मद्रास हाईकोर्ट की जस्टिस सी.वी. कार्तिकेयन और जस्टिस आर. शक्तिवेल की डिविजन बेंच ने कहा कि किसी कर्मचारी के खिलाफ नौकरी के दौरान शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को उनके रिटायरमेंट के बाद भी जारी रखा जा सकता है और पूरा किया जा सकता है, अगर संबंधित सर्विस रूल्स इसकी इजाज़त देते हैं।

पृष्ठभूमि की जानकारी

अपीलकर्ता श्री परमाकल्याणी कॉलेज के केमिस्ट्री डिपार्टमेंट में एसोसिएट प्रोफेसर के तौर पर काम कर रहे थे। 30.08.2011 को उनके खिलाफ आरोपों का मेमोरेंडम जारी किया गया, जिसमें आरोप लगाया गया कि उन्होंने छात्राओं के साथ यौन रंगत वाली टिप्पणियां कीं और गलत व्यवहार किया। उन्होंने उनसे गैर-जरूरी सवाल पूछे, क्लास के बाहर खड़ा करके उन्हें अपमानित किया और बदले की भावना से जानबूझकर छात्रों को फेल किया। उन्होंने कुछ छात्रों की आर्थिक मदद की और पैसे वापस करने के लिए उन्हें एक लॉज में मिलने के लिए कहा। इसके अलावा, छात्राओं के साथ उनकी बातचीत में दोहरे अर्थ वाली यौन बातें शामिल थीं।

सही प्रक्रिया का पालन करने के बाद आरोप साबित हो गए। उन्हें एसोसिएट प्रोफेसर से असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर डिमोट करने की सज़ा दी गई। प्रोफेसर ने सज़ा को चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर की। एक सिंगल जज ने प्रतिवादी को कॉलेज मैनेजमेंट द्वारा 29.10.2011 को सौंपे गए प्रस्ताव पर फैसला लेने और फैसला लेने से पहले प्रोफेसर की बात सुनने का निर्देश दिया।

इस आदेश को चुनौती देते हुए प्रोफेसर ने रिट अपील दायर की। बाद में रीजनल जॉइंट डायरेक्टर ने सज़ा को मंज़ूरी दी, जिसे प्रोफेसर ने एक और याचिका में चुनौती दी।

प्रोफेसर ने तर्क दिया कि सज़ा देने का आदेश गलत था, क्योंकि जाँच 'विशाखा फैसले' में जारी गाइडलाइंस के अनुसार नहीं की गई, जिसके तहत शिकायत समिति का गठन किया जाना ज़रूरी था, जिसकी अध्यक्षता एक महिला करे, जिसमें आधी सदस्य महिलाएँ हों और एक स्वतंत्र ऑब्ज़र्वर हो।

यह भी तर्क दिया गया कि कॉलेज के पास रिटायरमेंट की उम्र पूरी होने पर प्रोफेसर को नौकरी से रिटायर होने की इजाज़त देने के बाद सज़ा देने का कोई अधिकार नहीं है, क्योंकि उसके बाद नियोक्ता-कर्मचारी का कोई संबंध नहीं रह गया। प्रोफेसर ने यह भी कहा कि उनका रिकॉर्ड बेदाग है और छात्राओं द्वारा उनके खिलाफ की गई शिकायतें दुर्भावनापूर्ण हैं। इसके अलावा, अपील करने वाले ने 'एस. एंडियानन बनाम जॉइंट रजिस्ट्रार, कोऑपरेटिव सोसाइटीज़' के फ़ैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि रिटायरमेंट के बाद अनुशासनात्मक कार्रवाई तभी जारी रखी जा सकती है, जब लागू कानूनी नियमों या उप-नियमों (bye-laws) के तहत ऐसा करने का प्रावधान हो।

प्रोफ़ेसर ने 'देव प्रकाश तिवारी बनाम उत्तर प्रदेश कोऑपरेटिव इंस्टीट्यूशनल सर्विस बोर्ड' का भी हवाला देते हुए तर्क दिया कि रिटायरमेंट के बाद अनुशासनात्मक कार्रवाई तभी जारी रखी जा सकती है, जब संबंधित अथॉरिटी के पास ऐसा करने का अधिकार हो। साथ ही 'स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया बनाम नवीन कुमार सिन्हा' मामले का भी ज़िक्र किया गया, जिसमें रिटायरमेंट के बाद शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्रवाई को अमान्य (void) करार दिया गया।

दूसरी ओर, कॉलेज की ओर से तर्क दिया गया कि प्रोफ़ेसर ने जांच में हिस्सा लिया और उन्हें हर चरण पर पूरा मौका दिया गया, जिसमें छात्राओं से क्रॉस-एग्जामिनेशन (जिरह) करने की अनुमति भी शामिल थी। यह भी तर्क दिया गया कि रिट अपील अब बेमानी हो गई, क्योंकि कॉलेजिएट एजुकेशन के जॉइंट डायरेक्टर ने तथ्यों की जांच कर ली थी और सज़ा को मंज़ूरी दी थी।

आगे यह तर्क दिया गया कि अनुशासनात्मक कार्रवाई जारी रखने का अधिकार नौकरी से जुड़े नियमों पर निर्भर करेगा। यह बताया गया कि तमिलनाडु प्राइवेट कॉलेज (रेगुलेशन) एक्ट, 1976 की धारा 18 में यह प्रावधान है कि प्राइवेट कॉलेज में नियुक्त हर शिक्षक पर आचार संहिता (Code of Conduct) लागू होगी।

कोर्ट की बातें और निष्कर्ष

डिविजन बेंच ने देखा कि अपील करने वाले का यह तर्क कि जांच 'विशाखा गाइडलाइंस' के अनुसार नहीं की गई, सिंगल जज के सामने नहीं रखा गया। यह भी देखा गया कि प्रोफेसर ने अपनी पिछली रिट याचिका में भी यह बात नहीं उठाई। इसके अलावा, यह भी पाया गया कि एक स्वतंत्र जांच अधिकारी नियुक्त किया गया, जिसने जांच की और प्रोफेसर को अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया। साथ ही, सबूतों का विश्लेषण करने वाली रिपोर्ट में कोई गड़बड़ी नहीं थी और निष्कर्ष भी गलत या मनमाने नहीं थे।

डिविजन बेंच ने कहा कि कॉलेज को प्रोफेसर के रिटायरमेंट की उम्र पूरी होने के बाद भी अनुशासनात्मक कार्रवाई जारी रखने का पूरा अधिकार है। यह देखा गया कि अनुशासनात्मक कार्रवाई रिटायरमेंट से लगभग तीन साल पहले शुरू की गई और प्रस्तावित सज़ा के बारे में भी रिटायरमेंट से तीन साल पहले ही बता दिया गया।

बेंच ने 'स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया बनाम नवीन कुमार सिन्हा' के मामले को इस मामले से अलग माना। यह ध्यान दिया गया कि नवीन के मामले में अनुशासनात्मक कार्रवाई रिटायरमेंट के बाद शुरू की गई, जबकि अपील करने वाले के मामले में कार्रवाई रिटायरमेंट से पहले ही शुरू और पूरी हो चुकी थी।

इसके अलावा, यह भी कहा गया कि 1976 का कानून अपने आप में व्यापक है। इसलिए सज़ा दिए जाने के खिलाफ़ धारा 20 के तहत अपील करने और धारा 21 के तहत दूसरी अपील करने का प्रावधान है। साथ ही सरकार के सामने रिविज़न (पुनरीक्षण) याचिका दायर करने का अधिकार भी है। प्रोफेसर ने ऐसे किसी वैकल्पिक उपाय का सहारा नहीं लिया, बल्कि रिट याचिका दायर कर दी। कोर्ट ने माना कि प्रोफेसर ने जान-बूझकर अपील न करने का फ़ैसला किया था।

इन बातों को ध्यान में रखते हुए डिविजन बेंच ने प्रोफेसर द्वारा दायर रिट अपील खारिज की।

Case Name : Dr. S. Ponnusamy vs. The Director, The Directorate of Collegiate Education

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