दायर अपीलों पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें शेखपुरा के एडिशनल सेशन जज ने आरोपियों को भारतीय दंड संहिता (CrPC) की धारा 302/34 और शस्त्र अधिनियम की धारा 27 के तहत दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी।
अभियोजन के अनुसार 17 जनवरी 2017 को शेखपुरा थाने के तत्कालीन प्रभारी द्वारा दर्ज बयान के आधार पर मामला शुरू हुआ। आरोप था कि मनरेगा योजना के तहत कार्यरत एक जूनियर इंजीनियर को इसलिए गोली मार दी गई, क्योंकि उसने सरकारी अभिलेखों में फर्जी प्रविष्टि करने से इनकार किया था। घायल अवस्था में उसे अस्पताल ले जाया जा रहा था, जहां उसने कथित रूप से आरोपियों के नाम बताए लेकिन बाद में उसकी मृत्यु हो गई।
मुकदमे के दौरान आठ गवाहों की गवाही हुई, जिनमें दो स्वतंत्र गवाह मुकर गए। पूरा मामला मुख्य रूप से कथित मृत्यु पूर्व बयान और पुलिसकर्मियों के बयानों पर आधारित था।
हाईकोर्ट ने साक्ष्य अधिनियम के तहत मृत्यु पूर्व बयान के सिद्धांतों की चर्चा करते हुए कहा कि ऐसा बयान दोषसिद्धि का आधार बन सकता है, लेकिन उसकी विश्वसनीयता और वैधता का कड़ाई से परीक्षण आवश्यक है।
अदालत ने पाया कि इस मामले में कथित मृत्यु पूर्व बयान विधिवत दर्ज नहीं किया गया बल्कि केवल पुलिस अधिकारी के बयान में उसका उल्लेख था। साथ ही मृतक का मूल बयान पेश नहीं किया गया। चिकित्सा साक्ष्य से यह भी संकेत मिला कि गंभीर चोटों के कारण पीड़ित के बोलने की स्थिति में होने की संभावना नहीं थी।
सबसे गंभीर आपत्ति अदालत ने इस बात पर जताई कि ट्रायल कोर्ट ने पुलिस द्वारा हिरासत में लिए गए आरोपियों के कथित स्वीकारोक्ति बयानों को साक्ष्य मान लिया, जबकि कानून के अनुसार ऐसे बयान स्वीकार्य नहीं होते।
अदालत ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा,
“यह आश्चर्यजनक है कि एडिशनल सेशन जज स्तर का एक न्यायिक अधिकारी यह नहीं जानता कि पुलिस हिरासत में आरोपी का स्वीकारोक्ति बयान साक्ष्य के रूप में मान्य नहीं होता। इसके बावजूद ट्रायल जज ने इन्हें प्रदर्श के रूप में स्वीकार कर दोषसिद्धि का आधार बना लिया। यह न केवल गलत प्रक्रिया है बल्कि अवैध भी है।”
हाईकोर्ट ने कहा कि इस तरह अवैध साक्ष्यों पर भरोसा कर आरोपियों को वर्षों तक सजा भुगतने के लिए मजबूर किया गया, जो उनके जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है।
इन सभी कमियों को देखते हुए अदालत ने आरोपियों की दोषसिद्धि और सजा रद्द की और उन्हें बरी कर दिया।
साथ ही हाईकोर्ट ने संबंधित ट्रायल जज को आपराधिक मामलों की सुनवाई से अलग करने और उन्हें आपराधिक कानून तथा साक्ष्य संबंधी विशेष प्रशिक्षण देने की सिफारिश भी की जिस पर अंतिम निर्णय चीफ जस्टिस द्वारा प्रशासनिक स्तर पर लिया जाएगा।
यह फैसला न्यायिक प्रक्रिया में साक्ष्यों के सही उपयोग और न्यायिक अधिकारियों के प्रशिक्षण की आवश्यकता को रेखांकित करता है।