अधीनस्थ अधिकारी द्वारा आदेश की सूचना देना वैधानिक शक्ति का प्रत्यायोजन नहीं: पटना हाईकोर्ट ने बंदी स्थानांतरण अवधि-विस्तार बरकरार रखा
पटना हाईकोर्ट ने कहा कि किसी अधीनस्थ अधिकारी द्वारा सक्षम प्राधिकारी के आदेश का केवल संप्रेषण करना वैधानिक शक्ति का प्रत्यायोजन नहीं माना जा सकता।
इसी आधार पर अदालत ने एक बंदी के जेल स्थानांतरण की अवधि बढ़ाने का आदेश वैध ठहराते हुए चुनौती खारिज की।
जस्टिस आलोक कुमार पांडे की एकलपीठ उस आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें 30 अक्तूबर 2025 के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत बिहार के सहायक महानिरीक्षक (कारा) ने याचिकाकर्ता के आदर्श केंद्रीय कारा, बेउर, पटना से विशेष केंद्रीय कारा, भागलपुर स्थानांतरण की अवधि छह माह और बढ़ाई थी।
याचिकाकर्ता का कहना था कि बंदी अधिनियम, 1900 की धारा 29 तथा बिहार कारा मैनुअल, 2012 के नियम 781(7) के अनुसार बंदियों के स्थानांतरण की शक्ति केवल महानिरीक्षक, कारा एवं सुधार सेवाएं को प्राप्त है।
इसलिए सहायक महानिरीक्षक द्वारा जारी आदेश अधिकार-क्षेत्र से परे और विधि-विरुद्ध है।
यह भी दलील दी गई कि स्थानांतरण अवधि बढ़ाने का आधार केवल कानून-व्यवस्था और लोकहित जैसे अस्पष्ट कारण बताए गए जिनके समर्थन में कोई ठोस सामग्री नहीं है।
राज्य सरकार ने जवाब में कहा कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध अनेक आपराधिक मामले लंबित हैं तथा बेउर जेल के भीतर आपराधिक साजिश की आशंका को देखते हुए जिला दंडाधिकारी और वरीय पुलिस अधीक्षक, पटना की अनुशंसा पर यह निर्णय लिया गया।
राज्य ने स्पष्ट किया कि आदेश को विधिवत महानिरीक्षक, कारा एवं सुधार सेवाएं की स्वीकृति प्राप्त थी।
रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि बिहार कारा मैनुअल का नियम 781 स्थानांतरण की शक्ति महानिरीक्षक को देता है, जबकि नियम 792 अधीनस्थ अधिकारियों की सहायक भूमिका निर्धारित करता है।
अदालत ने कहा कि यद्यपि आदेश पर सहायक महानिरीक्षक के हस्ताक्षर थे परंतु वास्तविक निर्णय महानिरीक्षक द्वारा लिया और अनुमोदित किया गया।
अदालत ने कहा,
“संचार और प्रत्यायोजन के बीच का विधिक अंतर स्पष्ट है। अधीनस्थ अधिकारी यदि सक्षम प्राधिकारी के निर्णय को केवल प्रेषित करता है तो वह माध्यम के रूप में कार्य करता है, प्रतिनिधि के रूप में नहीं।”
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि डेलीगेटस नॉन पोटेस्ट डेलिगेयर का सिद्धांत तभी लागू होता है जब निर्णय लेने की शक्ति वास्तव में किसी अन्य को सौंप दी जाए, जबकि वर्तमान मामले में ऐसा नहीं हुआ।
अनुच्छेद 21 के तहत शीघ्र सुनवाई के अधिकार के उल्लंघन संबंधी दलील पर अदालत ने कहा कि जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में निष्पक्ष एवं त्वरित सुनवाई का अधिकार शामिल है परंतु यह पूर्ण अधिकार नहीं है और प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर परखा जाएगा।
अदालत को ऐसा कोई साक्ष्य नहीं मिला, जिससे यह साबित हो कि स्थानांतरण आदेश के कारण मुकदमे में देरी हुई।
इन निष्कर्षों के साथ हाईकोर्ट ने माना कि विवादित आदेश वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप और प्रासंगिक तथ्यों के आधार पर पारित किया गया।
फलस्वरूप अदालत ने याचिका खारिज की।