मद्रास हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि आम मानवीय व्यवहार के दौरान होने वाला कोई भी संपर्क - जैसे हाथ पकड़ना, कंधे को छूना, आंसू पोंछना और किसी को सांत्वना देना - अपने आप में सेक्सुअल नहीं माना जाएगा। किसी सेक्सुअल इरादे का पता आसपास की परिस्थितियों से ही लगाया जा सकता है। [2026 LiveLaw (Mad) 408]

जस्टिस आर विजयकुमार ने कॉन्स्टेबल के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला रद्द किया। उस पर POCSO Act के तहत अपराधों का आरोप था। कोर्ट ने पाया कि उस व्यक्ति ने केवल उस नाबालिग लड़की को सांत्वना दी थी, जिसके साथ उसका रोमांटिक रिश्ता था।

कोर्ट ने कहा,

"दूसरी ओर, अगर संपर्क ऐसा है, जो आम मानवीय व्यवहार में होता है - जैसे हाथ पकड़ना, कंधे को छूना, आंसू पोंछना - तो इस काम में कोई सेक्सुअल पहलू नहीं होता। इसके पीछे का इरादा संपर्क के अलावा अन्य बातों से समझना होगा। ऐसे मामलों में आसपास की परिस्थितियां बहुत अहम होती हैं: शरीर का कौन सा हिस्सा था, संपर्क का तरीका और समय कितना था, जगह और समय क्या था, क्या शब्द कहे गए, उस काम से पहले और बाद में कैसा व्यवहार था, और क्या आगे कुछ करने की कोशिश की गई या नहीं।"

कोर्ट आर्म्ड रिज़र्व की बटालियन-III से जुड़े एक ग्रेड-II कॉन्स्टेबल की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, उस व्यक्ति का पीड़िता के साथ 2 साल से अधिक समय से रोमांटिक संबंध था। जब लड़की के माता-पिता को इस बारे में पता चला, तो उन्होंने उसे डांटा। बाद में जब पीड़िता स्कूल जा रही थी तो याचिकाकर्ता कार में आया और उससे पांच मिनट का समय मांगा। जब वह कार की पिछली सीट पर बैठी और रोने लगी तो याचिकाकर्ता ने उसका हाथ पकड़ा, उसे हुई परेशानियों के लिए माफी मांगी और भरोसा दिलाया कि 12वीं कक्षा पूरी करने और बालिग होने पर वह उससे शादी करेगा।

इस घटना के आधार पर लड़की के परिवार ने उसके खिलाफ POCSO Act की धारा 7, 8, 9(b)(iii) और 10 के तहत मामला दर्ज कराया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि आरोप का मुख्य सार केवल बालिग होने पर शादी करने का भरोसा देने और आंसू पोंछने तक ही सीमित था। इस तरह के व्यवहार को किसी भी नज़रिए से देखने पर भी, यह लगाए गए आरोपों के तहत किसी अपराध की परिभाषा में नहीं आता। याचिकाकर्ता ने कहा कि हालांकि आंसू पोंछने की क्रिया में शारीरिक संपर्क शामिल था, लेकिन अंतिम रिपोर्ट में बताई गई परिस्थितियों से यह स्पष्ट होता है कि इसमें कोई यौन मंशा नहीं थी।

दूसरी ओर, शिकायतकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि चूंकि याचिकाकर्ता ने बच्ची के गाल को छुआ था, इसलिए धारा 7, 8, 9 और 10 लागू होंगी। यह भी तर्क दिया गया कि हालांकि पीड़िता के माता-पिता पहले ही शिकायत दर्ज करा चुके थे। फिर भी याचिकाकर्ता उसका पीछा करता रहा, जिसके कारण FIR दर्ज करानी पड़ी।

सरकारी वकील ने कहा कि शारीरिक संपर्क के समय यौन मंशा का होना तथ्य का प्रश्न है, जिसका समाधान केवल मुकदमे के दौरान ही किया जा सकता है। इसलिए उन्होंने याचिका को खारिज करने की मांग की।

अदालत ने गौर किया कि POCSO Act की धारा 7, जो यौन हमले से संबंधित है, के दो हिस्से हैं: एक हिस्सा बच्चे की योनि, लिंग, गुदा या स्तन को छूने या बच्चे से ऐसा स्पर्श करवाने से संबंधित है; दूसरा हिस्सा एक अवशिष्ट (Residuary) प्रावधान है, जिसमें बिना प्रवेश (Penetration) के शारीरिक संपर्क वाली कोई भी अन्य क्रिया शामिल है।

अदालत ने कहा कि यह प्रावधान केवल शारीरिक संपर्क के लिए दंडित नहीं करता है, जब तक कि वह यौन मंशा के साथ न हो। इस प्रकार, अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि अपराध को साबित करने के लिए यौन मंशा ही आधार थी।

अदालत ने कहा,

"यह प्रावधान केवल शारीरिक संपर्क के लिए दंडित नहीं करता है। यौन मंशा अपराध की कोई आकस्मिक विशेषता नहीं है, बल्कि इसकी मूल नींव है और उस मानसिक तत्व की अनुपस्थिति में 'एक्टस रीसस' (आपराधिक कृत्य), चाहे वह कैसे भी स्थापित हुआ हो, कानूनी रूप से निष्प्रभावी रहता है।"

मौजूदा मामले में अदालत ने गौर किया कि शारीरिक संपर्क की एकमात्र क्रिया पीड़िता के आंसू पोंछना और उसका हाथ पकड़ना थी। अदालत ने घटना के परिवेश को भी महत्वपूर्ण माना। अदालत ने ध्यान दिया कि घटना सुबह के समय पीड़िता के स्कूल के पास एक सार्वजनिक सड़क पर हुई, जब पीड़िता कार की पिछली सीट पर बैठी थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता के कहे शब्द माफ़ी और भरोसा दिलाने वाले थे; उनमें यौन प्रकृति की किसी भी कोशिश, इशारे या बात का ज़रा भी संकेत नहीं था। कोर्ट ने आगे कहा कि यह संपर्क पछतावे और सांत्वना देने की भावना से हुआ था। कोर्ट ने माना कि ऐसे काम में यौन मंशा देखना एक ऐसी धारणा बनाना होगा, जिसकी इजाज़त संबंधित धारा नहीं देती है।

इस तरह यह मानते हुए कि मुक़दमा जारी रखना क़ानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा, कोर्ट ने याचिका मंज़ूर की और आपराधिक केस रद्द कर दिया।

Case Title: Maheshkumar v State of Tamil Nadu and Another

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