जॉइनिंग में स्वीकृत देरी के आधार पर पुरानी पेंशन से वंचित नहीं किया जा सकता: पटना हाईकोर्ट
पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि किसी कर्मचारी को सक्षम प्राधिकारी की अनुमति से सेवा ग्रहण करने में देरी हुई है तो केवल इसी आधार पर उसे पुरानी पेंशन योजना (OPS) का लाभ देने से वंचित नहीं किया जा सकता, विशेषकर तब जब पूरी भर्ती प्रक्रिया निर्धारित कट-ऑफ तिथि से पहले पूरी हो चुकी हो।
चीफ जस्टिस संगम कुमार साहू और जस्टिस हरीश कुमार की खंडपीठ बिहार सरकार द्वारा दायर लेटर्स पेटेंट अपील पर सुनवाई कर रही थी।
यह अपील उस आदेश के खिलाफ दाखिल की गई, जिसमें एकलपीठ ने राज्य सरकार द्वारा याचिकाकर्ता को पुरानी पेंशन योजना का लाभ देने से इनकार करने का निर्णय निरस्त किया था और उसे पुरानी तथा नई पेंशन योजना में से विकल्प चुनने की स्वतंत्रता दी थी।
मामले के अनुसार याचिकाकर्ता का चयन उस भर्ती प्रक्रिया के तहत हुआ, जो 1 सितंबर 2005 से पहले शुरू और पूरी हुई थी। यह वही कट-ऑफ तिथि थी, जिसके बाद नई पेंशन योजना लागू की गई थी।
याचिकाकर्ता को 4 मई, 2005 को नियुक्ति पत्र जारी हुआ था, लेकिन वह 16 सितंबर, 2005 को जिला अंकेक्षण पदाधिकारी के पद पर कार्यभार ग्रहण कर सका, क्योंकि वह पहले से सरकारी सेवा में था और प्रतियोगी परीक्षाओं में सम्मिलित होने के कारण उसे विभाग द्वारा समय-विस्तार दिया गया।
राज्य सरकार ने दलील दी कि चूंकि याचिकाकर्ता ने 1 सितंबर 2005 के बाद पदभार ग्रहण किया, इसलिए वह नई पेंशन योजना के अंतर्गत आएगा और जॉइनिंग के लिए समय-विस्तार मिलने मात्र से उसे पुरानी पेंशन योजना का लाभ नहीं दिया जा सकता।
वहीं याचिकाकर्ता ने कहा कि उसकी भर्ती प्रक्रिया का विज्ञापन, चयन और नियुक्ति सभी कट-ऑफ तिथि से पहले पूरे हो चुके थे तथा उसी चयन प्रक्रिया के अन्य अभ्यर्थियों, यहां तक कि उससे कनिष्ठ कर्मचारियों को भी पुरानी पेंशन योजना का लाभ दिया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार के 17 फरवरी, 2020 के संकल्प के अनुपालन में बिहार सरकार ने 28 नवंबर, 2023 को एक संकल्प जारी कर समान भर्ती प्रक्रिया के कर्मचारियों को कुछ शर्तों के अधीन पुरानी पेंशन योजना चुनने का अवसर दिया था।
अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता का मामला स्पष्ट रूप से इसी नीति के दायरे में आता है, क्योंकि विज्ञापन और चयन प्रक्रिया दोनों 1 सितंबर 2005 से पहले पूरी हो चुकी थीं।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सेवा ग्रहण करने में हुई देरी याचिकाकर्ता की गलती नहीं थी, बल्कि उसे स्वयं अधिकारियों ने अनुमति दी थी। ऐसे में उस देरी का उपयोग उसके विरुद्ध नहीं किया जा सकता।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने कहा कि एकलपीठ के आदेश में कोई अवैधता या त्रुटि नहीं है और बिहार सरकार की अपील खारिज की।